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कन्हैया की जमानत का फैसला सुरक्षित करना कितना 'न्यायसंगत'

सौरभ दत्ता | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जमानत अर्जी पर अपना फैसला को दो मार्च तक के लिए सुरक्षित रखा है.

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस प्रतिभा रानी ने दिल्ली पुलिस से पूछा, "क्या आपको पता है कि 'राजद्रोह' क्या है?"

अदालत ने ये भी पूछा कि "जब आप के लोग मौके पर मौजूद थे तो उन्होंने टीवी चैनल पर वीडियो चलाए जाने का इतंजार क्यों किया?"

अदालत कार्रवाई को मीडिया में काफी तवज्जो मिली. अदालत के ऐसे सवालों से कुछ लोगों को लग सकता है कि कन्हैया को दो मार्च को जमानत मिल ही जाएगी. अदालत का क्या फैसला देगी ये तो दो मार्च को पता चलेगा?

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अगर अदालती कार्रवाई को थोड़ी बारीकी से देखा जाए तो कुछ चिंताजनक सवाल सामने आते हैं.

अदालत की कार्रवाई के दौरान किए गए कुछ कमेंट से किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ये ध्यान रखना जरूरी है कि ये जरूरी नहीं कि अदालत का फैसला उसके अनुरूप ही हो.

एक सवाल ये भी है कि क्या जमानत पर फैसला सुरक्षित रखना सही है?

कानूनी कहावत है कि 'जमानत में देरी, जमानत ने देना' है. कुछ उसी आधार पर जैसे 'न्याय में देरी, न्याय न देना है'

जस्टिस रानी के फैसला सुरक्षित रखने से कन्हैया को जेल में दो दिन और गुजारने होंगे.

क्या इस फैसले के पीछे कोई ठोस आधार है? क्या अदालत ने इसका कोई आधार बताया है?
इन दोनों सवालों का जवाब 'ना' हैं.

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संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजी स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है. अगर कन्हैया को जमानत मिल भी जाती है तो भी उसकी निजी स्वतंत्रता को बाधित करते हुए दो और दिनों तक जेल में रखना अन्याय है.

किसी भी न्यायिक फैसले का औचित्य उसके लिए दिए कारणों से तय होता है. और जस्टिस रानी के फैसले में अभी इस बाबत कोई जानकारी नहीं है.

मौजूदा कानूनों के तहत अदालत किसी सुरक्षित रखे गए फैसलों को किसी समयसीमा के अंदर देने के लिए बाध्य नहीं है.

आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश बत्रा मामले में पिछले साल 16 फरवरी को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोई व्यक्ति सुरक्षित रखे गए फैसले के बारे में कोई जानकारी नहीं मांग सकता.

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हालांकि उच्चतम अदालत का ये फैसला उसके ही साल 2001 में दिए फैसले के प्रतिकूल है सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में अनिल राय बनाम बिहार सरकार मामले में फैसला देते हुए का था कि किसी मामले में गैर-वाजिब देरी से वादी का न्यायपालिका की वैधानिकता पर से भरोसा उठ जाएगा.
 
जहां तक कन्हैया और जमानत के दूसरे मामलों का सवाल है, अदालत के फैसले में ये स्पष्ट नहीं है कि 'गैर-वाजिब देरी' किसे समझा जाएगा?

जमानत के संदर्भ में इसपर भारत की सर्वोच्च अदालत को अभी विचार करना है. जस्टिस रानी के फैसले से इसकी जरूरत और बढ़ गयी है.

First published: 1 March 2016, 3:34 IST
 
सौरभ दत्ता @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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