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नदी जल बंटवारे और सतलज-यमुना लिंक कैनाल ने खोली सभी दलों की पोल

राजीव खन्ना | Updated on: 16 March 2016, 8:50 IST
QUICK PILL
  • यमुना जल बंटवारे और सतलज-यमुना लिंक कैनाल को लेकर पंजाब और हरियाणा आमने-सामने हैं. हैरत की बात कि सभी राजनीतिक दल दोनों राज्यों में परस्पर विरोधी रुख अपनाते नजर आ रहे हैं.
  • पंजाब में अगले कुछ महीनों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं. जिसके मद्देनजर हर दल खुद को जनता का बड़ा हितैषी दिखाना चाहता है.

पंजाब और हरियाणा में इस समय अलबेले राजनीतिक हालात हैं. यहां स्थानीय राजनीतिक बाध्यताएं विचारधाराओं पर भारी पड़ रही हैं. दोनों राज्य यमुना के पानी के बंटवारे और सतलज-यमुना लिंक (एसवाईएल) कैनाल के निर्माण को लेकर आमने-सामने हैं.

कांग्रेस, शिरोमणी अकाली दल और बीजेपी राज्य में अलग-अलग जगहों पर भिन्न-भिन्न बयान देती नजर आ रही हैं. इन पार्टियों का राजनैतिक नेतृत्व भी इन मुद्दों पर खुलकर बोलता नजर नहीं आ रहा है.

मौजूदा राजनीतिक घमासान तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट 2004 पर राष्ट्रपति के रिफरेंस पर सुनवाई शुरू की.

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ये कानून कांग्रेसी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने मुख्यमंत्री काल में बनाया था. इसका मकसद अपने पड़ोसी राज्यों के संग हए जल बंटवारे समझौते को रद्द करना और एसवाईएल कैनाल के निर्माण को रोकना था.

कांग्रेस राज्य के हित में


कांग्रेस दोनों राज्यों में इस मुद्दे को लेकर सबसे ज्यादा मुखर है. पंजाब में कांग्रेस प्रमुख अमरिंदर सिंह ने मुद्दे पर सबसे पहले बयान देते हुए सत्तापक्ष को अपनी स्थिति साफ करने के लिए कहा था.

जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो उच्चतम अदालत के उस फैसले से सहमत है जिसमें कैनाल का काम जारी रखने का आदेश दिया गया था. इसके बाद राज्य में कुछ ही महीनों में चुनावों के मद्देनजर अमरिंदर अकाली दल और बीजेपी गठबंधन की सरकार को इस मुद्दे पर घेरना शरू कर दिया है.

नदी जल बंटवारे पर कांग्रेस, बीजेपी, अकाली दल और आप की पंजाब और हरियाणा इकाइयों के विचार परस्पर विरोधी

लेकिन हैरत की बात है कि हरियाणा कांग्रेस ने राज्य के हित में लिए गए किसी भी फैसले का विरोध करने का निर्णय लिया है. राज्य कांग्रेस के प्रमुख नेता अशोक तंवर(राज्य अध्यक्ष), किरन चौधरी(कांग्रेस विधान सभा दल की नेता) और पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा पंजाब कांग्रेस के रुख का विरोध कर रहे हैं.

किरन चौधरी कहती हैं, "अगर राज्य की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने इस मुद्दे पर पहल करती है तो हम लोग विधान सभा से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं."

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चौधरी खट्टर पर इस मामले में नरमी से पेश आने का आरोप लगाती हैं. कांग्रेस ने राज्य के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी को एक ज्ञापन भी दिया है. सोलंकी इस समय पंजाब के भी कार्यकारी राज्यपाल हैं. हरियाणा कांग्रेस ने उनसे इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया ताकि कोई संवैधानिक संकट न पैदा हो.

बीजेपी की दुविधा


बीजेपी इस मुद्दे पर दोहरा रुख अपनाती नजर आ रही है. उसकी दुविधा कांग्रेस से भी बड़ी नजर आती है क्योंकि वो दोनों राज्यों और केंद्र में सत्ता में है.

कांग्रेस ही की तरह बीजेपी पंजाब में अकाली दल के साथ है लेकिन हरियाणा में वो पंजाब सरकार के फैसले के खिलाफ है.

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हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर इस मुद्दे पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह से संपर्क किया है. खट्टर सरकार ने सभी दलों की एक बैठक के बाद राज्यपाल सोलंकी को ज्ञापन दिया था. इस बैठक में कांग्रेस शामिल नहीं हुई थी.

केंद्र की बीजेपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैनाल के निर्माण का समर्थन किया. पंजाब बीजेपी के नेता इसे राज्य के हित के खिलाफ मान रहे हैं.

शिरोमणी अकाली दल की चतुराई


अकाली दल ने नदी जल बंटवारे पर किसी भी 'अन्याय' को अस्वीकार करने का प्रस्ताव पारित करके तुरुप का पत्ता चल दिया है.

उसने कैनाल के निर्माण के लिए अधिकृत की गयी जमीन को डि-नोटिफाई करने का भी फैसला किया है. बादल सरकार ने सोमवार सोमवार को इससे संबंधित विधेयक राज्य विधान सभा में पेश किया.

खबरों के अनुसार मनोहर लाल खट्टर द्वारा बुलायी गयी सभी दलों की बैठक में हरियाणा अकाली दल के नेता भी शामिल थे. जिनमें उसके राज्य प्रमुख शरनजीत सिंह सोढा भी थे.

आम आदमी पार्टी का असमंजस


पंजाब में प्रमुख राजनीतिक ताकत बनकर उभरी आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर असमंजस में नजर आ रही है.

राजनीतिक जानकारों के अनुसार पंजाब में कैनाल के पक्ष में दिखना पार्टी की मजबूरी है. जबकि दिल्ली में अतिरिक्त पानी दिलाने के लिए कैनाल बनने का समर्थन जरूरी है.

एक राज्यपाल के दो रुख


दोहरा रवैया केवल राजनीतिक पार्टियां ही नहीं अपनी रही हैं. राज्यपाल सोलंकी भी दोनों राज्यों की विधान सभाओं को संबोधित करते समय दो रुख अपनाते नजर आए. हालांकि राज्यपाल का भाषण जाहिर तौर पर केंद्र सरकार के रुख के अनुरूप रहा.

हरियाणा के राज्यपाल और पंजाब के कार्यवाहक राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी दोनों राज्यों में दो रुख अपनाते हैं

हरियाणा विधान सभा के बज़ट सत्र में राज्यपाल ने कहा कि राज्य को रावी-ब्यास नदियों के पानी में अपना हिस्सा हासिल करने और एसवाईएल कैनाल के निर्माण के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है. राष्ट्रपति के रिफ्रेंश का मामला सुप्रीम कोर्ट में 11 साल से विचाराधीन था. सतत प्रयास का हरियाणा को फल मिला और उच्चतम अदालत ने इसपर नियमित सुनवाई शुरू कर दी.

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इन्हीं सोलंकी ने पंजाब विधान सभा के बजट सत्र में अपने अभिभाषण में कहा कि अगर ट्यूबवेल के पानी पर इसी तरह निर्भरता बनी रही तो जल्द ही पूरा राज्य रेगस्तान में बदल जाएगा.

उन्होंने कहा कि राज्य पर मंडरा रहे संकट से बचाव का एक ही उपाय है कि नदियों के पानी पर पंजाब के हक़ सुरक्षित रहे.

सोलंकी ने ये भी कहा कि पंजाब सरकार लगातार राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सिद्धांतों के तहत नदी जल बंटवारे के मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रयासरत है.

First published: 16 March 2016, 8:50 IST
 
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