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रोहित-जेएनयू विवादः राज्यों में नहीं बल्कि अन्य मोर्चों पर उबरी भाजपा

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • जब बात अगले दो माह में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मतदान और प्रचार अभियान की आती है तो भाजपा के पास अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए बहुत कुछ नहीं है.
  • दिल्ली में कानून व्यवस्था, रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू विवाद पर हुई बहस ने इस राज्यों में पार्टी के पक्ष में कुछ खास नहीं किया है और इसकी बहुत कम उम्मीद है कि इससे पार्टी को कुछ फायदा पहुंचे.

नुकसान से उबरकर बराबरी पर आना भी एक तरह से मुनाफा ही होता है. जेएनयू विवाद पर अब तक भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार की यही उपलब्धि है. राष्ट्रवादियों और राष्ट्र विरोधियों के बीच पैदा किए गए मतभेद ने पार्टी को इससे बाहर आने में मदद की है, जो अब तक  पार्टी और सरकार को पिछले कुछ माह में परेशान कर रही थी.

जब बात अगले दो माह में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मतदान और प्रचार अभियान की आती है तो भाजपा के पास अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए बहुत कुछ नहीं है.

अपने भाषणों के दौरान केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली और स्मृति ईरानी ने पश्चिमी बंगाल का जिक्र किया. उन्होंने राष्ट्रवादियों और राष्ट्र विरोधियों के बीच ध्रुवीकरण का भी प्रयास किया. उन्होंने जानबूझकर वाम की पूरी विचारधारा और राजनीति पर हमला किया. उन्होंने इन्हें राष्ट्र विरोधियों के रूप में पेश करने की कोशिश भी की.

इसे साफ तौर पर केरल और पश्चिम बंगाल में मजबूत स्थिति वाले वाम दलों के खिलाफ माहौल बनाने के प्रयास के रूप में देेखा जा सकता है.

वाम इस मौके का फायदा उठाने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के राजनीतिक युद्ध को लड़ने में असफल रहा

स्मृति ईरानी ने तो तृणमूल कांग्रेस के सुगत बोस पर हमला करते हुए कहा कि क्या वो कोलकाता की सड़कों पर जेएनयू के छात्रों का समर्थन करेंगे जिन्होंने महिषासुर को अपना भगवान बताते हुए देवी दुर्गा पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.

अरुण जेटली ने कहा कि राहुल गांधी 'जेएनयू की ओर भाग रहे हैं', इस बात की संभावना जाहिर करता था कि पश्चिम बंगाल में वाम दलों और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो सकता है.

इन संकेतों से पता चलता है कि राष्ट्रवाद की बहस के इर्दगिर्द हुए ध्रुवीकरण से भाजपा को शहरी और मध्यवर्ग का समर्थन बढ़ा है. अब भाजपा इसे उन राज्यों में ले जाएगी जहां चुनाव होने वाले हैं. 

यद्यपि, दिल्ली में कानून व्यवस्था, रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू विवाद पर हुई बहस ने इस राज्यों में पार्टी के पक्ष में कुछ खास नहीं किया है और इसकी बहुत कम उम्मीद है कि इससे पार्टी को कुछ फायदा पहुंचे.

अप्रैल और मई में पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुड्डूचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. हालांकि दिल्ली की घटनाओं का इन राज्यों पर काफी कम प्रभाव पड़ना है.

मायावती का सपना

वास्तव में ऐसा लगता है राज्यसभा में भाजपा से ज्यादा फायदा मायावती ने उठाया. मायावती इस बात को सामने लाने और बहस के लिए ज्यादा वक्त लेने में सफल रहीं कि रोहित वेमुला आत्महत्या मामले पर बहस को जेएनयू और दिल्ली में कानून व्यवस्था के मुद्दे से अलग रखा जाना चाहिए.

उन्होंने 24 फरवरी को राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित करवा दी. मायावती के विरोध प्रदर्शन की गूंज उनके समर्थकों के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी साफ सुनी गई, जहां वो अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव की मजबूत दावेदार हैं. 

पिछले कुछ महीनों से मायावती बहुत ही शांत और अंदरखाने से विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई हैं. अब उनकी गूंज स्पष्ट, आक्रामक और ऊंची दिखाई दी.

वाम और कांग्रेस को भी कोई फायदा नहीं है. वाम इस मौके का फायदा उठाने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के राजनीतिक युद्ध को लड़ने में असफल रहा.

राहुल गांधी के चेहरे से बढ़त बनाने वाली कांग्रेस इसे बरकरार रखने मे विफल रही. संसद के अंदर और बाहर उनकी रणनीति और फैसले असफल साबित हुए.

भाजपा ने क्या पाया?

तो इससे भाजपा ने क्या पाया? कुछ चीजें हैं जिनपर पार्टी फिलहाल अपनी दावेदारी कर सकती है. 

पहली बात तो यह कि जब हर ओर से विफलता और हार सरकार का पीछा नहीं छोड़ रही थी, तब कुछ ऐसा हुआ जो भाजपा और सरकार के समर्थन में मध्यवर्गीय शहरी समर्थन वापस ले आया. स्मृति ईरानी जैसे चेहरे मजबूती से सामने आए और आवाज बुलंद की. जो लोग अब तक सरकार के खिलाफ निगेटिव कमेंट्स दे रहे थे वो अब जेएनयू के वीडियो और स्मृति ईरानी के भाषण के वीडियो शेयर करते नजर आए. 

दूसरा बड़ा फायदा यह हुआ कि भाजपा ने अब संतुलन बनाया लिया है. रोहित वेमुला के मुद्दे पर केंद्र सरकार बुरी तरह विफल रही. सरकार इससे पार पाने और उबरने में नाकाम रही. जेएनयू ने उन्हें एक रास्ता दे दिया. नारेबाजी विवाद पर जेएनयू कैंपस को घेरने से सरकार को फिर से सामने आना का मौका मिला.

हालांकि सरकार के करीबियों का मानना है कि यह सरकार के लिए अस्थायी उपाय हैं. इसके प्रभाव ज्यादा लंबे वक्त तक नहीं रहेंगे. सरकार को चाहिए कि वो मौजूदा आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक संकट से उबरने के तरीके खोजे.

First published: 1 March 2016, 12:10 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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