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पंजाबः धार्मिक हिंसा बनी हथियार, केजरीवाल भी बहती गंगा में धो रहे हाथ

राजीव खन्ना | Updated on: 27 May 2016, 8:18 IST
(कैच)

चुनावों की देहरी पर खड़े पंजाब में धार्मिक हिंसा थमने का नाम नहीं ले रहीं. पिछले वर्ष पंजाब धार्मिक ग्रंथों को अपवित्र करने की घटनाओं को लेकर उबल रहा और इस वर्ष यह राज्य विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के प्रमुखों पर हो रहे निरंतर हमलों का गवाह बन रहा है.

हमलों की इस कड़ी की सबसे हालिया घटना पिछले ही सप्ताह धार्मिक उपदेश देने वाले रणजीत सिंह ढंढरियांवाले के साथ हुई. हालांकि लुधियाना के समीप उनके काफिले पर हुए हमले में वे बाल-बाल बच गए लेकिन उनके एक करीबी सहयोगी भूपिंदर सिंह को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

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ढंढरियांवाले के काफिले पर करीब एक दर्जन हमलावरों ने राहगीरों को शरबत पिला रहे एक ‘छबील’ के समीप हमला किया. जैसे ही उनकी कार धीमी हुई हमलावरों ने खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाते हुए उनपर गोली चलाई.

भिंडरांवाले जत्थे का हाथ

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक समय जरनैल सिंह भिंडरांवाले जैसे शीर्ष आतंकी को पालने-पोसने वाले दमदमी टकसाल के प्रमुख भी इन हमलावरों के समर्थन में सामने आ गए हैं. हरनाम सिंह धुम्मा ने कथित तौर पर माना है कि 17 मई के इस हमले में उनके समर्थकों का हाथ था.

धुम्मा ने कुछ मीडियाकर्मियों से कहा, ‘‘हमलावरों में से कुछ टकसाल के छात्र हैं. यहां तक कि वाहन भी टकसाल के ही हैं लेकिन मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी.’’ भिंडरांवाले 1977 से जून 1984 में आॅपरेशल ब्लूस्टार के दौरान मारे जाने तक इस टकसाल के अध्यक्ष रहा था.

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धुम्मा ने कथित तौर पर कहा है कि यह हमला उनके द्वारा टकसाल की ‘दस्तर’ (पगड़ी) को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों और उनके द्वारा देश के भीतर और बाहर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का नतीजा है.

केजरीवाल का गुपचुप दौरा

इस हमले के बाद से ही तमाम पार्टियों के नेताओं में ढंढरियांवाले से मुलाकात करते हुए इस हमले की निंदा करने और उन्हें अपना समर्थन पेश करने की होड़ लग गई. 

राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के अलावा कांग्रेस नेता परनीत कौर और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी उनसे मुलाकात करने वालों में रहे.

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केजरीवाल बिना किसी शोर-शराबे के बेहद चुप्पी के साथ बुधवार को पटियाला के गुरुद्वारा परमेश्वर द्वार में ढंढरियांवाले से मिलने पहुंचे. राज्य के अपने दौरे का जरूरत से ज्यादा प्रचार-प्रसार करने वाले केजरीवाल ने इस बार मीडिया को बिल्कुल नजरअंदाज करते हुए खुद को इस धार्मिक उपदेशक के साथ करीब 20 मिनट तक चली वार्ता तक ही सीमित रखा.

धुम्मा ने इस मुलाकात पर बेहद कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कथित रूप से कहा, ‘‘यह सब नेता उस समय कहां थे ढंढरियांवाले ने मेरे खिलाफ टिप्पणियां की थीं?’’

बार-बार होती घटनाएं

ढंढरियांवाले पर हुए हमले से कुछ समय पहले अप्रैल में नामधारी संप्रदाय के पूर्व प्रमुख सतगुरु जगजीत सिंह की 88 वर्षीय पत्नी चांद कौर की हत्या कर दी गई थी. 

उनकी हत्या लुधियाना के नजदीक भैनी साहिब स्थित नामधारी संप्रदाय के मुख्यालय में गोली मारकर कर दी गई थी और उनके हत्यारे अबतक कानून के शिकंजे से बाहर हैं.

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बीते कुछ वर्षों में पंजाब विभिन्न समुदायों के अनुयाइयों की हिंसा का साक्षी बनता आया है. 

वर्ष 2009 में डेरा सच खंड से जुड़े रविदासी उपदेशक संत रामानंद की वियना में हुई हत्या के विरोध में राज्य को बड़े पैमाने पर हिंसा और आगजनी से गुजरना पड़ा था.

इससे पहले भी यहां कट्टरपंथीं सिक्खों और डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम के अनुयाइयों के बीच हिंसक झड़पें होती आई हैं.

बीते वर्ष धार्मिक पुस्तकों को अपवित्र करने की घटनाओं के चलते भी राज्य का माहौल कई महीनों तक तनावपूर्ण रहा था. सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है लेकिन वह भी अभी तक किसी को भी गिरफ्तार करने में नाकाम ही रही है.

दबाव में हैं अकाली

हिंसा की घटनाओं में विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के अनुयाइयों के शामिल होने के चलते राज्य में सत्तारूढ़ अकाली गठबंधन सबके निशाने पर है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तो एक कदम आगे जाते हुए पंजाब की बिगड़ती हुई कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर श्वेत पत्र की मांग तक कर दी है. 

उनकी पत्नी और पटियाला की पूर्व सांसद परनीत कौर ने वायदा किया है कि उनकी पार्टी दोषियों को हर हाल में कानूनी शिकंजे में लाएगी. 

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इतने संवेदनशील मामले पर राजनीति नहीं करना चाहती लेकिन इसी के साथ वह इस मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को नजरअंदाज भी नहीं कर सकती.

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कई नेताओं ने तो राज्य की बिगड़ती हुई कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर चर्चा करने के लिये विधानसभा का एक विशेष सत्र आहूत करने की मांग भी उठाई है. हालांकि बादल ने यह कहते हुए इस मांग को ठुकरा दिया है कि ऐसा करने से कोई उद्देश्य हल नहीं होगा और राज्य सरकार पहले ही इस मुद्दे पर गंभीरता से काम कर रही है.

बादल ने तमाम विपक्षी दलों से इस संवेदनशील मुद्दे पर संयम बरतने की अपील करते हुए कहा है कि ऐसा न होने की स्थिति में इस मामले का राजनीतिकरण करने के प्रयास में दिया गया कोई भी गैरजिम्मेदाराना या अनुचित बयान राज्य के सौहार्दपूर्ण माहौल में आग लगा सकता है.

अकाल तख्त का हस्तक्षेप

ढिंढरियांवाले पर हुए हमले का जिक्र करते हुए राजनीतिक विश्लेषक जगतार सिंह कहते हैं, ‘‘इतने संवेदनशील मामले में भी बादल सरकार तलवार की धार पर चल रही है क्योंकि अगर इस मामले को ठीक तरीके से नहीं संभाला गया तो स्थितियां कभी भी हाथ से निकल सकती है.’’

आखिरकार स्थिति को शांत करने के लिये सिक्खों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल अकाल तख्त को बीच में आना ही पड़ा. 

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने कथित तौर पर कहा है कि धुम्मा और ढंढरियांवाले, दोनों को ही वार्ता के लिये बुलाया जाएगा और समस्या का एक समाधान भी निकाला जाएगा.

उन्होंने इन दोनों को ही कैसा भी बयान जारी करने से बचने की सलाह देते हुए समुदय में किसी भी प्रकार के विभाजन की स्थित न आने देना सुनिश्चित करने के लिये कहा है.

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एक तरफ अकाल तख्त अकालियों को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) जैसी सिख संस्थाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है ढिंढरावाले का आम जनमानस पर काफी व्यापक प्रभाव है. 

बीते वर्ष पवित्र पुस्तकों के अपमान को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान वे काफी मुखर थे. 

पर्यवेक्षकों का कहना है कि वह ढिंढरावाले के अनुयाइयों की बड़ी संख्या ही है जिसने राजनीतिज्ञों को उनका रुख करने को मजबूर किया है जबकि बादल हमेशा से ही टकसाल प्रमुख के नजदीकी माने जाते रहे हैं.

राजनीतिक महत्ता

बीते कुछ समय में पूरे पंजाब में विभिन्न धार्मिक संप्रदाय काफी बड़ी संख्या में बढ़े हैं जिनके डेरों में मुख्यतः गैर-जाट और उच्च वर्ग के लोग शामिल हो रहे हैं.

एक राजनीतिक पर्यवेक्षक कहते हैं, ‘‘गुरुद्वारे और सिक्खों के विभिन्न संस्थानों में उच्च वर्गों का प्रभुत्व रहता आया है जिन्हें अपने प्रबंधन और कामकाज में दलितों और दूसरे पिछड़े वर्गों को जगह देना पसंद नहीं है. इसी वजह से गैर-जाट समुदाय के लोग काफी बड़ी संख्या में इन डेरों का रुख करते आए हैं जिसके चलते ये डेरे सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक रूप से काफी प्रभावी हो गए हैं. चुनावी वर्षों में रानजीक दल इनका समर्थन लेने के लिये इन डेरों के प्रमुखों को लुभाने की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते.’’

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उन्होंने आगे बताया कि लोग अपने बच्चों के लिये शिक्षा और नौकरियों, अपनी बेटियों की शादी के लिये सुयोग्य वर तलाशने और इन सबसे ऊपर सस्ती और अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने जैसे विभिन्न कारणों के चलते इन डेरों के अनुयायी बन रहे हैं. वे आगे बताते हैं, ‘‘इनमें से अधिकतर डेरे समय-समय पर स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करने के अलावा धर्मार्थ चिकित्सालयों का संचालन भी करते हैं.’’

First published: 27 May 2016, 8:18 IST
 
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