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रथो बाई की संघर्ष गाथा: 10 साल, महिला अधिकार

सुहास मुंशी | Updated on: 8 May 2016, 22:10 IST
QUICK PILL
  • रथो बाई ने महिला आश्रितों को कोल इंडिया की इकाई एसईसीएल में नौकरी न देने के खिलाफ 10 साल तक संघर्ष किया. छ्त्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आखिरकार उनके हक़ में फैसला दिया.
  • रथो बाई के मामले के बाद एसईसीएल ने 150 से अधिक महिलाओं को नौकरी देने का फैसला किया. हालांकि रथो को अभी नियुक्ति पत्र नहीं मिला है. वो दोबारा अदालत जाने को तैयार हैं.

छत्तीसगढ़ की रथो बाई महिला अधिकारों के लिए संघर्ष की मिसाल बन गई हैं. राज्य के एक छोटे से गांव में रहने वाली रथो बाई ने महिलाओं को रोजगार न देने के खिलाफ 10 साल तक कानूनी लड़ाई लड़कर जीत हासिल की.

कोल इंडिया लिमिटेड की इकाई साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) ने रथो बाई की पारिवारिक जमीन खदान के लिए ली थी. इसके बदले कंपनी को परिवार के एक सदस्य को नौकरी देनी थी. लेकिन कंपनी ने महिला होने के कारण उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया.

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रथो बाई इसके खिलाफ अदालत गईं. आखिरकार छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पिछले साल उनके हक़ में फैसला सुनाया. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि कंपनी ने जिसकी जमीन ली है उसकी बेटी भी राज्य के पुनर्वास नीति के तहत नौकरी पाने की हकदार है. 

रथो बाई ने कोल इंडिया की कंपनी में महिला आश्रितों को नौकरी न दिए जाने के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीती

अदालत के फैसले के बाद राज्य में कई अन्य महिलाओं ने रथो बाई की राह पर चलते हुए अदालत में कंपनी के खिलाफ याचिका डाली. कंपनी ने आखिरकार 165 महिलाओं को नौकरी देने का फैसला किया. कंपनी ने आसपास के इलाके में भी यही नीति अपनाने का निर्णय लिया है.

एसईसीएल ने जब 2005 में रथो बाई की पारिवारिक जमीन ली थी तो उनकी उम्र 12 साल थी. जमीन के बदले उनके परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जानी थी. करीब चार साल पहले उनके भाई का देहांत हो गया तो रथो और उनकी मां का जीविका का एकमात्र सहारा भी छिन गया.

रथो बाई कहती हैं, "उन्होंने कहा कि तुम लड़की हो और कानून लड़कियों को खदान में जाने की इजाजत नहीं देता. लेकिन मेरे परिवार के एक व्यक्ति को उन्हें नौकरी देनी थी. मैंने कहा खदान से अलग मुझे चपरासी वगैरह कुछ बना दो. उन्होंने मेरी मां से कहा कि इसकी शादी कर दो और फिर शायद हम इसके पति को नौकरी दे दें."

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कंपनी के किसी आदमी ने रथो से कहा कि वो निरक्षर है इसलिए चपरासी तो क्या उसे कोई नौकरी नहीं मिल सकती.

रथो ने इसके बाद दूसरे के खेतों में काम करना शुरू किया और अदालत में मुकदमा लड़ती रहीं. आर्थिक दिक्कतों के कारण उनकी जो स्कूल की पढ़ाई बीच में छूट गई थी उन्होंने उसे भी दोबारा शुरू किया. फिलहाल रथो दसवीं पास कर चुकी हैं. उनका बारहवीं का नतीजा 16 मई को आने वाला है.

रथो कहती हैं, "बहुत कठिन हालात थे. मुझे न केवल कोयला कंपनी से बल्कि अपने आसपास, गांव-पड़ोस के लोगों का भी सामना करना पड़ रहा था. मेरी मां को छोड़कर किसी ने मेरा साथ नहीं दिया."

महिलाओं के कोल इंडिया में नौकरी के अधिकार पर रथो की जीत से कई महिलाओं को मिली प्रेरणा

सत्येंद्र कुमार इस इलाके में एनजीओ एमनेस्टी इंटरनेशनल के लिए काम करते हैं. वो मामले को समझाते हुए कहते हैं, "कोल इंडिया के पास 470 से अधिक खदानें हैं. इनमें से कई आदिवासी इलाके में हैं. उन्होंने विस्थापित परिवारों की महिलाओं को नौकरी नहीं दिया. रथो बाई ने कंपनी के नियम को अदालत में चुनौती दी और उन्हें जीत मिली."

कुमार बताते हैं कि कोल इंडिया की पुनर्वास नीति के अनुसार परिवार में कोई पुरुष दावेदार न हो तो "जमीन के बदले दिया जाने वाला लाभ जमीन मालिक की बेटी को मिलेगा." हालांकि इस लाभ में नौकरी नहीं शामिल है.

कोल इंडिया के अनुसार खदान में काम करना महिलाओं के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. माइंस एक्ट की धारा 46[1] के अनुसार महिलाओं के भूमिगत खदानों में काम पर प्रतिबंध है लेकिन वो अन्य कार्यों में सुबह 6  से शाम 7 बजे के बीच काम कर सकती हैं.

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जन चेतना मंच से जुड़ी सविता रथ पिछले दो दशक से इस इलाके में काम कर रही हैं.

रथो को जिस तरह की मुश्किलें झेलनी पड़ी उसपर सविता बताती हैं, "रथो बाई की मां कोयला भरे ट्रकों से माल उतारकर अपनी जीविका चलाती हैं. उन्हें कुछ समय के लिए नौकरी से निकाल दिया गया था. उनके घर का बिजली और पानी बंद कर दिया गया. एक वक्त था कि पूरे गांव को लगने लगा था कि रथो सबके लिए मुसीबत बन गई है."

जिन महिलाओं को रथो के मामले से हिम्मत मिली, लीलावती सिंह उनमें से एक हैं. अनाधिकारिक तौर पर कंपनी वालों ने कहा कि बेटी का ब्याह कर दो तो उसके पति को नौकरी मिल जाएगी. लीलावती का घरवालों ने तुरंत ब्याह कर दिया. सामाजिक प्रथा के उलट उनके पति उनके घर पर रहने लगे. लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली.

लीलावती बताती हैं, "उन्होंने हमारे परिवार को कोई नौकरी नहीं दी. उन्होंने कहा कि नौकरी केवल जमीन के मालिक और उसकी पत्नी को मिल सकती है. उन दोनों की मृत्यु के बाद उनके बच्चों को. मेरे पिता और पति का देहांत हो चुका है, अब क्या मेरी मां के गुजरने के बाद ही मुझे नौकरी मिलेगी?"

लीलावती ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में कंपनी पर मुकदमा किया है. वो कहती हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़े तो भी वो पीछे नहीं हटेंगी.

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जानकी बाई की कहानी भी रथो और लीलावती से मिलती-जुलती है. उनकी पांच बेटियां हैं लेकिन घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं है.

वो कहती हैं, "हमारी जिंदगी नरक जैसी हो चुकी है हमारे पास खाने के लिए चावल तक नहीं है. हमारे पास न तो आंगवाड़ी की नौकरी है, न कोई पेंशन, न कोई सरकारी राशन. बिना नौकरी के मैं पांच बेटियों को कैसे पालूंगी. एक तरफ तो 'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' की बात करते हैं दूसरी तरफ उन्हें नौकरी नहीं देते."

रथो बाई का संघर्ष भी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. कंपनी ने अभी तक उन्हें नौकरी का ऑफर लेटर नहीं भेजा है. वो एसईसीएल के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला दायर करने पर विचार कर रही हैं.

ये पूछने पर कि क्या वो अपनी और अपने इलाके की सभी महिलाओं को नौकरी मिलन के बाद भी महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगी?  रथो बाई कहती हैं, " पता नहीं. अभी मेरे लिए कुछ और सोचना संभव नहीं."

First published: 8 May 2016, 22:10 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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