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रोहित वेमुला मामले को भाजपा न तो उगल सकती है न निगल सकती है

दिलीप मंडल | Updated on: 30 January 2016, 12:44 IST
QUICK PILL
  • रोहित वेमुला ने हैदराबाद विश्वविद्यालय से निष्कासित किए जाने के बाद खुदकुशी कर ली थी. उनकी मौत के बाद उनके दलित होने पर विवाद पैदा किया जा रहा है.
  • जब आरएसएस यह कहता है कि रोहित दलित नहीं था तब यह बात साबित हो जाती है कि उन्हें दरअसल बहुजन आंदोलन की समझ ही नहीं है. यह केवल दलितों का आंदोलन नहीं रहा है. इसमें जाति व्यवस्था के पीड़ित सभी लोग शामिल हैं: दिलीप मंडल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता और उनके समर्थक सोशल मीडिया पर रोहित वेमुला की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में सवाल कर रहे हैं. वह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि रोहित दलित नहीं है बल्कि अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) का था और इस तरह से उसकी आत्महत्या को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है.

कुछ लोग ही इस बात को पचा सकते हैं कि रोहित यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा का टॉपर था और उसे हैदराबाद विश्विद्यालय में जाति के आधार पर नहीं बल्कि मेरिट के आधार पर जनरल कैटेगरी में दाखिला मिला था. मैं रोहित के बारे में बहुत कम जानता हूं. मुझे नहीं पता कि वह किस जाति से ताल्लुक रखता था. मेरे लिए कुछ कारणों की वजह ये यह मायने नहीं रखता है.

पहला रोहित प्रखर आंबेडकरवादी था और यह अपने आप में समानता का समर्थन देने के बराबर है. आंबेडकर और फुले की परंपरा बहुजन के उत्थान के बारे में है. आंबेडकरवादी के लिए बहुजन के पक्ष में खड़ा होना एक विचार है और इसमें सभी सामाजिक श्रेणियां आती हैं जो जातिवादी ढांचे में निचले पायदान पर खड़ी हैं.

रोहित प्रखर आंबेडकरवादी था और यह अपने आप में समानता का समर्थन देने के बराबर है

यह बहुजन की परंपरा है और इसलिए इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता कि रोहित दलित था या ओबीसी. बाबासाहेब आंबेडकर की नजर में तीन लोग उनके नायक थे. बुद्ध, कबीर और फुले. बुद्ध किसान समुदाय से आते थे और कबीर बुनकर समुदाय से जबकि फुले माली थे. 

साहू जी महाराज के बारे में आंबेडकर बेहद सम्मान रखते थे और वह कुंडी मराठा समुदाय से ताल्लुक रखते थे. ये सभी नेता सभी अलग-अलग सामाजिक समुदाय से आते थे और संयोगवश यह सभी आज की स्थिति के मुताबिक ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे.

जब आरएसएस यह कहता है कि रोहित दलित नहीं था तब वह यह साबित कर देते हैं कि उन्हें दरअसल बहुजन आंदोलन की समझ ही नहीं है. यह केवल दलितों का आंदोलन नहीं रहा है. इसमें सभी लोग शामिल रहे हैं. यही वजह है कि उनकी बांटो और राज करो की कोशिश काम नहीं कर पाई है.

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हालांकि यह मेरे तर्क का महज आधा हिस्सा है. चलिए यह मान लेते हैं कि रोहित किसी ऊंची जाति का लड़का था. रोहित आंबेडकर और फुले का जबरदस्त समर्थक था. आप इसे यूनिवसिर्टी के संदर्भ में देख सकते हैं. वह आंबेडकर और फुले दोनों का जन्मदिन मनाता था. आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन का सदस्य होने के नाते उसने उनके आदर्श समाज के सपने को सामने रखा. उसे मुजफ्फनरगर दंगों में मारे गए मुस्लिमों से सहानुभूति थी. उसने इरोम शर्मिला का समर्थन करते हुए अफ्सपा के खिलाफ बैठक में हिस्सा लिया. रोहित ने निर्भया बलात्कार कांड के खिलाफ अपनी आवाज रखी.

आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन का सदस्य होने के नाते रोहित नेआदर्श समाज के सपने को सामने रखा

रोहित ने मौत की सजा का विरोध किया. यह याकूब मेमन से जुड़ा मामला नहीं था. वह सऊदी से लेकर दुनिया के किसी भी देश में दी जाने वाली मौत की सजा का विरोधी था. ऐसे में यह कहना कि उसने याकूब का समर्थन किया, बेहूदी बात है. 

विधि आयोग की 268वीं रिपोर्ट बताती है कि मौत की सजा को लेकर जबरदस्त विवाद है और लगभग सभी न्यायविद इसके खिलाफ अपना मत रखते हैं. रोहित भी इसी बहस का हिस्सा था. इसलिए रोहित सांप्रदायिकता के खिलाफ  दलित और ओबीसी की एकता का प्रतीक है. वह मानवतावाद, गैर ब्राह्मणवादी समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है. यही वजह है कि रोहित की खुदकुशी के खिलाफ समाज के सभी वर्ग के युवाओं के बीच उतना ही आक्रोश है.

आरएसएस इस मामले में बुरी तरह से फंस गया है. उन्हें पहले लगा कि रोहित को ओबीसी बता देने से उनकी स्थिति आसान हो जएगी. लेकिन वह आंबेडकर को प्रेम करने वाले किसी व्यक्ति के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे जिसके भीतर किसी भी तरह के भेदभाव का विरोध करने का साहस है? दोनों ही हालत में वह फंस जाएंगे.

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(श्रिया मोहन से बातचीत पर आधारित)

First published: 30 January 2016, 12:44 IST
 
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