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1965 भारत-पाक युद्ध: इस साल मेरी जिंदगी से सारी मासूमियत काफूर हो गई

तिलक देवाशर | Updated on: 7 September 2016, 8:14 IST

वर्ष 1965 में मैं दस साल का था, छरहरा और दुबला-पतला. अजमेर के मेयो कॉलेज में दूसरी कक्षा में पढ़ता था. सुखद और सीधी-साधी जिन्दगी. नजरें हमेशा ही इस बात पर कि भोजन में अगली बार क्या मिलेगा, (यदि आप बोर्डिंग स्कूल में रहे हैं, तो यह व्यथा अच्छी तरह समझ सकते हैं).

खेलों के पहले कुनकुना दूध पीने से आनाकानी और खुले थियेटर में शनिवार रात फिल्म देखने का इंतजार. महीने में एक बार पॉकेट मनी- 50 पैसा, (हां, पचास पैसे), राजसी ठाठ जैसा, जो शनिवार रात फिल्म देखने के दौरान कोक और कचौरी खाने में खर्च होते थे.

क्या मजा था, राजाओं जैसा, एक हाथ में कोक और दूसरे हाथ में कचौरी लेकर फिल्म देखना. इससे सुखद जीवन और हो भी क्या सकता था. लेकिन, 1965 के भारत-पाक युद्ध ने सब कुछ बदल कर रख दिया.

भोलापन चकनाचूर

इसका पहला संकेत तब मिला, जब मेरी मां ने मुझे यह बताने के लिए लिखा कि मेरे पिता (एयर वाइस मार्शल स्व. सीजी देवासर, पीवीएसएम, एवीएसएम), जो भारतीय वायु सेना में थे, को नेशनल डिफेन्स कॉलेज, नई दिल्ली से समय से पूर्व वापस बुला लिया गया और उनका प्रमोशन कर उन्हें पाकिस्तान के साथ चलते तनाव और युद्ध की आशंका के कारण अम्बाला में तैनात कर दिया गया.

अम्बाला? कहां है वह? और युद्ध? बिग्गलेस की किताबों और कॉमिक्स में युद्ध के बारे में पढ़ा था, उसमें दूसरे विश्वयुद्ध के बारे में बताया गया था. क्या यह हकीकत की जिन्दगी में हो सकता है? आगे का घटनाक्रम, मेयो कालेज का हमारा बोर्डिंग बहुत बड़ा था. हेल्पर्स ने कॉलविन हाउस के सामने वाले भाग में खाइयां खोदनी शुरू कर दी थी. उस समय इन खाइयों में कूदने और उसमें से बाहर निकलने में बड़ा मजा आता था. और यह सिलसिला हवाई हमले शुरू होने तक चलता रहा था, विशेषकर रात के समय.

लेकिन तब इसमें कोई मजा नहीं रहा जब नींद से भरे सैकड़ों अन्य लड़कों के साथ हमें घनघोर अंधेरे में अपनी खाई को तलाश करने की कोशिश करने को कहा गया. एक शाम हमारे प्रिंसिपल मि. गिब्सन अचानक हमारे घर मुझे तैयार करने और काफी नम्रता से यह बताने के लिए आए कि मेरे मित्रों में से एक के अंकल पाकिस्तान के साथ युद्ध में मारे गए है. उस समय तक हममें से किसी ने भी इतनी निकटता से न तो मौत को देखा था और न ही मौत के बारे में कुछ जानते थे. मुझे भी मौत के बारे में नहीं मालुम था. तब हमें मौत और उसके असर के बारे में पूरी तरह से एहसास हुआ. लेकिन वह भोलापन हमेशा के लिए चकनाचूर हो गया.

वह अम्बाला के ऑफिसर्स मैस में रुके हुए थे कि एक रात पाकिस्तान की वायु सेना ने हवाई हमले कर दिए

मुझे बाद में मेरे पिता की मौत के बारे में बताया गया. वह अम्बाला के ऑफिसर्स मैस में रुके हुए थे कि एक रात पाकिस्तान की वायु सेना ने हवाई हमले कर दिए. पाक वायु सेना ने सैन्य अस्पताल और चर्च के साथ ही गलत जगह पर अपना निशाना साधा था, एक बम ऑफिसर्स मैस के बिल्कुल निकट आकर गिरा. और एक बम का टुकड़ा सनसनाता हुआ मेरे पिता के बगल में आ गिरा. वह बच नहीं पाए. सालों तक मैं इस बम के टुकड़े को पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करता रहा.

मैंने अपने पिता से पाकिस्तान एयर फोर्स के दो अधिकारियों असगर खान और नूर खान (दोनों ही आगे चलकर पाकिस्तानी वायुसेना के मुखिया बने) के बारे में कहानियां सुनी थी. मेरे पिता ने रॉयल इंडियन फोर्स में दोनों के साथ काम किया था. असगर खान 9 स्क्वाड्रन फ्लाइंग ह्यूरीकैन्स में फ्लाइट कमांडर थे जो दूसरे विश्वयुद्ध में बर्मा में तैनात थी और नूर खान 4 स्क्वाड़्रन फ्लाइंग स्पिटफायर्स में फ्लाइट कमांडर थे.

1965 के युद्ध के दौरान एयर मार्शल नूर खान पाकिस्तानी वायु सेना के मुखिया थे. उ्न्होंने जुलाई 1965 में एयर मार्शल असगर खान से कार्यभार संभाला था.

अदृश्य मानसिक आघात

अपने पिता के निधन के बाद मैंने 1944-45 के समय की उनकी लॉग बुक देखी और असगर खान तथा नूर खान ने जो कमेन्ट्स लिखे थे और हस्ताक्षर किए थे, उसे भी देखा. असगर खान या नूर खान ने अपने बारे में या मेरे पिता के बारे में कहीं-कहीं जो जिक्र किया था, उसे देखकर मैं एकाएक कल्पना के सागर में खो गया. मैं इस बात के लिए तैयार था कि उन्हें मेरे पिता की बड़े प्रेम के साथ याद आती होगी और इस क्षणिक याद में वे मेरे पिता को बड़ी दूर से अपनी आंखों में देख लेते होंगे.

लेकिन वह क्षण, क्षण ही रह गया. हकीकत की दुनिया तो सामने है. जो खाइयां खोदी गईं थी, उसे जल्द ही भर दिया गया. हवाई हमलों के सायरन बजने रुक गए. खाइयों से मुझे जो आनन्द मिलता था, वह मजा मिलना बंद हो गया. लेकिन मैं खुश था कि खाइयां अब नहीं हैं. इसका मतलब यह था कि युद्ध खत्म हो गया है.

मैं जब अपनी शीतकालीन छुट्टियों में अम्बाला आया था तो मैंने अपने पिता से युद्ध के बारे में ढेरों कहानियां सुनी थीं. हवाई हमलों के बारे में, डॉग फाइट्स के बारे में, और यह भी हमारे पॉयलट्स और सिपाही कितनी वीरता के साथ लड़ते थे. वीरता की ऐसी कहानियां सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे.

लेकिन हालात बदल गए, मेरे में भी बदलाव आ गया. बचपन का बांकपन नदारद हो गया

युद्ध में जो कुछ क्षति हुई थी, उसके निशान तीन माह में ही हर कहीं दिखने लग गए थे. मैंने देखा कि बम गिरने से क्षतिग्रस्त हुए चर्च की मरम्मत की जानी बाकी थी. भाग्यवश, सैन्य अस्पताल की मरम्मत हो गई थी और वह तुरन्त ही चलने भी लगा था. मैंने आफीसर्स मैस पर पड़े वह निशान भी देखे जहां हवाई हमला हुआ था और मेरे पिता रुके हुए थे तथा अपना जीवन खो दिया था.

लेकिन हालात बदल गए, मेरे में भी बदलाव आ गया. बचपन का बांकपन नदारद हो गया. मैंने सैनिक अस्पातल में पड़े घायल सैनिकों को देखा था और उनके बारे में सुना भी था. चर्च के बाहर जो बम गिरा था, उसे भी देखा था. मैंने मृत्यु के बारे में जाना था और यह अहसास हुआ कि व्यक्तिगत रूप से यह हमारे कैसे निकट आती है.

10 साल के बच्चे की वह जिन्दगी फिर लौटकर आएगी क्या कभी? आज, जब मैं पचास साल पहले की ओर स्मृतियों को कुरेदता हूं तो अच्छी तरह यह देख सकता हूं कि एक दुबला-पतला, छरहरा 10 वर्षीय बालक खाइयों में कूदता है, उसमें से निकलता है और यह अनुभूति उत्पन्न करने की कोशिश करता है कि संसार में क्या हुआ है और यह भावनात्मक रूप से हमसे कितना जुड़ा हुआ है. जिसका 1965 के भारत-पाक युद्ध ने सब बदलकर रख दिया जो जिन्दगी में फिर कभी वापस नहीं आ सकता है.

(लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं. आवश्यक नहीं कि किसी संगठन से मेल खाते हों.)

First published: 7 September 2016, 8:14 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

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