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एक दशक में एम्स और आईआईटी जैसे संस्थानों में मरने वाला 23वां छात्र है रोहित

सलमा रहमान | Updated on: 21 January 2016, 12:52 IST
QUICK PILL
  • हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला ने विश्वविद्यालय से निष्कासित किए जाने के बाद  आत्महत्या कर ली. वेमुला आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे.
  • करीब एक दशक से भी कम समय के बीच एम्स और आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों में 23 दलित छात्र खुदकुशी कर चुके हैं. उच्च शिक्षण संस्थानों का एक चेहरा यह भी है.

अपने आखिरी नोट में रोहित वेमुला ने, 'दाखिले के दौरान सभी दलित छात्रों को 10 मिलीग्राम सोडियम एजाइड बांटे जाने की अपील की थी. उन्होंने कहा था कि सभी दलित छात्रों को एक रस्सी भी दी जाए.' रोहित ने लिखा, 'मैं महामहिम से आग्रह करता हूं कि मुझ जैसे छात्रों के लिए इच्छामृत्यु की सुविधा मुहैया कराई जानी चाहिए.' सवाल यह उठता है कि आखिर वेमुला जैसा हंसमुख छात्र सभी दलित छात्रों के लिए इच्छामृत्यु की मांग क्यों कर रहा था?

वेमुला की आत्महत्या के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुका है और यह निश्चित तौर पर हमारी शैक्षिक व्यवस्था के स्याह पहलू को जाहिर करता है जो अभी भी जाति और धार्मिक राजनीति के दायरे में फंसा हुआ है.

योग्यता की हत्या

वेमुला की तरह ही आठ अन्य पिछड़ी जातियों के छात्र हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक दशक के दौरान आत्महत्या कर चुके हैं. लेकिन आत्महत्या की जगह बनते जा रहे हैदराबाद विश्वविद्यालय में जारी भेदभाव को लेकर उस तरह से मुखर आवाज नहीं बुलंद हुई. वास्तव में 2007 के बाद से ऐसे मरने वाले छात्रों की संख्या 22 है जो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), आईआईटी और एनआईआईआई जैसे प्रीमियर संस्थानों में पढ़ाई के दौरान खुदकुशी कर चुके हैं.

दलित छात्रों के लिए काम करने वाले गुरिंदर आजाद बताते हैं, 'हमारी शिक्षण संस्थाओं में भेदभाव सबसे क्रूरतम रूप में मौजूद है.' आजाद 2009 से इस दिशा में काम करते रहे हैं. उन्होंने कहा, 'आप कह सकते हैं कि मैं इस मामले में इतिहास का हवाला दे रहा हूं लेकिन आप इस सच्चाई से इनकार नहीं कर सकते कि हमारी देश की प्रशासनिक व्यवस्था अभी भी अपने आप को ब्राह्मणवादी मानसिकता से अलग नहीं कर पाई है. जिस व्यवस्था में निचली जाति के लोगों को कभी भी ऊंची जाति के लोगों के बराबर नहीं समझा जाता है.'

एम्स में एमबीबीएस की फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहे दलित छात्र बालमुकुंद भारती ने 3 मार्च 2010 को छात्रावास में खुदकुशी कर ली थी. एम्स प्रशासन ने इस मामले में शानदार तरीके से औपचारिक सफाई देते हुए कहा कि 'वह अवसाद में जी रहा था क्योंकि वह एम्स के कठिन शैक्षणिक माहौल के साथ सामंजस्य नहीं बिठा रहा था.'

हालांकि आजाद की माने तो जांच के दौरान यह बात सामने आई कि भारती को लंबे समय से परेशान किया जा रहा था और इस काम में उसके प्रोफेसर भी शामिल थे. उसे कई बार सीनियर छात्रों ने पीटा. जिसके बाद भारती कैंपस की मुख्य धारा से पूरी तरह कट गया. भारती के साथ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह दलित समुदाय से आते थे. करीब 6 सालों की लंबी मानसिक यंत्रणा और टॉर्चर के बाद भारती ने खुदकुशी का फैसला लिया.

कैसे निकलेगा समाधान

5 मई 2007 को प्रोफेसर थोराट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एम्स में निचली जाति के छात्रों और फैकल्टी मेंबर्स के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने रखी. रिपोर्ट के मुताबिक करीब 88 फीसदी दलित और आदिवासी छात्रों ने समिति को बताया कि शिक्षकों ने उन्हें लिखित परीक्षा में उतने अंक नहीं दिए जितना उन्हें मिलना चाहिए था. इतना ही नहीं उनके पेपर को सही तरीके से आंका भी नहीं गया.

थोराट कमेटी की रिपोर्ट बताती है कि एम्स और आईआईटी में भी निचली जातियों के बच्चों के साथ बुरा सलूक होता है

84 फीसदी अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों ने समिति को बताया कि परीक्षकों ने उनसे उनकी जातीय पृष्ठभूमि के बारे में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूछा और फिर उनके जवाब के आधार पर उनकी ग्रेडिंग की गई. 

नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) ने कहा, 'यह महज एक तरह का भेदभाव है जो बड़े दायरे में फैला हुआ है. छात्रों को उनकी तय छात्रवृत्ति की रकम समय  पर नहीं दी जाती है. जबकि परीक्षा पास करने के साथ ही छात्र छात्रवृत्ति पाने के हकदार हो जाते हैं.

इसके अलावा छात्रावासों और मेस में फैली नफरत और भेदभाव की वजह से छात्रों को अपना कमरा बदलना पड़ता है और मजबूरी में उन्हें अपने ही लोगों के साथ रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है जो घेटो की तरह होता है. छात्रावासों और मेस में उन्हें धमकी, गाली-गलौच और मार-पीट के साथ बेइज्जती सहनी होती है.'

समस्या को नजरअंदाज करना

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भेदभाव के बारे में थोराट कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद भी सरकार ने इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया. सरकार को इस बारे में सोचने का भी मौका नहीं मिला कि आखिर दलित छात्र क्यों आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं.

वीडियो इंटरव्यू में भारती के शोकाकुल पिता ने कहा कि उनका बेटा भारत से बाहर जाकर पढ़ाई करना चाहता था.

तो फिर सरकार क्यों चुप है?

आजाद बताते हैं, 'जब हमने अपनी डॉक्यूमेंट्री में आत्हत्याओं से जुड़े सच के बारे में बताया तब जाकर 2012 में शिक्षा मंत्रालय को इस तरह के भेदभाव की जानकारी मिली. तब तक सरकार शैक्षणिक संस्थानों की तरफ से दिए जा रहे तर्कों से सहमत हो जाती थी जहां वह यह कहकर अपनी गलतियां छुपा लेते थे कि मरने वाला छात्र पढ़ाई के तनाव को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था और इस वजह से वह अत्महत्या कर लेते थे. कई बार शैक्षणिक संस्थान यह भी कहने से नहीं चूकते थे कि दिल टूटने की वजह से छात्र ने आत्महत्या कर ली.'

मौत के बाद राजनीति

वेमुला की मौत के बाद हो रही राजनीति विशेषकर राहुल गांधी की तरफ से जताई गई चिंता पर निशाना साधते हुए आजाद ने कहा, 'यह सब कुछ राजनीतिक लाभ के मकसद से किया जा रहा है. मैं राहुल गांधी से यह पूछना चाहता हूं कि आखिरकार यूपीए सरकार ने तब कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जब हमने उनके सामने रिपोर्ट पेश किया?'

वेमुला के मौत के बाद जो भी सियासत हो रही है वह महज राजनीतिक लाभ उठाने के मकसद से की जा रही कोशिश है

आजाद बताते हैं कि आत्महत्या के बढ़ते मामलों में सरकारी निष्क्रियता के लिए सभी सरकारों को कटघरे में खड़ा करना चाहिए क्योंकि सभी ने दलित और आदिवासी शिक्षा के बजट में कटौती की है.

एनसीडीएचआर के सिंह बताते हैं, 'दलित और आदिवासी छात्रों का शैक्षणिक विकास सीधे-सीधे शिड्यूडल्ड कास्ट सब प्लान एंड ट्राइबल सब प्लान को होने वाले आवंटन और उसके नियोजन से जुड़ा मामला है. दुर्भाग्यवश सरकारें इस मद के पैसे को बेकार की योजना में खर्च कर देती है या फिर उन्हें अन्य सामान्य योजनाओं को आवंटित कर दिया जाता है.'

एक आंदोलन की हत्या

खुदकुशी के 12 दिन पहले वेमुला के साथ चार अन्य दलित छात्रों को विश्विद्यालय से निष्कासित कर दिया गयाथा. निष्कासित किए गए सभी छात्र आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे जो कि एक छात्रों का राजनीतिक संगठन है.

आजाद बताते हैं कि बंडारु दत्तात्रेय की चिट्ठी के बाद ही आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के खिलाफ कार्रवाई हुई

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों के साथ कथित झड़प की वजह से वेमुला को कैंपस से बाहर किया गया और यह कथित मारपीट 'मुजफ्फनरगर बाकी है' डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन को लेकर हुई थी. वेमुला पर एबीवीपी के एक सदस्य के साथ कथित तौर पर मारपीट का भी आरोप था. बाद में आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के सदस्यों के खिलाफ जांच हुई और फिर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें कैंपस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

हालांकि यह कहा जा रहा है कि पूरे मामले को राजनीतिक तूल दिया गया और बीजेपी के सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने विश्वविद्यालय की जांच प्रक्रिया को प्रभावित किया. आजाद बाते हैं, 'दत्तात्रेय ने शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी को चिट्ठी लिखकर आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को जातिवादी और राष्ट्रविरोधी संगठन करार दिया था और इसके बाद हुई कार्रवाई में वेमुला समेत सभी छात्रों को निष्कसित कर दिया. यह अपने आप में सरकार की मंशा को जाहिर कर देता है कि वह किस तरह से इस मामले को देख रही थी.'

आजाद ने कहा कि आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन को हैदराबाद विश्वविद्यालय में उनकी विचारधारा की वजह से निशाना बनाया गया.

First published: 21 January 2016, 12:52 IST
 
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