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एक दिन में रिलायंस ने कमाया 1,050 करोड़ का मुनाफा, कोर्ट की शरण में पहुंचे सात राज्य

आवेश तिवारी | Updated on: 27 August 2016, 7:50 IST

बिजली की तंगहाली से जूझ रहे देश के सात बड़े राज्यों की कीमत पर रिलायंस एनर्जी को तकरीबन 1050 करोड़ रुपए का बेजा मुनाफा देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है. 

रिलायंस की मध्य प्रदेश में स्थित सासन बिजली परियोजना से जुड़े इस बेहद संगीन मामले में उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों ने फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है. लेकिन वहां से भी उन्हें कोई फौरी राहत नहीं मिली है.

इस पूरे मामले के संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार रिलायंस ने वित्तीय वर्ष 2013 के अंत में केवल एक दिन 31 मार्च को अपनी एक इकाई को चलाकर यूपी, एमपी, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और दिल्ली से पूरे एक वर्ष के लिए टैरिफ में छूट हासिल कर ली थी. 

केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग ने जब रिलायंस की इस कारस्तानी पर सवाल उठाते हुए इस टैरिफ प्रक्रिया को रद्द कर दिया तो आश्चर्यजनक ढंग से अपीलेट ट्रिब्यूनल आफ इलेक्ट्रीसिटी ने रिलायंस के पक्ष में फैसला सुना दिया.

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ट्रिब्यूनल के फैलसे के खिलाफ राज्यों को स्टे न देते हुए सुनवाई जारी रखी है. इस पूरे प्रकरण को बेहद गंभीर बताते हुए पावर इंजीनियरिंग फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दूबे ने वाराणसी में बताया कि निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने का यह बेहद गंभीर मामला है इस मामले में समुचित कारवाई की जानी चाहिए.

शासन की शर्तें

बिजली के मोर्चे पर संघर्ष कर रहे राज्यों की उर्जा आवश्यकताओं की बिना पर रिलायंस एनर्जी को मनमाना मुनाफा दिए जाने के इस खेल की कहानी बेहद दिलचस्प है. 

गौरतलब है कि 3960 मेगावाट क्षमता की सासन अल्ट्रा मेगा परियोजना प्रतिस्पर्धात्मक बिडिंग के जरिये रिलायंस को मिली थी तथा सात राज्यों ने इस परियोजना से बिजली खरीदने के लिए 2007 में बिजली खरीद करार किये थे.

करार के अनुसार इन राज्यों को पहले दो वित्तीय वर्ष में 70 पैसे प्रति यूनिट और अगले दो वर्षों तक 120 पैसे प्रति यूनिट की दर पर बिजली मिलनी थी. करार में 25 वर्षों तक बिजली सप्लाई का लेवेलेजाइस्ड टैरिफ 119.6 पैसे प्रति यूनिट तय था. यानि की इन सभी राज्यों को लम्बे समय तक बेहद सस्ती बिजली मिलती. 

एक दिन चलाकर एक साल की वसूली

सासन की पहली इकाई (यूनिट नम्बर 3) 31 मार्च, 2013 को चली किन्तु 660 मेगावाट क्षमता की इकाई 106 मेगावाट क्षमता तक ही चल पाई जो कि रेटेड कैपेसिटी का 16.34 फीसदी है जबकि नियम यह है कि जब कोई इकाई 95 फीसदी क्षमता पर चलाई जाती है उस तारीख को ही वाणिज्यिक संचालन की तारीख माना जाता है. 

लेकिन रिलायंस ने 31 मार्च 2013 को ही कमर्शियल संचालन की तारीख मानने को कहा जिसे केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने रद्द कर दिया और यह टिप्पणी भी की कि यह निर्धारित मापदण्डों का खुला मजाक होगा, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग के फैसले के विरुद्ध रिलायंस ने अपीलेट ट्रिब्यूनल ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी (आपटेल) में अपील की. 31 मार्च 2016 को आपटेल ने रिलायस के पक्ष में निर्णय दिया और 31 मार्च, 2013 को कमर्शियल संचालन की तारीख मान लिया.

आपटेल का फैसला और उपभोक्ताओं की जेब पर डाका

अगर यह राज्य आपटेल के फैसले को मान लेते हैं तो पहले वित्तीय वर्ष में 70 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली देने का अर्थ यह होगा कि सासन से राज्यों को मात्र एक दिन (31 मार्च 2013) 70 पैसे प्रति यूनिट में बिजली मिलेगी और उसे एक वर्ष मान लिया जायेगा क्योंकि 31 मार्च 2013 को कामर्शियल संचालन मान लिया गया है और वित्तीय वर्ष उसी दिन समाप्त हो रहा है.

रिलायंस को मिलने वाले 1050 करोड़ रुपए के अतिरिक्त मुनाफे को सातों राज्यों से उसी अनुपात में वसूला जायेगा जिस अनुपात में उन्हें सासन परियोजना से बिजली मिलती है. 

मध्य प्रदेश को 37.5 फीसदी, पंजाब को 15 फीसदी, उप्र को 25फीसदी, हरियाणा और दिल्ली को 11.25 फीसदी, राजस्थान को 10 फीसदी और उत्तराखण्ड को 2.5 फीसदी बिजली सासन से मिलने का करार है.

इसी अनुपात में मध्य प्रदेश को 394 करोड़ रु, पंजाब को 158 करोड़ रु, उप्र को 131 करोड़ रु, हरियाणा और दिल्ली को 118 -118 करोड़ रु, राजस्थान को 105 करोड़ रु तथा उत्तराखण्ड को 26 करोड़ रु का खामियाजा भुगतना पड़ेगा जो अन्ततः टैरिफ बढ़ाकर आम उपभोक्ताओं से ही वसूला जायेगा.

First published: 27 August 2016, 7:50 IST
 
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