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राजपथ पर NSG का दिखा जलवा, जानिए कैसे तैयार होते हैं जांबाज ब्लैक कैट कमांडो

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 January 2017, 15:37 IST
(पीटीआई)

गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार आतंकवाद समेत आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने वाले कमांडो दस्ते एनएसजी (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) के जवानों ने अपना जलवा बिखेरा. 

एनएसजी यानी राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की स्थापना 16 अक्टूबर 1984 को हुई थी. काली पोशाक में ढके रहने वाले और पूरे शरीर में कई किस्म के रक्षा-कवचों से लैस एनएसजी कमांडोज का एक ही नारा है, "वन फॉर ऑल, ऑल फॉर वन." 

1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों की कैद से मुक्त कराने के लिए जब भारतीय सेना ने कार्रवाई की, तो वह कार्रवाई कामयाब तो रही, लेकिन इस दौरान बहुत से जवान शहीद हुए. 

इससे भी बड़ी बात यह हुई कि अमृतसर के ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर को भारी नुकसान हुआ. इस ऑपरेशन के बाद ही यह तय किया गया कि देश में एक ऐसी फोर्स होनी चाहिए, जो खतरनाक और संवेदनशील मौकों पर सफाई से कार्रवाई कर सके. 

अस्सी के दशक में पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, इसलिए तात्कालिक रूप से इस ‘इलीट फोर्स’ को लेकर जो कल्पना की गयी, वह यही थी कि यह नयी और ताकतवर फोर्स आतंकवाद से निपटने में सिद्धहस्त होनी चाहिए. आइए जानते हैं कि कैसे तैयार होते हैं एनएसजी के जांबाज ब्लैक कैट कमांडो...

53 फीसदी सेना के जवान

एनएसजी कमांडोज की ट्रेनिंग बहुत ही कठोर होती है. सबसे बड़ा मकसद यह होता है कि अधिक से अधिक योग्य लोगों का चयन हो. ठीक उसी तरह से कमांडोज फोर्स के लिए भी कई चरणों में चुनाव होता है. सबसे पहले जिन रंगरूटों का कमांडोज के लिए चयन होता है, वह अपनी-अपनी सेनाओं के सर्वश्रेष्ठ सैनिक होते हैं. इसके बाद भी कई दौर के बाद उनको चुना जाता है. आखिर में ये जवान जब ट्रेनिंग के लिए मानेसर पहुंचते हैं तो यह देश के सबसे कीमती और जांबाज सैनिक होते हैं.

जरूरी नहीं है कि ट्रेनिंग सेंटर पहुंचने के बाद भी कोई सैनिक अंतिम रूप से कमांडो बन ही जाए. नब्बे दिन की कठोर जोर-आजमाइश के के पहले भी एक हफ्ते की ऐसी ट्रेनिंग होती है जिसमें 15-20 फीसदी सैनिक अंतिम दौड़ तक पहुंचने में रह जाते हैं. इसके बाद जो सैनिक बचते हैं और अगर उन्होंने नब्बे दिन की ट्रेनिंग कुशलता से पूरी कर ली तो फिर ये सैनिक ऐसे खतरनाक कमांडोज में ढलते हैं, जिनकी किताब में नाकामी का नामोनिशां नहीं होता.

एनएसजी की स्थापना देश की तमाम फोर्सेज से खास जवानों को छांटकर किया जाता है. एनएसजी में 53 प्रतिशत कमांडो सेना से आते हैं जबकि 47 प्रतिशत कमांडो चार पैरा मिलिटी फोर्सेज- सीआरपीएफ, आईटीबीपी, रैपिड एक्शन फोर्स और बीएसएफ से आते हैं. इन कमांडोज की अधिकतम कार्यसेवा पांच साल तक होती है. 

पांच साल भी सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत को ही रखा जाता है, शेष को तीन साल के बाद ही उनकी मूल सेनाओं में वापस भेज दिया जाता है.

90 दिन की सख्त ट्रेनिंग

किसी भी चुने हुए रंगरूट को एनएसजी कमांडो बनने से पहले नब्बे दिन की विशेष ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी करनी होती है जिसकी शुरुआत में 18 मिनट के भीतर 26 करतब करने होते हैं और 780 मीटर की बाधाओं को पार करना होता है. 

अगर चुने गये रंगरूट शुरुआत में यह सारा कोर्स बीस से पच्चीस मिनट के भीतर पूरा नहीं करते, तो उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है. प्रशिक्षण के बाद इन्हें अधिक से अधिक 18 मिनट के भीतर ये तमाम गतिविधियां निपटानी होती हैं.

अगर किसी कमांडो को ए-श्रेणी हासिल करनी है तो उसे यह पूरा कोर्स नौ मिनट के भीतर पूरा करके दिखाना होता है. इस प्रारंभिक कोर्स में जो बाधाएं होती हैं, वे सब एक जैसी नहीं होतीं. इन बाधाओं में कोई तिरछी होती है तो कोई सीधी. कोई ऊंची होती है तो कोई जमीन से सटी हुई. 

अलग-अलग तरह की 780 मीटर की इस बाधा को एनएसजी के ट्रेनिंग रंगरूट को अधिकतम 25 मिनट के भीतर और अच्छे कमांडोज में शुमार होने के लिए 9 मिनट के भीतर पूरी करनी होती है.

किसी भी चुने गये कमांडो को नब्बे दिनों की अनिवार्य ट्रेनिंग के दौरान पचास से बासठ हजार जिंदा कारतूसों का अपनी फायर प्रैक्टिस में प्रयोग करना होता है. जबकि किसी सामान्य सैनिक की पूरी जिंदगी में भी इतनी फायर प्रैक्टिस नहीं होती. कई बार तो एक दिन में ही एक रंगरूट को दो से तीन हजार फायर करना होता है.

25 सेकेंड में 14 टारगेट पर निशाना

आम सैनिक जहां फायर प्रैक्टिस के लिए पारंपरिक चांदमारी का इस्तेमाल करते हैं, वहीं एनएसजी कमांडोज की फायर प्रैक्टिस बहुत ही जटिल और बहुत ही उन्नत होती है. कमांडोज को पच्चीस सेकेंड के भीतर चौदह अलग-अलग टारगेट हिट करने होते हैं और ये चौदह टारगेट सारे के सारे अलग-अलग तरीके के हो सकते हैं.

इन सभी टारगेट को एक साथ हिट करने में कमांडोज को ढाई से तीन सेकेंड का ही समय अधिकतम मिलता है. अगर कोई कमांडो एक प्रयास में दस से कम टारगेट हिट कर पाता है तो उसे उतनी ही बार और ज्यादा फायर प्रैक्टिस करनी होती है, जब तक वह न्यूनतम टारगेट न हिट कर ले.

कमांडोज की मानसिक ट्रेनिंग भी बेहद सख्त होती है. उनमें कूट-कूट कर देशभक्ति का जज्बा भरा जाता है. अपने कर्तव्य के प्रति ऊंचे मानदंड रखने की लगन भरी जाती है. दुश्मन पर हर हाल में जीत हासिल करने की महत्वाकांक्षा भरी जाती है और आखिर में अपने कर्तव्य के प्रति हर हाल में ईमानदार बने रहने की मानसिक ट्रेनिंग मिलती है. 

इस दौरान इन कमांडोज को बाहरी दुनिया से आमतौर पर बिल्कुल काट कर रखा जाता है. न उन्हें अपने घर से संपर्क रखने की इजाजत होती है और न ही उन सैन्य संगठनों से, जहां से वे आते हैं.

किसी सामान्य जवान को अपनी बीस साल की समूची सर्विस में जितनी ट्रेनिंग से नहीं गुजरना पड़ता है, उससे कई गुना ज्यादा किसी राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के कमांडो को अपनी तीन साल की सर्विस के दौरान ही गुजरना पड़ता है. 

एसएजी और एसआरजी में फर्क

एनएसजी में भी दो हिस्से हैं- एक है-एसएजी यानी स्पेशल एक्शन ग्रुप और दूसरा है एसआरजी यानी स्पेशल रेंजर्स ग्रुप. एसएजी में भारतीय सेनाओं से चुने गये सैनिकों को रखा जाता है और एसआरजी में भारत के विभिन्न अर्द्घ सैन्य बलों से चुने गये सैनिकों को लिया जाता है. 

दोनों के काम में भी थोड़ा अंतर है. हालांकि दोनों के लिए प्रशिक्षण एक जैसा होता है. मौका पड़ने पर दोनों एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर काम करते हैं. आमतौर पर एसएजी को उन तमाम खतरनाक ऑपरेशन में भेजा जाता है, जिसमें मौके पर ही किसी कार्रवाई को अंजाम देना होता है. इस तरह के ऑपरेशन मुख्य रूप से आतंकवादी वारदातों के वक्त होते हैं.

दूसरी तरफ एसआरजी को मुख्य रूप से वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा में तैनात किया जाता है. एनएसजी में शामिल होने वाले निरीक्षक स्तर के अफसरों की अधिकतम उम्र 35 साल होती है जबकि आमतौर पर कार्रवाई करने वाले कमांडो की उम्र इससे काफी कम होती है. एनएसजी का मुख्यालय दिल्ली से करीब 50 किलोमीटर दूर हरियाणा के मानेसर में स्थित है.

राजीव गांधी जब देश के प्रधानमंत्री बने तो केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इजरायल में मौजूद स्पेशल कमांडो फोर्स की तर्ज पर भारत में भी कमांडो फोर्स के गठन की बात कही गयी थी. इसी रिपोर्ट के आधार पर 1984 के आखिर में राजीव गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के गठन की घोषणा कर दी. 

एनएसजी ने हाल के दिनों में कई आतंकवादी हमलों के दौरान अपनी जांबाजी का प्रदर्शन किया है. खासकर 26 नवंबर 2011 के मुंबई आतंकी हमले ने हर किसी को एनएसजी के अदम्य साहस से परिचित कराया था.

First published: 26 January 2017, 15:37 IST
 
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