वहीं रवींद्रनाथ टैगोर ने इसके विरोध का एक अलग और अनोखा रास्ता निकाला. टैगोर ने ऐलान किया कि बंटवारे के दिन यानी 16 अक्टूबर को राष्ट्रीय शोक दिवस होगा और बंगालियों के घर में उस दिन खाना नहीं बनेगा. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपसी भाईचारे का संदेश देने के लिए टैगोर ने राखी का उपयोग किया.

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उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को राखी बांधें और शपथ लें कि वे जीवनभर एक-दूसरे की सुरक्षा का एक ऐसा रिश्ता बनाए रखेंगे जिसे कोई तोड़ न सके. 16 अक्टूबर को टैगोर ने गंगा में डुबकी के साथ अपना दिन शुरू किया. गंगा किनारे से उनकी अगुवाई में ही एक जुलूस शुरू हुआ. अपने साथ वह राखी का गट्ठर लिए कोलकाता की सड़कों पर चलते जा रहे थे और जो भी मिल रहा था उसे राखी बांध रहे थे.

जुलूस आगे बढ़ता गया. टैगोर जहां-जहां से गुजरे, सड़क के दोनों तरफ लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा. साथ में चल रहे लोग उनके द्वारा लिखा गया गीत गा रहे थे. इस गीत में ईश्वर से बंगाल को सुरक्षित और एकजुट रखने की प्रार्थना की गई थी. छतों पर खड़ी महिलाएं जुलूस पर चावल फेंक रही थीं और शंख बजा रही थीं.

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इस विरोध का असर हुआ और कुछ समय के लिए बंगाल विभाजित होने से बच गया. हालांकि बाद में सन 1912 में बंगाल का विभाजन कर बिहार, असम और उड़ीसा को इससे अलग कर दिया गया. लेकिन इस बार यह बंटवारा हिंदू-मुसलमान का न होकर भाषाई आधार पर हुआ था. इस तरह टैगोर ने राखी से एक अजब ही आंदोलन किया था.