Home » इंडिया » Catch Hindi: Ritu Sarin and Tenzing Sonam film censored after chinese objection
 

'मैं तिब्बती लोगों के कल्याण के लिए आत्मदाह कर रहा हूं'

सोमी दास | Updated on: 9 February 2016, 22:32 IST
QUICK PILL
ऋतु सरीन और तेनजिंग सोनम फिल्ममेकर युगल हैं. जब दोनों ने ढाका आर्ट \r\nसमिट में \'तिब्बती सेल्फ-इमोलेशन मूवमेंट\' आर्टवर्क प्रस्तुत किया तो दो दिन बाद चीनी राजदूत\r\n ने उसपर आपत्ति जताई. तिब्बती शरणार्थी माता-पिता की संतान सोनम कहते हैं कि चीन\r\n के लिए सेंसरशिप सामान्य बात है.

ऋतु सरीन और तेनजिंग सोनम ने अपने आर्टवर्क को 'द लास्ट वर्ड' (आखिरी शब्द) नाम दिया है. उनके इंस्टालेशन के साथ ही कलाकार के आखिरी शब्द प्रस्तुत हैं.

ढाका आर्ट समिट में पेश एक इंस्टालेशन में लिखा है, "मैं सलतरिम ग्यास्तो, बर्फ का सिपाही, तिब्बती लोगों के कल्याण के लिए आत्मदाह कर रहा हूं. स्वर्णिम आंसूओं. आह, आंसू. हृदयविदारक. भाइयों, क्या आप सुन रहे हैं? क्या आप देख रहे हैं? क्या आप सुन रहे हैं? साठ लाख तिब्बतियों की पीड़ा के बारे में मैं किसे बताऊं? बहुमूल्य मानवीय शरीर लपटों में जल रहा है. मैं हिज होलीनेस दलाई लामा की तिब्बत वापसी के लिए, पंचेन रिनपोछे की रिहाई के लिए और साठ लाख तिब्बतियों के कल्याण के लिए आत्मदाह कर रहा हूं"

- सलतरिम ग्यास्तो, उम्र 43, 19 दिसंबर, 2013 को आत्मदाह कर लिया.

कैच ने तेनजिंग सोनम से ईमेल के माध्यम से बात की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश.

Installation 1

मूल इंस्टालेशन

पहले आप अपने 'द लास्ट वर्ड्स' के बारे में बताएं?


'द लास्ट वर्ड्स' हमारे व्यापक मल्टीमीडिया इंस्टालेशन 'बर्निंग अगेंस्ट द डाइंग ऑफ द लाइट' का एक हिस्सा है. हमने इसे दिल्ली के खोज स्टूडियो में दिसंबर में प्रस्तुत किया था. ये इंस्टालेशन पिछले कुछ सालों में तिब्बतियों द्वारा किए गए आत्मदाह के विषय पर है. अब तक 149 तिब्बती आत्मदाह कर चुके हैं. इनमें से ज्यादातर तिब्बत में रहते थे. तिब्बत में पांच लोगों ने आत्मदाह से पहले जो संदेश छोड़े थे, 'द लास्ट वर्ड्स' उनका प्रतिरूप है. ये कथन कई बार बहुत ही कवित्वपूर्ण और दार्शनिक होते हैं. वो इनमें बताते हैं कि वो क्यों आत्मदाह कर रहे हैं.

उनमें बौद्ध धर्म की करुणा और राजनीतिक जागरूकता होती है. उनके इन बयानों से तिब्बतियों क आत्मदाह को समझने की एक गहरी अंतरदृष्टि मिलती है. इसे ढाका आर्ट समिट में प्रदर्शित किया जा रहा था. प्रदर्शन के दो दिन बाद चीनी राजदूत ने आपत्ति जतायी.

Installation covered 2

इंस्टालेशन ढंके जाने के बाद

आपसे आयोजकों ने इंस्टालेशन ढंकने के लिए कब कहा?


शनिवार शाम को आयोजकों ने हमसे कहा कि चीनी दूतावास ने मांग की है कि हमारा आर्टवर्क समिट से हटाया जाए, नहीं तो वो बांग्लादेश सरकार पर इस समिट को बंद करने का दबाव डालेंगे.

हमने आयोजकों से कहा कि अगर वो चीन की आपत्ति को मानने के लिए मजबूर हैं तो वो इसे हटाने के बजाय इसे ढंक दें.

तिब्बत में पांच लोगों ने आत्मदाह से पहले जो संदेश छोड़े थे, 'द लास्ट वर्ड्स' उनका प्रतिरूप है

हमें लगा कि इससे ज्यादा व्यापक संदेश जाएगा. इससे पता चलेगा कि चीन किसी असहमति के विचार या बयान को दबाने के लिए किस सीमा तक जा सकता है. खास कर इस आर्टवर्क को क्योंकि ये तिब्बत की आवाज दबाने पर सवाल खड़ा करता है.

क्या आपको पहले भी सेंसरशिप का शिकार होना पड़ा है?


हां, कभी छिपे तौर पर, कभी खुले तौर पर. साल 2010 में डाक्यूमेंट्री 'द सन बिहाइंड द क्लाउड्स: तिब्बत स्ट्रगल फॉर फ्रीडम' को पाम स्प्रिंग इंटरनेशनल फेस्टिवल में दिखाया जा रहा था. तब लॉस एंजेलेस स्थिति चीनी दूतावास ने निर्देशक से फिल्म का प्रदर्शन रोकने की मांग की थी. जब उसने मना कर दिया तो वो पाम स्प्रिंग के पीछे पड़ गए. उन्होंने आयोजकों को ये समझाने की कोशिश की कि फिल्म चीन के बारे में झूठ फैला रही है. आयोजकों ने उन्हें विनम्रता से कहा कि वो किसी निर्देशक को फिल्म चयन के लिए बाध्य नहीं कर सकते.

उसके बाद फेस्टिवल में दिखायी जाने वाली दो चीनी फिल्में बाहर हो गई. उनके निर्देशकों को पता भी नहीं चला कि क्या हुआ. हमने ऐसे और भी मामलों का सामना किया है. न्यूयॉर्क का एक प्रतिष्ठित संस्थान भी चीन सरकार की मांग के आगे झुक गया था कि तिब्बती फिल्कारों की फिल्में नहीं दिखाई जाएं.

अगर चीन की सेंसरशिप की बात करें तो मीडिया में जितनी खबरें आती हैं ये उससे कहीं ज्यादा व्यापक है.

चीन राजदूत की असल प्रतिक्रिया क्या थी?


हम वहां मौजूद नहीं थे. वहां मौजूद एक व्यक्ति के अनुसार वो हमारे आर्टवर्क को देखकर काफी आक्रोशित हो गए थे.

किसी अन्य देश में चीन के ऐसे कदम का क्या मकसद है?


चीन नहीं चाहता कि उसके सरकारी विचारधार के विरोधी विचार को कोई मंच प्रदान करे, खास तौर पर तिब्बत या शिनजियांग को बारे में.

उनका सीधा संदेश है कि अगर आप चीन के विचार से असहमत होंगे तो आपको आर्थिक ये दूसरे संबंध खत्म हो जाएंगे.

क्या कला को विभिन्न सरकारों के भूराजनीतिक हितों से स्वतंत्र होना चाहिए?


जी, बिल्कुल. खास तौर पर उन देशों में जो खुद को लोकतांत्रिक बताते हैं.

चीन में आर्थिक हित लोकतांत्रिक मूल्यों से ज्यादा तवज्जो पाते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़े पैरोकार देशों में गिना जाने वाला नार्वे जैसे देश को भी चीन सरकार के दबाव के आगे झुकना पड़ा. चीनी मूल के लियु शियाबो को नार्वे के नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर विवाद हुआ था.

क्या आपको लगता है कि कला और संस्कृति से जुड़े आयोजन करने वालों को ज्यादा मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए?


भारतीय उपमहाद्वीप या उसके बाहर कहीं भी किसी भी तरह के कला या विचार पर सेंसरशिप निंदनीय है. हमें कला और विचार जगत में नियंत्रण और प्रतिबंध से ज्यादा संवाद और परस्पर आदान-प्रदान की जरूरत है.

First published: 9 February 2016, 22:32 IST
 
सोमी दास @Somi_Das

Somi brings with her the diverse experience of working in a hard news environment with ample exposure to long-form journalism to Catch. She has worked with Yahoo! News, India Legal and Newslaundry. As the Assistant Editor of Catch Live, she intends to bring quality, speed and accuracy to the table. She has a PGD in Print and TV journalism from YMCA, New Delhi, and is a lifelong student of Political Science.

पिछली कहानी
अगली कहानी