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सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड में 'रोटी बैंक' बना वरदान

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 January 2016, 20:37 IST
QUICK PILL
  • सूखे और बेमौसम बरसात के चलते बुंदेलखंड बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे \r\nहैं, घरों में बुजुर्ग ही बचे हैं. ऐसी विकट स्थिति\r\n में बुजुर्गों के लिए \'रोटी बैंक\' पेट भरने का जरिया बना\r\n है.
  • \'रोटी बैंक\' को भोजन उपलब्ध कराने वालों की संख्या सात सौ तक पहुंच गई, जिससे करीब पांच सौ लोगों का पेट भर जाता है.

पिछले दो साल से सूखे की मार झेल रहा बुंदेलखंड का इलाका अक्सर किसानों की आत्महत्याओं के कारण सुर्खियों में रहता है. राहत पैकेजों और सरकारी घोषणाओं के बावजूद इस इलाके के लोग भूखे सोने के लिए अभिशप्त हैं. ऐसे लोगों के लिए महोबा का 'रोटी बैंक' एक बड़ा सहारा बन गया है.

'रोटी बैंक' एक अनूठी पहल है जिसके जरिए बुंदेलखंड की जनता को दोनों वक्त की रोटी मुहैया कराई जा रही है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले बुंदेलखंड में 13 जिले आते हैं.

पढ़ें: सूखा, अकाल और सरकारी उपेक्षा के चलते दम तोड़ता बुंदेलखंड

सूखे और बेमौसम बरसात के चलते यहां से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं. कई इलाके ऐसे हैं, जहां घरों में बुजुर्ग ही बचे हैं. ऐसी विकट स्थिति में महोबा के गरीब और बुजुर्गों के लिए 'रोटी बैंक' पेट भरने का जरिया बना है.

पत्रकार तारा पाटकर ने की पहल

लखनऊ में एक दैनिक अखबार में काम कर रहे और महोबा के रहने वाले तारा पाटकर ने पिछले साल 15 अप्रैल को अपने साथियों के साथ मिलकर रोटी बैंक की शुरुआत की. महोबा की लोगों की गरीबी और भूखमरी को देखकर पाटकर ने लोगों की भूख मिटाने का संकल्प लिया.

शुुरुआत में पाटकर और उनके दोस्तों ने 10 घरों से दो से चार रोटी और सब्जी का संग्रह करना शुरू किया. शाम को जमा हुए खाने को उन लोगों को बांट दिया जाता था, जो भूखे सोते थे.

समय के साथ ही सहयोग करने वालों की संख्या बढ़ी. अब 'रोटी बैंक' को भोजन उपलब्ध कराने वालों की संख्या सात सौ तक पहुंच गई, जिससे करीब पांच सौ लोगों का पेट भर जाता है.

दोनों समय भोजन उपलब्ध कराने की कोशिश

तारा पाटकर ने बताया कि महोबा में एक जनवरी से गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए 12 केंद्र बनाए गए हैं. इन केंद्रों से अब दोनों समय भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है.

बुंदेली समाज के कार्यकर्ता घर-घर जाकर भोजन का संग्रह करते हैं. इसके अलावा कई स्थानों पर ऐसे डिब्बे रखे गए हैं, जिनमें लोग पैकेट में लाकर रोटी-सब्जी रख जाते हैं. बाद में खाने के पैकेट बनाए जाते हैं. पैकेट में चार रोटी और सब्जी होती है जो गरीबों में बांटा जाता है.

सिर्फ जरूरतमंद लोगों को ही मिलता है भोजन

'रोटी बैंक' के लिए काम करने वाले अरुण चतुर्वेदी ने बताया कि जिन लोगों को खाना दिया जाता है, उनका ब्योरा एक प्रोफार्मा में दर्ज किया जाता है. इस प्रोफार्मा में जरूरतमंद की पारिवारिक स्थिति, आय का जरिया और पृष्ठभूमि आदि को दर्ज किया जाता है.

तारा पाटकर के अनुसार 'रोटी बैंक' के लिए किसी से आर्थिक मदद नहीं ली जाती है. लोगों से सिर्फ बनी हुई रोटी और सब्जी ही ली जाती है. इस अभियान में हिंदू-मुस्लिम और अन्य वर्ग के लोग मिलकर काम कर रहे हैं.

बुजुर्गों के लिए वरदान बन गया 'रोटी बैंक'

बुंदेलखंड में रोजगार के साधन और आय का जरिया ना होने की वजह से बड़ी संख्या में युवा यहां से चले गए. अब घरों में केवल बुजुर्ग लोग ही बचे हैं. इन लोगों के पास भोजन का कोई जरिया नहीं बचा है. इनके लिए 'रोटी बैंक' ही सहारा है.

महोबा के रहने वाले दुकानदार अचल सोनी ने बताया है कि 'बुंदेली समाज' संगठन के कार्यकर्ता लोगों से लगातार यही अपील कर रहे हैं कि भीख मांगने वालों को पैसे नहीं बल्कि खाना दें.

पढ़ें: बुंदेलखंड सूखे का केंद्र है, लेकिन लोगों को पता तक नहीं हैः योगेंद्र यादव

लोगों के सहयोग और 'रोटी बैंक' से हो रहे भोजन वितरण के कारण इस इलाके में भीख मांगने वालों की संख्या कम हो गई है.

महोबा शहर से शुरू हुआ गरीबों की भूख मिटाने का अभियान अब ग्रामीण इलाकों की ओर बढ़ चला है. आम लोगों की यह कोशिश सरकारों को आइना दिखाने वाली भी है. (आईएएनएस)

First published: 26 January 2016, 20:37 IST
 
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