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सवर्णों को आरक्षणः गुजरात सरकार ने बढ़ाया आरएसएस का एजेंडा

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • गुजरात सरकार ने गरीब सवर्णों को नौकरी और उच्च शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है. ये आरक्षण एससी, एसटी और ओबीसी को मिलने वाले 49 प्रतिशत आरक्षण से अलग होगा.
  • गुजरात की बीजेपी सरकार के इस फैसले पर सभी राष्ट्रीय दल संभल कर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. संसद सत्र में किसी भी पार्टी या नेता इसपर चर्चा नहीं की.

बीजेपी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सपने को पूरा करने की दिशा में एक और क़दम बढ़ा दिया है. वो सपना है, “आरक्षण नीति" खत्म करने का.

शुक्रवार को गुजरात सरकार ने घोषणा की कि आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) को सामान्य वर्ग में 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. ये आरक्षण उन परिवारों को मिलेगा जिनकी सालाना आय छह लाख रुपये से कम हो. भारत की अगड़ी जातियों में लम्बे समय से इस तरह की मांग उठती रही है.

पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कही थी. इस बयान के नकारात्मक चुनावी असर को भांपते हुए भागवत ने ये कहकर सफाई दी कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है. हालांकि बिहार चुनाव में फिर भी बीजेपी को जरबदस्त हार का सामना करना पड़ा था.

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बिहार में चुनावी हार के बावजूद संघ ने आरक्षण को लेकर अपना एजेंडा छोड़ा नहीं. बल्कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के गृह प्रदेश गुजरात में आरक्षण की नई प्रयोगशाला खोल दी.

राज्य की मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल ने कहा है कि ये आरक्षण अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को दिए जाने वाले 49 प्रतिशत कोटे से अलग होगा.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बिहार विधान सभा चुनाव से ठीक पहले आरक्षण की समीक्षा की जरूरत बताई थी

यानी गुजरात में सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में 59 प्रतिशत सीटें आरक्षित होंगी. बीजेपी के गुजरात इकाई के अध्यक्ष विजय रूपानी ने कहा है कि वो इसके पक्ष में अदालती लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार हैं.

पटेल और रूपानी दोनों ये बताना नहीं भूले कि इस फैसले को नरेंद्र मोदी और अमित शाह का समर्थन हासिल है.

गुजरात सरकार का ये फैसला संभवतः एक मई को अधिसूचित होगा. एक मई गुजरात का स्थापना दिवस है.

राज्य में कुछ समय पहले पाटीदार समुदाय के लोगों ने आरक्षण के लिए आंदोलन किया था. पाटीदार अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आरक्षण दिए जाने की मांग कर रहे थे.

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लेकिन सरकार की इस घोषणा से पाटीदार समुदाय संतुष्ट नज़र नहीं आ रहा है. उसकी मांग है कि उन्हें ओबीसी घोषित किया जाए. उनकी इस मांग का सीधा कारण ये है कि ओबीसी घोषित किए जाने पर वो 27 प्रतिशत आरक्षण वाले वर्ग में आ जाएंगे जबकि प्रावधान के तहत केवल 10 प्रतिशत वाले वर्ग में रहेंगे.

गुजरात सरकार का फैसला जब सामने आया तो संसद के बज़ट सत्र का उत्तरार्ध चल रहा था. इसके बावजूद सदन में इसपर चुप्पी ही रही. मंडल आंदोलन से निकले नेता नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान और बीजेपी के हुकुम नारायण सिंह यादव समेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक इस मामले पर चुप ही रहे.

कैच ने जब जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी से इस मामले पर उनकी राय पूछी तो उन्होंने गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण दिए जाने का स्वागत किया, बशर्ते एससी, एसटी और ओबीसी के 49 प्रतिशत आरक्षण को कम न किया जाए. त्यागी ने कहा कि खुद मंडल कमीशन ने भी गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की संस्तुति की थी.

जदयू नेता केसी त्यागी कहते हैं कि गुजरात सरकार का फैसला सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएगा

त्यागी ने कहा कि बिहार में उनकी पार्टी की सरकार ने एक कमीशन बनाया जिसने गरीब सवर्णों के लिए ऐसे ही अनुशंसा की गई है. ये पूछने पर कि फिर बिहार सरकार इसे लागू क्यों नहीं कर रही है? त्यागी ने कहा कि सरकार जल्द ही कदम उठाने वाली है.

गुजरात कांग्रेस के नेता इस मामले में बीजेपी से भी आगे बढ़ते नज़र आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि कांग्रेस सत्ता में आई तो वो इस आरक्षण को 20 प्रतिशत  कर देगी.

सीपीएम ने इस फैसले को राजनीतिक शगूफा कहा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने कैच से कहा कि सैद्धांतिक तौर पर उनकी पार्टी इसका स्वागत करती है लेकिन बीजेपी को पता है कि उसका ये फैसला अदालत में नहीं टिकेगा. सलीम कहते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट इसे खारिज कर देगा तो बीजेपी लोगों के सामने खुद को बेबस बताएगी.

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के प्रवक्ता मनोज झा ने कैच से कहा कि इस मसले पर उनकी "निजी राय" ये है कि "ये त्रासद फैसला है.”

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झा ने कहा कि गुजरात सरकार आरक्षण के विचार को ही समझने में विफल प्रतीत हो रही है. उनके अनुसार आरक्षण समाज के कमजोर तबके के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है. इसका उद्देश्य कभी भी गरीबी-उन्मूलन और रोजगार-सृजन नहीं रहा है.

झा ने कहा कि गुजरात सरकार हिन्दू जाति व्यवस्था की 'पदसोपानिकता' (हायरार्की) को समझने में विफल रही है और "एक गंभीर बीमारी की गलत दवा" दे रही है.

गुजरात सरकार के फैसले का व्यापक सामाजिक असर आने वाले वक्त में दिखेगा. अभी एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग की इसपर व्यापक प्रतिक्रिया आनी बाकी है. जाहिर है इन वर्गों को पहले से आरक्षण भले ही प्राप्त है लेकिन समाज में बराबरी और सम्मान पाना अभी दूर की कौड़ी प्रतीत होता है.

First published: 1 May 2016, 10:29 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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