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विकास दर या छलावा: आर नागराज

नीरज ठाकुर | Updated on: 14 February 2016, 0:52 IST

इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च के प्रोफेसर डॉक्टर आर नागराज पहले ऐसे अर्थशास्त्री थे जिन्होंने भारत की वृद्धि दर आकलन (अर्थव्यवस्था के विकास) की नई प्रणाली पर सवाल उठाए थे.

डॉ. नागराज के अनुसार, वृद्धि दर आकलन की नई प्रणाली सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Production) की बजाय सकल कीमत संकलन (Gross Value Added) पर आधारित है और विकास की अच्छी तस्वीर पेश करने के लिए आंकड़ों का सहारा लेती है.

सकल कीमत संकलन यानी जीवीए (Gross Value Added) की नई प्रणाली पर डॉ. नागराज की आलोचना को अन्य अर्थशास्त्रियों का भी साथ मिला जिनमें एम्बिट कैपिटल की अर्थशास्त्री ऋतिका मंकर मुखर्जी और मॉर्गन स्टेन्ली में इमर्जिंग मार्केट्स के हेड रुचिर शर्मा और कुछ अन्य अर्थशास्त्री शामिल थे.

हालांकि भारत के मुख्य सांख्यिकीविद (Chief statistician) टीसीए अनंत कुमार इन आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है, “दिक्कत आंकड़ों के साथ नहीं है, दिक्कत ये है कि विश्लेषक को अधिक जटिल गणनाएं करनी पड़ेंगी.”

ऐसे परिदृश्य में कैच के साथ एक साक्षात्कार में नागराज मुख्य सांख्यिकीविद के साथ-साथ सरकार के इस दावे को चुनौती देते हैं. वे बताते हैं कि क्यों भारत की वृद्धि के आंकड़े भरोसे के लायक नहीं है और किस तरह विकास के गलत आंकड़े दिखाकर भारत दूसरा चीन बनता जा रहा है.

साक्षात्कार के संपादित अंश -

आप उन पहले अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने नई जीवीए की नई प्रणाली पर सवाल उठाए थे. हालांकि वृद्धि दर के वित्तीय वर्ष 2012-13, 2013-14 और 2014-15 के संशोधित अनुमान के साथ ही यह विवाद भी खत्म हो गया. लेकिन वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए यह बहस तेज हो गई है, क्योंकि अर्थव्यवस्था के धीमा होने के अनेक संकेत मिलने के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़ों में वृद्धि प्रदर्शित की जा रही है. आपके अनुसार इसके पीछे क्या कारण है?

मैं पहले ही तर्क दे चुका हूं कि ऐसा आर्थिक वृद्धि मापने की नई प्रणाली और जीडीपी की गणना के लिए उपयोग किए जा रहे आंकड़ों के कारण हो सकता है.

आपके EPW और अन्य प्रकाशनों में छपे लेखों में आपने विशेष तौर पर जिक्र किया है कि निर्माण क्षेत्र की जीडीपी मापने की प्रणाली सही नहीं है. जीवीए के ताजा (तीसरी तिमाही) आंकड़ों में निर्माण क्षेत्र में प्रत्याशित 12.6% की वृद्धि दर्ज की गई है. क्या आप इन आंकड़ों के साथ सहमत हैं? यदि नहीं तो अपना दृष्टिकोण बताएं

मैं इन आंकड़ों से सहमत नहीं हूं. मैन्यूफेक्चरिंग सेक्टर की तीसरी तिमाही की वृद्धि दर 12.6% दिखाई गई है, जो क्षेत्रवार भौतिक उत्पादन के अनुमान की तुलना में जान-बूझकर ऊपर की ओर दर्शाई महसूस होती है. उत्पाद वृद्धि भी उद्योग की साख वृद्धि की तुलना में बढ़ी-चढ़ी नजर आती है. मेरे विचार से उत्पाद वृद्धि दर में बढ़ोतरी का कारण कॉर्पोरेट मैन्यूफेक्चरिंग के लिए प्राइवेट कॉर्पोरेट सेक्टर के आंकड़े इस्तेमाल करना है. यह कुल मैन्यूफेक्चरिंग आउटपुट का 69 प्रतिशत है. चूंकि जीडीपी मापने की नई प्रणाली और कार्पोरेट अफेयर मिनिस्टरी के आंकड़ों के उपयोग के कारण कॉर्पोरेट सेक्टर के अनुमान गड़बड़ा गए हैं. मुझे अंदेशा है कि इसी कारण मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का आउटपुट बढ़ा हुआ नजर आ रहा है.

सरकार ने अपने डाटा में जीवीए के क्षेत्रवार अलग-अलग आंकड़े दिए हैं, लेकिन जीडीपी के तिमाही और वार्षिक समेकित आंकड़े ही दिए गए हैं. क्या आप जीडीपी के आंकड़ों की अनुपलब्धि पर प्रकाश डालेंगे?

मुझे लगता है कि यह आंकड़ों की उपलब्धता का मामला है। लेकिन साथ ही, मेरे विचार से दीर्घ अवधि में यह विकास दर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डालेगा.

भारत के मुख्य सांख्यिकीविद कह चुके हैं कि जीडीपी की तुलना में जीवीए अलग है, क्योंकि यह प्रणाली सिर्फ उत्पादन में बढ़ोतरी की बजाय उत्पादों की कीमत में बढ़ोतरी को दर्ज करती है. क्या आप ऊंची उत्पादकता दर की इस व्याख्या पर अपनी आपत्ति बताएंगे?

मुख्य सांख्यिकीविद का क्या मतलब है, मैं अनुमान लगा सकता हूं। मेरे ख्याल से "उत्पादों की कीमत में बढ़ोतरी” से उनका आशय उत्पादन के बाद की प्रक्रियाओं (post production activities) से है, जिसमें रिटेलिंग, सेल एवं सर्विस, ब्रांडिंग आदि भी शामिल हैं. इसलिए मेरा अनुमान है कि इसमें सिर्फ फैक्ट्री में ही नहीं, बल्कि विक्रय बिन्दु तक की कीमत बढ़ोतरी शामिल है. लेकिन इससे विकास दर पर कोई प्रभाव पड़ेगा, इसका मुझे संदेह है.

संयुक्त राष्ट्र के सिस्टम ऑफ नेशनल अकाउंट्स (UN System of National Accounts) के अनुसार फैक्टर कोस्ट पर जीडीपी (पुरानी प्रणाली में प्रयुक्त सिद्धांत) मूलभूत कीमत पर जीवीए (नई प्रणाली में प्रयुक्त सिद्धांत) के समान ही है. इसी तरह, जीडीपी प्रभावित बाजार भाव (पुरानी प्रणाली में प्रयुक्त) जीडीपी (नई प्रणाली में) के लगभग समान है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्ष दर वर्ष की वृद्धि दर समरूप है. दोनों प्रणालियों के बीच अंतर करों में से सब्सिडी घटाना (taxes minus subsidies) है. संभावित रूप से कुछ क्षेत्रों में और तिमाही करों एवं सब्सिडी से कुछ अंतर आ सकता है. लेकिन वे इतने बड़े अंतर नहीं ला सकते, जितनी वृद्धि इस सप्ताह जारी किए गए आंकड़ों में अनुमानित दिखाई गई है.

क्या आप कीमत वृद्धि को अर्थव्यवस्था के विकास का पैमाना मानने के खिलाफ हैं या आप इसकी गणना के तरीके के खिलाफ हैं? कृपया विस्तार से समझाइए.

किताबों के अनुसार, देश में सभी तरह की सूक्ष्म इकाइयों द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं द्वारा प्राप्त सकल कीमत संकलन (GVA) का जोड़ ही सकल घरेलू उत्पाद (GDP) माना गया है. सरकार को चुकाए गए टैक्स और जनता द्वारा प्राप्त की गई सब्सिडी भी जीडीपी का हिस्सा हैं. नेशनल अकाउंट्स की गणना के लिए बेसिक प्राइस पर जीवीए और नई प्रणाली की जीडीपी में अंतर रखा जाता है. पहले यह अंतर फैक्टर कोस्ट पर जीडीपी और मार्केट प्राइस पर जीडीपी के बीच होता था.

इसलिए कीमत बढ़ोतरी के विचार का किसी के द्वारा विरोध का सवाल ही नहीं उठता. यह अर्थव्यवस्था में उत्पादन का मूल सिद्धांत है. मैंने संशोधित नए सिद्धांतों का कभी विरोध नहीं किया. जीडीपी के नए आंकड़ों के संबंध में मैं सिर्फ नई प्रणाली की आलोचना करता हूं जो कहीं न कहीं गलत गणना का कारक बन रही है.

यदि भारत सरकार को अपने आंकड़ों में नीचे की तरफ संशोधन के लिए मजबूर किया जाता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था और निवेशकों पर इसका क्या प्रभाव होगा?

हां, इस तरह का संशोधन अल्पकाल के लिए निवेशकों को दिग्भर्मित कर सकता है, लेकिन भरोसेमंद जीडीपी अनुमान लंबी अवधि तक प्रभाव डालते हैं, निजी और सरकारी दोनों ही क्षेत्रों के नीति-निर्धारकों में. इसलिए किसी को भी अल्प अवधि के प्रभावों की चिंता किए बिना सही आंकड़े दिखाने चाहिए.

चीन पर भी कई साल तक आंकड़ों को गलत ढंग से पेश करने के आरोप लगते रहे हैं, फिर भी वह लगातार दो दशक से शानदार तेज गति से विकास कर रहा है. क्या हम यह कह सकते हैं कि आंकड़ों की विश्वसनीयता उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, विशेषकर तब जब वैश्विक निवेशकों के पास दूसरी जगह निवेश के अधिक विकल्प नहीं हैं?

हां, वृहद स्तर पर माना जाता है कि चीनी आधिकारिक आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता था. लेकिन प्राइवेट एजेंसियां अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन मापने के वैकल्पिक तरीके विकसित कर चुकी हैं. उदाहरण के तौर पर, द इकॉनोमिस्ट ने ली कीक्वांग सूची (Le Keqiang index) का निर्माण किया है, जिसका नाम चीन के लीओनिंग राज्य के गर्वनर के नाम पर रखा गया था. गर्वनर रहते हुए ली ने कहा था कि चीन के जीडीपी आंकड़े मानव-निर्मित हैं और इसी कारण भरोसे के लायक नहीं हैं. उन्होंने कहा था - बैंक कर्ज, रेल भाड़े और बिजली उत्पादन में वृदि्ध चीनी अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन के अधिक विश्वसनीय पैमाने हैं.

मेरा अनुमान है कि विश्वसनीय चीनी आंकड़े प्राइवेट सेक्टर के नीति-निर्धारिकों में अविश्वास की भावना खत्म करने में सहायक होते और अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचाते.

First published: 14 February 2016, 0:52 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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