Home » इंडिया » Row over his degrees is Modi's own fault. He must rectify it now
 

डिग्री विवाद: मोदी ने खड़ा किया है और मोदी ही खत्म कर सकते हैं

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 January 2017, 8:23 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने प्रधानमंत्री की नरेंद्र मोदी की सारी शैक्षिक योग्यताओं के प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश जारी कर दिया है. इस आदेश से एक अनावश्यक विवाद पर सभी का ध्यान केंद्रित हो गया है. साथ ही इसने प्रधानमंत्री के लिए एक असहज स्थिति पैदा हो गई है.

विडम्बना यह है कि इस सारे विवाद को प्रधानमंत्री कार्यालय ने ही खड़ा किया है. जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने उस आरटीआई का जवाब देने से इंकार कर दिया था जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की सभी शैक्षणिक योग्यताओं का ब्योरा और उनकी प्रतिलिपि मांगी गई थी. चुनाव अयोग ने भी इस संबंध में कोई भी जानकारी देने से इंकार कर दिया था, इसके बाद दिल्ली और गुजरात के वे विश्वविद्यालय भी इसी राह चले जहां से मोदी ने अपनी डिग्रियां ली हैं.

अप्रैल 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सारा ब्यौरा सार्वजनिक करने का आदेश दिया था, जिसके बाद सारे मीडिया का ध्यान इस पर आ टिका और भाजपा नेताओं को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी के डिग्री प्रमाणपत्र जारी करने पड़े थे. लेकिन जैसा कि भाजपा ने सोचा होगा, इसके बाद भी ये मुद्दा खत्म नहीं हुआ. 

इसके बजाए, इस सारे मामले में संदेह और गहरा गया क्योंकि भाजपा ने जो ब्यौरा जारी किया उसमें कई असंगतियां दर्ज की गई थीं. जल्दी ही एक और आरटीआई में यह जानकारी मांगी गई कि प्रधानमंत्री के साथ 1978 के बैच में जिन छात्रों ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन किया था, उन सबके नाम जारी किए जाएं.

अब सीआईसी ने इस सूची को जारी करने का आदेश दिल्ली विश्वविद्यालय को दिया है. सीआईसी ने कहा है कि किसी भी छात्र, वह पूर्व छात्र हो या वर्तमान, की शैक्षिक योग्यताओं के बारे में जानकारी जनहित का मुद्दा है.

अब प्रधानमंत्री पर है नजर

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की अकादमिक पृष्ठभूमि ही विवाद का विषय बन जाए. लेकिन इसके लिए प्रधानमंत्री का कार्यालय ही सारे विवाद की जड़ नजर आता है, क्योंकि पीएमओ ने जिस जानकारी को देने से इंकार किया, उसी के बाद सारा विवाद खड़ा हो गया. अगर प्रधानमंत्री कार्यालय ने उसी समय सारी जानकारी दे दी होती तो सारा विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाता. 

इसके बाद जिन संस्थाओं से इस संबंध में जानकारी मांगी गई, उन संस्थाओें ने संभवत: पीएमओ से मिले संकेत को समझते हुए वही नकारात्मक जवाब दिया. इसके बाद इस सारे मसले ने राजनीतिक रंग ले लिया. विपक्षी पार्टियों ने इस सारे मुद्दे के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया और यह मुद्दा एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का मंच बन गया.

भारत में जहां अब भी 75 प्रतिशत लोग साक्षर नहीं हैं, वहां किसी को चुनाव लड़ने के लिए उसकी शैक्षिक योग्यता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है. सच तो यह है कि आज भी वर्तमान लोकसभा में 50 प्रतिशत सांसद भी ग्रेजुएट नहीं हैं. 13 प्रतिशत ने मैट्रिक पास नहीं की है और 10 प्रतिशत मात्र मैट्रिक पास हैं. इसलिए किसी लोकतांत्रिक रूप से चुने व्यक्ति के लिए अपनी शैक्षिक योग्यताओं के बारे में रक्षात्मक मुद्रा अपनाने की कोई खास वजह नहीं दिखती है.

अब समय आ गया है कि मोदी इस बात को स्वीकार करें कि यह विवाद काफी कुछ उन्हीं की गलती से खड़ा हुआ है और अपनी जग प्रसिद्व वाकपटुता का इस्तेमाल करते हुए इस विषय पर बोलकर इससे जुड़ी सभी अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दें. भारत को अब इस तरह के विवादों से आगे बढ़ने की जरूरत है.

First published: 10 January 2017, 8:23 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

पिछली कहानी
अगली कहानी