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वीसी के पक्षपात ने रोहित को यह कदम उठाने पर मजबूर किया: डोनथा प्रशांत

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 20 January 2016, 9:22 IST
QUICK PILL
  • हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की \r\nखुदकुशी का मामला देश की चेतना को झिंझोड़ रहा है. विज्ञान, तकनीक और \r\nसोशल स्टडीज में पिछले दो साल से पीएचडी कर रहे रोहित ने रविवार रात को \r\nयूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आत्महत्या कर ली थी.
  • रोहित के साथ एचसीयू ने पांच अन्य छात्रों को निलंबित कर दिया था. ये सभी छात्र अंबेडकर\r\n स्टूडेंट एसोसिएशन से जुड़े थे.
  • इन छात्रों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी \r\nपरिषद के नेता सुशील कुमार से मारपीट का आरोप था. अगस्त में इन \r\nछात्रों का निलंबन वापस होने के बाद पिछले साल 17 दिसंबर को दोबारा उन्हें\r\n छात्रावास से निकाल दिया गया था.
  • इस मामले में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी \r\nबंडारू दत्तात्रेय की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. दत्तात्रेय ने\r\n रोहित समेत पांच लड़कों के खिलाफ मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र\r\n लिखकर कार्रवाई की मांग की थी.
  • एचआरडी मंत्रालय ने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति को पत्र लिखकर इस \r\nमामले में अतिरिक्त सक्रियता दिखाई थी.
  • तेलंगाना पुलिस ने इस मामले \r\nमें सोमवार को केंद्रीय राज्य मंत्री और बीजेपी नेता बंडारु दत्तात्रेय के \r\nखिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है.
  • इस \r\nमामले में कैच ने रोहित के साथ यूनिवर्सिटी से निलंबित किए गए अन्य छात्र डोनथा \r\nप्रशांत से बातचीत की. प्रशांत अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रह\r\n चुके हैं. कैच \r\nके साथ उन्होंंने रोहित के साथ हुए घटनाक्रम और अपने संबंधो का सिलसिलेवार \r\nब्यौरा दिया है.
  • घटना का दुखद पक्ष यह है कि आत्महत्या करने से कुछ समय पहले तक रोहित और प्रशांत साथ-साथ थे. प्रशासन की कार्रवाई के खिलाफ भूख हड़ताल में रोहित के साथ प्रशांत भी शामिल थे.
  • डोनथा प्रशांत की आपबीती:

ये विवाद दो अगस्त को शुरू हुआ था. दिल्ली यूनिवर्सिटी में 'मुजफ्फरनगर बाकी है' नाम की एक डॉक्युमेंट्री फिल्म के प्रदर्शन को एबीवीपी ने हमला करके रोक दिया था. इसके बाद आंदोलन शुरू हुआ. अगले दिन यानि तीन अगस्त को हम लोगों ने यहां हैदराबाद सेंट्रल युनिवर्सिटी में एबीवीपी के इस कदम की निंदा करते हुए कैंपस परिसर में विरोध प्रदर्शन किया था. यह प्रदर्शन हमारे संगठन अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन (एएसए) ने आयोजित किया था, इसमें कई दूसरे छात्र संगठन भी शामिल थे.

हमारे विरोध प्रदर्शन के बाद एबीवीपी के कैंपस अध्यक्ष सुशील कुमार ने अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन को गुंडा बताते हुए फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट लिखा. हमने इस पोस्ट को हटाने और माफी मांगने के लिए सुशील कुमार पर दबाव डाला.

एबीवीपी अध्यक्ष सुशील कुमार ने गलती मानते हुए हमसे माफी भी मांग ली और बात खत्म हो गई. लेकिन चार अगस्त को सुशील कुमार फिर से पलट गए. उन्होंंने आरोप लगाया कि हमारे संगठन के छात्रों ने उनकी पिटाई की है. यह सरासर झूठा आरोप था. मेरे, रोहित के अलावा तीन और लोगों पर यह आरोप लगा. सुशील ने इसकी शिकायत पुलिस में भी की.

हमारे संगठन ने खुद सुशील के आरोपों पर जांच समिति बिठाने की मांग की. आरोपों की जांच के लिए 5 अगस्त को चीफ प्रॉक्टर की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बनाई गई.

इस कमेटी को अपनी जांच में पिटाई के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले, इसके बावजूद सुशील कुमार की शिकायत को आधार बनाकर प्रॉक्टर आलोक पांडेय ने मेरे, रोहित के अलावा तीन छात्रों को दोषी घोषित कर दिया. उन्होंने हमें युनिवर्सिटी से निलंबित कर दिया. इसकी वजह यह थी कि समिति दबाव में काम कर रही थी. सबूत न होने के बावजूद उन्होंंने हमें निलंबित कर दिया.

केंद्रीय राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने वीसी पर दबाव बनाने के लिए चिट्ठी लिखी थी, उनके सभी आरोप झूठे हैं

हमारे संगठन एएसयू ने इसका कड़ा विरोध किया. फलस्वरूप दो दिन बाद ही हमारा निलंबन वापस ले लिया गया और दूसरी जांच समिति बनाई गई.

इसी दौरान 17 अगस्त को बंडारू दत्तात्रेय इस मामले में कूद गए. उन्होंंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक पत्र लिखा. उन्होंने अपने पत्र में जो भी आरोप लगाए हैं वो सभी सरासर झूठे हैं. उन्होंने एबीवीपी की मदद करने के लिए यह पत्र लिखा था. उन्होंने जो पत्र में जो आरोप लगाए थे उस पर पहले बनी जांच समिति ने कभी एक शब्द नहीं कहा. जाहिर है वे लोग खुद ही आरोप गढ़ रहे थे.

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इस बीच हमारे मामले की जांच कर रही दूसरी जांच समिति को भी दत्तात्रेय का वह पत्र मिला और उसने अपनी पूरी जांच का आधार उसी पत्र को बना लिया. यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पुरानी जांच के आधार पर 17 दिसंबर को मेरे, रोहित समेत पांचो छात्रों को निलंबित करने का फरमान जारी किया. सभी लोग दत्तात्रेय और एबीवीपी के दबाव में यह काम कर रहे थे.

इस घटना से रोहित परेशान हो गया. उसने 18 दिसंबर को कुलपति को एक पत्र लिखा. रोहित ने लिखा, 'प्लीज, जब दलित छात्रों का एडमिशन हो रहा हो तभी सभी छात्रों को दस मिलीग्राम सोडियम सायनाइड दे दिया जाना चाहिए.' जाहिर है अपने समेत पांच लोगों के दोबारा निलंबन से वह काफी दुखी थी.

लेकिन कुलपति ने इस पत्र पर किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. कुलपति की कठोरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह रोहित की आत्महत्या के बाद भी छात्रों से मिलने नहीं गए. कुलपति रोहित के मरने के बाद आखिरी बार उसे देखने भी नहीं आए और उसके परिजनों से मुलाकात भी नहीं की.

हॉस्टल से निकाले जाने के बाद पिछले 15 दिनों से हम लोग ठंड में बाहर रहे थे, हमारे साथ आर्थिक समस्याएं थी. इसके बावजूद ना ही कुलपति और ना ही प्रशासन से जुड़ा कोई व्यक्ति हमलोगों से बात करने आया. कोई हमारे मुद्दे को सुलझाने के लिए तैयार नहीं था.

रोहित की मौत के बाद भी वीसी ने उसके परिजनों से मुलाकात नहीं की

यही सब बात रोहित के दिमाग में चल रही थी. उसके पिता चौकीदार है. पिछले छह महीने से उसकी स्कॉलरशिप भी रूकी हुई थी. परिवार में आय के साधन सीमित थे. कहीं से भी हमें इस बात का अंदाजा नहीं लगा कि उसके मन में इतनी बड़ी उथल पुथल चल रही है. धरना स्थल पर रोहित भूख हड़ताल में हमारे साथ ही था और फिर रविवार शाम यह सारी घटना सुनने को मिली. पारिवारिक स्थिति और युनिवर्सिटी के पक्षपाती रवैए ने उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया.

First published: 20 January 2016, 9:22 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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