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तो भाजपा का जनतंत्र का दावा तार-तार हो जाएगा

शिरीष खरे | Updated on: 9 January 2016, 14:35 IST
QUICK PILL
  • कथित फिक्सिंग टेप में मुख्यमंत्री के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता लेन-देन की बात कर रहे हैं. बातचीत में मुख्यमंत्री की भूमिका सामने आ रही है. लिहाजा इस कांड का मुख्य किरदार होने के नाते डॉ. गुप्ता की आवाज की जांच होनी चाहिए. 
  • पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर संभाग की कई सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी हार गए थे. ऐसे में सत्ता में होने के बावजूद भाजपा अंतागढ़ उपचुनाव हारती तो रमन सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठता. 1998 में मंतूराम विधायक बने. उपचुनाव में मंतूराम यदि मैदान नहीं छोड़ते तो टक्कर कांटे की होती.

अंतागढ़, साल भर पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा की यह सीट सुर्खियों में आई थी और इन दिनों फिर से सुर्खियों में है. सार यह है कि चुनाव फिक्सिंग उजागर करने वाले एक ऑडियो टेप से चर्चा में आए कांग्रेस प्रत्याशी मंतूराम पवार ने तब नाम वापसी के आखिरी दिन से एक दिन पहले अपना पर्चा वापस लेकर भाजपा उम्मीदवार भोजराज नाग को अभयदान दे दिया था.

इसके बाद वे रायपुर पहुंचे जहां उनकी खातिरदारी सरकारी मेहमान जैसी हुई. देखते ही देखते उनका पखांजूर (कांकेर) वाला मामूली-सा मकान चार हजार वर्गमीटर के आलीशान बंगले में बदल गया. 

मंतूराम सहित दस और उम्मीदवारों ने भी अपने नाम वापस लिए थे. अब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने ऑडियो टेप जारी कर दावा किया कि अंतागढ़ उपचुनाव में सत्तारूढ़ दल भाजपा को वॉकओवर दिलाने के लिए पैसों को खेल खेला गया. 

मौजूदा हालात को जानने से पहले यदि थोड़ा पीछे जाएं तो इस फिक्सिंग टेप पर लोगों का भरोसा बढ़ जाता है. पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर संभाग की कई सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी हार गए थे. ऐसे में सत्ता में होने के बावजूद भाजपा अंतागढ़ उपचुनाव हारती तो रमन सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठता. 

1998 में मंतूराम विधायक बने. 2008 में वे 200 से भी कम वोटों से हारे. उपचुनाव में मंतूराम यदि मैदान नहीं छोड़ते तो टक्कर कांटे की होती. इसके अलावा कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल की गुटबाजी भी किसी से छिपी नहीं है. उपचुनाव में भाजपा यदि जीतती तो बघेल की किरकिरी होती और हुआ भी यही. मंतूराम जोगी गुट के करीबी नेता थे. मगर नामांकन वापस लेने के कुछ दिन बाद ही मंतूराम भाजपा में चले गए.

अब वापस आज के परिदृश्य में आएं तो कथित टेपकांड में मंतूराम, अजीत जोगी, उनके कांग्रेस विधायक पुत्र अमित जोगी, जोगी समर्थक फिरोज सिद्दीकी के साथ-साथ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता भी शामिल हैं. आरोपियों के बयान देखें तो मंतूराम का कहना है कि वे मुफ्त बदनाम हुए, उन्हें एक फूटी कौड़ी नहीं मिली. जोगी फिरोज सिद्दीकी पर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगा रहे हैं तो सिद्दीकी जोगी को झूठा नंबर-वन बता रहे हैं. 

अजीत जोगी ने अखबार के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दाखिल किया है और अब वे बघेल को भी मानहानि का नोटिस थमाने के लिए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से इजाजत मांग रहे हैं. बघेल ने जोगी पर बड़ी कार्रवाई के लिए रायपुर से दिल्ली एक कर दिया है. कार्रवाई की आस में अब वे बस पार्टी महासचिव राहुल गांधी की स्वदेश वापसी का इंतजार कर रहे हैं.

दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का कहना है कि अभी कई टेप और आने हैं. आखिर टेप आने के बाद ही वे कुछ बोलेंगे. उन्होंने टेपकांड को कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को नतीजा बताते हुए खुद को किनारे कर लिया. उनकी मानें तो इस मामले में न तो उनके दामाद और दल का कोई लेना-देना है और न ही उनकी सरकार का. पूरे प्रकरण में उन्होंने इसे बड़ी चालाकी से जोगी पर केंद्रित कर दिया है. 

अब सारा प्रकरण जोगी बनाम बघेल हो रहा है, जबकि मुद्दा है कि यह लेन-देन किया किसने और क्यों किया? यदि इन सवालों के आसपास बात होने लगे तो मुख्यमंत्री के साथ पार्टी और राज्य सरकार सीधी फंसती नजर आएंगी.

भाजपा इसलिए बच रही है

इस कथित फिक्सिंग टेप में मुख्यमंत्री के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता खरीद फरोख्त करते सुने जा रहे हैं. बातचीत में मुख्यमंत्री की भूमिका सामने आ रही है. लिहाजा इस कांड का मुख्य किरदार होने के नाते डॉ. गुप्ता की आवाज की जांच होनी चाहिए. मगर भाजपा योजना के तहत इस मामले को कांग्रेस की आपसी लड़ाई बता रही है. 

भाजपा जानती है कि इस टेपकांड की आंच मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच रही है जिसमें खुद रमन सिंह का नाम आया है

टेपकांड के बाकी किरदारों से अलग फिर उनके दामाद की आवाज को अलग से निकालकर नहीं देखा जा सकता है. मुख्यमंत्री के पीए ओपी गुप्ता के खिलाफ नाम वापसी के लिए प्रलोभन दिए जाने की शिकायत दर्ज हुई है. 

भाजपा अधिक जिम्मेदार इसलिए है कि सत्ताधारी पार्टी होने के साथ ही उपचुनाव का नतीजा भी भाजपा की झोली में गया था. मंतूराम के मैदान छोड़ने का फायदा भाजपा को मिला था और बाद में भाजपा ने उन्हें अपनी पार्टी में लिया. एक सवाल है कि यदि मंतूराम को पैसा मिला है तो यह दिया किस पार्टी ने. कांग्रेस अपने ही प्रत्याशी को हटाने के लिए तो पैसा देगी नहीं. इसलिए भाजपा सवालों के घेरे में है, लिहाजा यह जवाब आना बाकी है कि अंतागढ़ उपचुनाव में आखिर क्या हुआ था.

फिर प्रदेश का मुखिया होने के नाते भी इस मामले में रमन सिंह की विशेष जिम्मेदारी बनती है. अच्छा होता कि टेप कांड के फौरन बाद वे निष्पक्ष जांच की पहल करते. यदि सचमुच उनकी सरकार का कुछ लेना-देना नहीं है तो क्यों वे जांच से पीछे हट रहे हैं.

दूसरी तरफ, कथित लेन-देन के प्रकरण में मुख्यमंत्री का नाम भी आने के कारण कांग्रेस सहित सभी विरोधी दल सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. वहीं, टेपकांड की जांच कराने का निर्णय लेने वाला चुनाव आयोग खासी आलोचना झेल रहा है.

ऐसा इसलिए कि नामांकन वापस लेने के बाद ही चुनाव फिक्सिंग के आरोप लगने लगे थे, लेकिन तब आयोग ने जांच कराना उचित नहीं समझा. विपक्ष का कहना है कि आयोग सरकार के ही मातहत अंग की तरह काम करता है. इसलिए इसकी जांच करानी है तो राज्य के बाहर किसी अधिकारी से कराई जाए.

भाजपा अपना घर क्यों करे साफ

भाजपा यदि इस प्रकरण को कांग्रेस की कलह बताकर पल्ला झाड़ेगी तो और भी ज्यादा एक्सपोज होगी. इसके पहले भ्रष्टाचार के कई प्रकरणों के कारण राज्य में पार्टी नुकसान झेल रही है. बीते दिनों छत्तीसगढ़ के 11 नगर निकाय चुनाव में भाजपा महज तीन सीट पर ही सिमट गई. भाजपा के लिए यह खतरे की घंटी है. पार्टी हाईकमान ने यदि इस मुद्दे पर भी चुप्पी साधी तो भाजपा की लोकप्रियता और अधिक घट सकती है. 

वहीं, छत्तीसगढ़ में अंतागढ़ उपचुनाव चुनावी गड़बड़ी का पहला मामला नहीं है. चुनावी जंग के दौरान छल, कपट और लेन-देन के आरोप-प्रत्यारोपों से जनता में नकरात्मक संदेश गए हैं. मगर तकनीकी विकास का थोड़ा इस्तेमाल करने से अंतागढ़ का मामला पकड़ में आ गया है. 

अब तक सतारूढ़ दलों पर विरोधी पार्टी से तालमेल करके अपने उम्मीदवार के चुनाव क्षेत्र में विपक्ष की ओर से कमजोर उम्मीदवार खड़ा कराने के आरोप लगते रहे हैं. मगर इस बार सत्तारुढ़ दल भाजपा पर विरोधी दल के उम्मीदवार को ही खरीदने का स्टिंग आया है. लिहाजा भाजपा का एक धड़ा दबी जुबान में यह मानता है कि सत्तारूढ़ पार्टी निष्पक्ष जांच से भागती नजर आती है तो उसका जनतंत्र में यकीन दिलाने का दावा तार-तार हो जाएगा.

First published: 9 January 2016, 14:35 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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