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भारतीयों को शराब पीना भी पसंद है और छिपाना भी

लमट र हसन | Updated on: 19 June 2016, 8:43 IST

उपन्यासकार अमित चौधरी में खामियां जन्मजात हैं. एक, उनके दिल की मरमर (असमान्य आवाज) और दूसरी, शराब के प्रति उनकी नापसंदगी. उनकी पहली खामी काफी पहले दूर हो चुकी है लेकिन दूसरी अभी तक बरकरार है. 

अमित चौधरी ने शराबप्रेमी भारत की कहानी को अपनी नई किताब "हाउस स्पिरिट: ड्रिंकिंग इन इंडिया" में पेश किया है. ये किताब मयनोशी पर अपने तरह की पहली भारतीय एंथॉलजी है. इसके संपादक पलाश कृष्ण मल्होत्रा हैं और प्रकाशक स्पीकिंग टाइगर.

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मयनोशी से जुड़ी कहानियों, कविताओं और निबंधों की इस किताब में खट्टे-मीठे हर तरह के अनुभव हैं. इसमें भारत की बहुरंगी तबीयत झलकती है. वो भारत जहां पीने वाले मदिरालय तक पहुंचने के लिए चार घंटे तक भी सफर कर सकते हैं. 

वो भारत जहां अपने रोज के कोटे की शराब पाने के लिए लोग कानून को चकमा देने से नहीं घबराते. जहां मयनोशी खुशी या गम दोनों की सबसे सटीक अभिव्यक्ति है.

सात साल बाद

पलाश कृष्ण के लिए मयनोशी की एंथॉलजी तैयार करना आसान नहीं था क्योंकि भारतीय शराब के संग अपनी यारी को पर्दे में रखने के कायल हैं.

हर लेखक के पास शराब पर न लिखने का अपना बहाना था. एक लेखिका ने पलाश से कहा, "पलाश, सच तो ये है कि मैं उतना नहीं पीती." वहीं कुछ ने कहा कि आजकल उनकी कलम थम सी गई है. वो राइटर ब्लॉक से जूझ रहे हैं.

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ऐसी ही छोटी-मोटी तमाम वजहों से पलाश को ये एंथॉलजी तैयार करने में करीब सात साल लग गए. किताब के परिचय में पलाश लिखते हैं, "पेश है भारत की मयनोशी पर पहली एंथॉलजी. ये सात साल पुरानी है, ओल्ड मॉन्क की तरह."

शराबी

फिल्म समीक्षक मयंक शेखर ने बताया है कि भारत में शराब को किस तरह देखा जाता है. मयंक के हिसाब से भारतीयों का शराब के प्रति रवैया शराबी फिल्म के गाने "नशा शराब में होता तो नाचती बोतल" से व्यक्त होता है.

मयंक के अनुसार उन्हें पांच-छह साल की उम्र से ही शराब की तासीर मालूम हो गई थी. बचपन में जब उनसे कोई गाना सुनाने को कहा जाता था तो यही गाना शुरू कर देते थे कि "जहां चार यार मिल जाएं वहीं रात हो गुलजार. जहां चार यार..."

अपने निबंध 'बूज, बॉलीवुड, बॉम्बे एंड आई' में मयंक लिखते हैं कि वो गाने के साथ शराब की बोतल लेकर लहराकर नाचते थे.

हिंदी फिल्मों में शराबी के रोल के लिए मशहूर जॉनी वाकर ने कभी शराब नहीं पी थी. वहीं केश्टो मुखर्जी और जयदीप भी शराब नहीं पीते थे. मयंक लिखते हैं, "शराबी (1984) के मशहूर रोल से पहले अमिताभ भी शराब छोड़ चुके थे. उसके बाद अमिताभ ने 'हम' (1991) में नशे में धुत्त होने का अभिनय करते हुए फिल्म का मशहूर मोनोलॉग 'गंदी नाली के कीड़े' बोला था."

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समय के साथ बॉलीवुड का शराब के प्रति नजरिया भी बदला. जहां लीडर (1964) में दिलीप कुमार विनम्र अनुरोध करते हैं, "मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो, मैं पीता नहीं हं. पिलायी गई है." वहीं द शौकीन (2014) में अक्षय कुमार अकुंठ भाव से कहते हैं, "मैं अल्कोहलिक हूं, हां, हां, मैं अल्कोहलिक हूं."

सिद्धार्थ भाटिया के अनुसार हिंदी सिनेमा में मयनोशी सुख, दुख, अच्छे-बुरे, गंभीर-मजाक लगभग हर परिस्थिति में फिट बैठ जाती है.

सिद्धार्थ लिखते हैं, "अगर शराब का गिलास महिला के हाथ में है तो इसका मतलब वो हाथ से निकल चुकी है. ऐसा नहीं होता कि शराब रोजमर्रा की खाने-पीने की चीज की तरह पेश की जाए और उसके पीछे कोई वजह न हो."

सिद्धार्थ के अनुसार इसका एकमात्र अपवाद विक्की डोनर है, जिसमें अक्सर एक दूसरे से लड़ने वाली सास और बहू दोस्तों की तरह एक साथ बैठकर पीती हैं.

मीलों का सफर

कनिका गहलौत ने करीब 20 साल पीने के बाद शराब छोड़ दी. भले ही वो हर साल शराब से पहले से दूर होती जा रही हैं लेकिन 20 सालों का अनुभव इस एंथॉलजी में लिखने के लिए काफी था.

कनिका लिखती हैं, "मेरे लिहाज से शराब एक थकाऊ, निरर्थक और निरुद्देश्य शय है, ये आम तौर पर दर्द, अकेलेपन, असुरक्षा और भावनात्मक भय से लड़ने के औजार के रूप में इस्तेमाल की जाती है... जबकि ये सब जीवन के स्वाभाविक अनुभव हैं. जिसे इनका अनुभव न हो वो इंसान नहीं हो सकता."

शराब के मामले में पंजाब, उत्तराखंड और केरल देश के सबसे शौकीन राज्यों में हैं. लेकिन आप ऐसे राज्य में रहते हैं जहां शराब पर प्रतिबंध है तो आपको इसके लिए मीलों चलना पड़ सकता है. गुजरात ऐसा ही राज्य है.

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सौम्या भट्टाचार्य लिखते हैं, "गुजरात के शराबप्रेमियों के तो पसंदीदा ठिकाने हैं. सूरत में रहने वाले दमन जाते हैं, राजकोट में रहने वाले दीव और अहमदाबाद में रहने वाले माउंट आबू." सौम्या खुद चार बार माउंट आबू के एक बार में जा चुके हैं.

शराब पीकर लड़ाई-झगड़ा करना भी भारतीयों के लिए बहुत अनहोनी बात नहीं. जयराज सिंह किताब में बताते हैं कि किस तरह उनके पिताजी के एक चचेरे भाई पीने के बाद बात-बात में बंदूक निकालकर लड़ने के लिए तैयार हो जाते थे.

एरिस्टोक्रैट और अन्य कहानियां

किताब तीन हिस्सों कहानी, कविता और निबंध में विभाजित है. एंथॉलजी की शुरुआत कहानियों और कविताओं से होती है. 'एरिस्टोक्रैट' एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसने 11 साल की उम्र में पीना शुरू कर दिया था. उसके दोस्त उससे भी कम उम्र में पीना शुरू कर चुके थे.

बच्चे के पिता एक ऐसे ब्यूरोक्रेट थे जिसे दफ्तर के काम में कम और शराब में ज्यादा रुचि रहती थी. सिद्धार्थ भाटिया की इस कहानी के पात्र बिल्कुल सजीव लगते हैं.

पलाश ने किताब के परिचय में लिखा है, "शराब के प्रति हमारा वैसा ही झुकाव है जैसा सेक्स के प्रति. हम इसे करते नहीं. लेकिन हमें ये पसंद होता है और हम इसे हर दम करते रहना चाहते हैं. कई बार तो दूसरों से ज्यादा ही."

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हम व्हिस्की ज्यादा पीते हैं क्योंकि क्रिकेट ही की तरह ये हमें अंग्रेजों की देन है. संदीप रॉय "व्हिस्की नेशन" में लिखते हैं, "हमने इसे इसलिए पिया क्योंकि दीवार में अमिताभ बच्चन परवीन बाबी के बदन के उतार-चढ़ाव के तसव्वुर के साथ इसे पीता है. आम तौर पर इसे इसलिए पीते हैं क्योंकि यही सब पीते हैं. और व्हिस्की की कौन सी जाति हमारे लिए फिट है ये भी हम जल्द ही पता कर लेते हैं."

अमित चौधरी के अनुसार शराब पीना भारत में एक तरह की छिपी बगावत भी है. हालांकि खुद चौधरी को इसकी कभी जरूरत नहीं महसूस हुई. लेकिन आज भी ढेर सारे भारतीय ऐसी छिपी बगावत में मजा लेते हैं. और उनके लिए इस सात साल पुरानी किताब से ज्यादा नशीली दूसरी किताब मिलना मुश्किल है.

First published: 19 June 2016, 8:43 IST
 
लमट र हसन @LamatAyub

Bats for the four-legged, can't stand most on two. Forced to venture into the world of homo sapiens to manage uninterrupted companionship of 16 cats, 2 dogs and counting... Can read books and paint pots and pay bills by being journalist.

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