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संघ के पलटवार से मध्यप्रदेश पुलिस के आठ अफ़सर फरार

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 3 October 2016, 5:12 IST
QUICK PILL
  • मध्यप्रदेश के बालाघाट ज़िले में संघ के एक प्रचारक पर कार्रवाई करना जिले के पुलिस प्रशासन को बेहद महंगा पड़ता दिख रहा है.
  • राजनीतिक दबाव में अब प्रचारक के ऊपर कार्रवाई करने वाले थानेदार समेत कई पुलिसकर्मियों पर उन्हीं के थाने में मामला दर्ज कर लिया गया है.
  • इनमें से कई पुलिस अधिकारी राजनीतिक दाबव और गिरफ्तारी से बचने के लिए फिलहाल अंडरग्राउंड हो चुके है. थाना इंचार्ज दूसरे धर्म के होने के कारण उनपर सबसे ज़्यादा निशाना साधा गया.

मध्यप्रदेश के बालाघाट ज़िले में संघ के ज़िला प्रचारक सुरेश यादव पर कार्रवाई की कोशिश करने वाले पुलिस अफ़सरों की जान पर बन आई है. दबाव इस क़दर है कि ना चाहते हुए भी मध्यप्रदेश पुलिस को अपने ही विभाग के चार पुलिस अफ़सरों और चार कान्सटेबलों पर उन्हीं के थाने में लूट, बलवा और हत्या की कोशिश जैसी सात गंभीर धाराओं में मुक़दमा दर्ज करना पड़ा है.

26 सितंबर की सुबह 3.55 मिनट पर दर्ज हुई एफ़आईआर के बाद से सभी पुलिस अधिकारी और कॉन्सटेबल अंडरग्राउंड हैं. इनमें बालाघाट ज़िले के एडिशनल एसपी राजेश शर्मा और थाना प्रभारी ज़ियाउल हक़ जैसे बड़े अधिकारी शामिल हैं. आरएसएस का दबाव बढ़ने पर मध्यप्रदेश सरकार ने 28 सितंबर को इस केस की जांच सीआईडी को सौंप दी लेकिन संघ फिर भी संतुष्ट नहीं हुआ.

29 सितंबर को संघ के आह्वान पर बालाघाट बंद के बाद शिवराज सरकार को 2 अक्टूबर को एसपी डॉक्टर असित यादव और ज़ोन के आईजी दिनेश सागर का तबादला करना पड़ा.

इस विवाद के केंद्र में बालाघाट ज़िले के संघ प्रचारक सुरेश यादव हैं जिन्हें 25 सितंबर की रात एक धर्म व उसकी मान्यताओं के अपमान और दो वर्गों के बीच वैमनस्यता फ़ैलाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. उसी वक़्त उन्हें ज़मानत भी मिल गई लेकिन सुरेश यादव बैहर थाने से वापस नहीं लौटे, वे थाने में जम गए. थाने में धीरे-धीरे संघ के स्थानीय नेता जमा होने लगे. घटना के वक्त थाने में मौजूद रहे एक पुलिसवाले ने कैच न्यूज़ को बताया कि संघ समर्थकों का जुटान होने पर सुरेश यादव पुलिसवालों को धमकाने लगे और कुछ ही घंटों में अपनी ताक़त का एहसास भी करवाया.

गिरफ़्तार मुलज़िम ने उसी थाने में पुलिस अफ़सरों पर दर्ज करवाया मुक़दमा

तकरीबन चार घंटे बाद उसी रात 3:55 बजे मुलज़िम सुरेश यादव की तहरीर पर बालाघाट ज़िले के एडिशनल एसपी राजेश शर्मा, बैहर थाना इंचार्ज ज़ियाउल हक़, सब इंस्पेक्टर अनिल अजमेरिया और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर सुरेश विजयवार और अन्य पुलिसकर्मियों पर गंभीर धाराओं में मुक़दमा क़ायम किया गया. फ़िर तीन घंटे बाद सुबह 7 बजे इन्हीं पुलिसवालों पर एक और मुक़दमा हुआ.

यह एफआईआर थाने के नज़दीक एक मेडिकल स्टोर के मालिक स्वामी प्रसाद असाटी की तहरीर पर की गई. महज़ कुछ घंटे के अंदर अपने ऊपर हुई दो-दो एफआईआर को देखकर सकते में आए पुलिसवाले ज़िला छोड़कर फ़रार हो गए. दोपहर होने तक मध्यप्रदेश पुलिस ने चार पुलिस अधिकारी और चार कॉन्सटेबलों को निलंबित कर दिया और तीन होमगार्ड भी बर्ख़ास्त कर दिए गए.

इस मामले की तपिश मध्यप्रदेश सरकार तक भी पहुंची. गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह को दबाव में बयान देना पड़ा कि संघ प्रचारक की पिटाई इसलिए हो गई क्योंकि पुलिस उन्हें पहचान नहीं पाई थी. नई दुनिया अख़बार ने अपनी एक रिपोर्ट में भूपेंद्र सिंह को कोट किया है, 'अब आरएसएस के नेताओं का परिचय उनके क्षेत्र के थाने में पुलिस से करवाने की व्यवस्था की जाएगी. इन नेताओं की सूची भी थाने में दी जाएगी. इस व्यवस्था को पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा.' इस ख़बर का शीर्षक है, 'हर थाने में संघ नेताओं का पुलिस से परिचय करवाएगी सरकार: गृह मंत्री'

संघ प्रचारक सुरेश यादव पर इल्ज़ाम क्या हैं?

छतरपुर के रहने वाले संघ प्रचारक सुरेश यादव दो साल पहले बालाघाट ज़िले में भेजे गए हैं. शाखा लगवाने के अलावा वह ज़िले में चल रही संघ की गतिविधियों के लिए ज़िम्मेदार हैं. यहां स्थानीय मीडियाकर्मियों का 'ओएनआई न्यूज़ वनांचल' के नाम से एक वाट्सएप ग्रुप है. मध्यप्रदेश पुलिस के एक अफ़सर के मुताबिक संघ प्रचारक सुरेश यादव ने इस ग्रुप में 24 सितंबर को इस्लाम और पैगंबर से जुड़ी भड़काऊ बातें पोस्ट की थीं.

ऐसा कंटेंट कई वट्सएप ग्रुपों में बार-बार डाला जा रहा था और उन ग्रुपों में मौजूद मुसलमान इसपर आपत्ति कर रहे थे. बावजूद इसके, भड़काऊ कंटेंट पोस्ट किया जाता रहा. फिर जब 24 तारीख़ को सुरेश यादव ने 'ओएनआई न्यूज़ वनांचल' में भड़काऊ कंटेंट पोस्ट किया तो उसमें मौजूद नवाब ख़ान नाम के एक युवक ने विरोध किया और 25 सितंबर की शाम बैहर पुलिस थाने जाकर लिखित शिक़ायत कर दी. (कैच न्यूज़ के पास ग्रुप में पोस्ट किए गए कंटेंट का स्क्रीनशॉट मौजूद है.)

इस थाने के इंचार्ज एक मुसलमान अफ़सर ज़ियाउल हक़ थे. कैच न्यूज़ के सूत्रों के मुताबिक़ ज़ियाउल हक़ ने इस शिक़ायत की जानकारी अपने सरकारी फ़ोन से एसपी बालाघाट डॉक्टर असित यादव को उसी वक़्त दी. गणेश चतुर्थी और नवरात्र जैसे त्योहारी मौसम में ऐसे भड़काऊ कंटेंट की वजह से हो सकने वाले तनाव के मद्देनजर प्रशासन चौकन्ना हो गया.

असित यादव ने अपने मातहतों को कार्रवाई का आदेश दिया. फ़िर रात 8 बजे के क़रीब एडिशनल एसपी राजेश शर्मा, थाना इंचार्ज ज़ियाउल हक़, सब इंस्पेक्टर अनिल अजमेरिया, असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर सुरेश विजयवार और चार कॉन्सटेबल सुरेश यादव के घर पहुंचे और उन्हें थाने ले आए.

कस्टडी से भागा था आरोपी

इस दबिश में शामिल एक अफ़सर कहते हैं कि थाने में घुसने से पहले ही सुरेश पुलिस की गिरफ़्त से छूटकर भाग निकले. वे थाने के नज़दीक स्थित असाटी मेडिकल स्टोर में घुस गए. फिर पुलिसवालों की टीम उन्हें मेडिकल स्टोर से पकड़कर थाने लाई और यहां आघे की कानूनी कार्रवाई की गई.

सीआरपीसी में उल्लेख है कि अगर आरोपी कस्टडी से भागता है तो पुलिस उसे भारत की सीमाओं के अंदर जहां तक मुमकिन है जाएगी और पकड़कर लाएगी. अफ़सर पूछते हैं कि आरोपी को दबोचना अपराध कैसे हो गया? तफ़्तीश में सुरेश यादव के मोबाइल में भड़काऊ कंटेंट मिलने पर उनका फ़ोन ज़ब्त किया गया है. फिर मेडिकल करवाने के बाद उनके ऊपर मुक़दमा क़ायम किया गया और गिरफ़्तारी हुई.

कैच न्यूज़ के पास मौजूद सुरेश यादव की मेडिकल रिपोर्ट में लिखा है कि उनके शरीर पर खरोंच और सूजन पाई गई. उन्होंने पूरे शरीर और निजी अंगों में दर्द की शिक़ायत की थी. इस रिपोर्ट में उन्हें विशेषज्ञ की राय लेने के लिए कहा गया लेकिन किसी फ्रैक्चर वग़ैरह का ज़िक्र नहीं है. हालांकि अब उनके दाहिने पांव में प्लास्टर बंधा हुआ है.

मुलज़िम ने पुलिसवालों पर उन्हीं के थाने में एफआईआर करवाई

सुरेश यादव की गिरफ़्तारी की कार्रवाई देर रात एक बजे तक चली लेकिन इसके तीन घंटे बाद 3:55 बजे इसी थाने में सुरेश की शिक़ायत पर बैहर थाना इंचार्ज ज़ियाउल, एडिशनल एसपी राजेश शर्मा समेत कइयों पर एफ़आईआर हो गई.

इनपर 392 (लूट), 307 (हत्या की कोशिश), 452 (घर में अपराध करने के इरादे से घुसना), 147 (बलवा), 294 (गाली गलौज करना), 323 (मारपीट करना) और 506 (जान से मारने की धमकी देना) जैसी धाराएं लगाई गई हैं. सुरेश ने अपने बयान में कहा है कि उनकी इतनी पिटाई की गई कि वह बेहोश हो गए थे, फिर जब होश आया तो उनके पांच हज़ार रुपए, दो मोबाइल फ़ोन, सोनाटा घड़ी भी गायब थी. (कैच न्यूज़ के पास एफआईआर मौजूद है)

इन्हीं पुलिसवालों पर दूसरी एफ़आईआर सुबह 7 बजे मेडिकल स्टोर के मालिक स्वामी प्रसाद असाटी की शिक़ायत पर दोबारा दर्ज हुई. धाराओं में 147, 452, 506, 323, 294 शामिल हैं. महज़ कुछ घंटे में दो एफ़आईआर दर्ज होने से पुलिसवालों को समझ आ गया कि इस कार्रवाई का आदेश 'ऊपर' से हुआ है और अब मामला एसपी असित यादव और आईजी दिनेश सागर के नियंत्रण से बाहर है.

संघ की मांग या धमकी?

दोपहर तक महाकौशल प्रांत के संघ प्रमुख प्रशांत सिंह ने प्रेस रिलीज़ जारी करते हुए एडिशनल एसपी राजेश शर्मा, एसएचओ ज़ियाउल हक़ समेत सभी 'दोषी' पुलिसवालों की गिरफ़्तारी की मांग भी कर दी. साथ में यह भी लिखा कि 'इस घटना की तीव्रता समझकर कार्यवाई करें अन्यथा इस असंतोष की प्रांत व्यापी प्रतिक्रिया संभावित है.' संघ के आह्वान पर 29 सितंबर को बालाघाट ज़िला बंद करवाया गया. आसपास के ज़िलों में भी इसका असर देखने को मिला था.

इस केस की शुरुआती जांच साफ़ करती है कि संघ प्रचारक सुरेश यादव ने वॉट्सएप ग्रुप में भड़काऊ पोस्ट डाले थे जिसकी वजह से पुलिस ने कार्रवाई की. मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड समेत कई राज्यों में सोशल मीडिया पर डाली जा रहीं भड़काऊ सामग्री की वजह से दंगे हो चुके हैं. ऐसे में पुलिस सुरेश यादव का कंटेंट देखने के बाद उनपर लगाम नहीं कसती तो क्या करती?

फ़रार चल रहे एक पुलिस अफ़सर ने कैच न्यूज़ से बातचीत में कहा है कि हम बेहद डरे हुए हैं. चूंकि मामले की निगरानी संघ कर रहा है, और सरकार उनके साथ है इसलिए हम सरेंडर नहीं करेंगे. हालात इतने बदतर हैं कि हमें फ़ौरन जेल में डाल दिया जाएगा. अफ़सर ने कहा कि हम एंटिसिपेटरी बेल के लिए अपील करेंगे. अगर बेल रिजेक्ट हो गई तो फिर सरेंडर के अलावा कोई चारा नहीं है.

घर का झगड़ा?

मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार उपदेश अवस्थी कहते हैं कि शुरु में यह केस पुलिस बनाम संघ था लेकिन बाद में पता चला कि इसमें भाजपा भी शामिल है. राज्य के कई इलाक़ों में विधायकों और संघ के पदाधिकारियों के बीच संघर्ष होते रहे हैं. 30 सितंबर को तेंदूखेड़ा से भाजपा विधायक संजय शर्मा ने कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन पर आरोप लगाया था कि उन्हें इस कार्रवाई की जानकारी पहले से थी.

फिर पार्टी ने संजय शर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए सात दिन के भीतर जवाब देने के लिए कहा कि आख़िर उन्होंने किस बुनियाद पर मंत्री के ऊपर आरोप लगाया है. एक दिन बाद नरसिंहपुर से विधायक जालिम सिंह पटेल ने भी संजय शर्मा का आरोप दुहरा दिया है. अवस्थी कहते हैं कि यह मामला 'घर की लड़ाई' है और बलि का बकरा पुलिस महकमा बनाया जा रहा है.

हालांकि पीड़ित पुलिस अधिकारी ऐसा नहीं मानते. वह कहते हैं कि जांच कितनी भी हो जाए, निकलेगा यही कि पुलिसवाले ड्यूटी कर रहे थे और संघ पदाधिकारी पर कार्रवाई आधा दर्जन से ज़्यादा पुलिसवालों को एफआईआर झेलनी पड़ी है. सभी पुलिसवालों पर हुए हमले में सबसे ज़्यादा शिकार थाना इंचार्ज ज़ियाउल हक़ हैं क्योंकि उनकी धार्मिक पहचान बाक़ियों से जुदा है.

मीडिया ने कैसे रिपोर्ट किया?

इस केस में अधिकांश स्थानीय मीडिया ने एकतरफा ख़बरें छापी हैं. पत्रकार उपदेश अवस्थी कहते हैं कि मीडिया ने हवा भी ज़्यादा दी है, वरना ज़मीन पर पुलिसवालों के ख़िलाफ़ गुस्से जैसा कुछ नहीं है. इस बीच मध्यप्रदेश के एक अख़बार ब्लिट्ज़ टुडे ने ज़ियाउल हक़ पर लिखी गई ख़बर का हेडिंग लगाया है, 'पाक समर्थक निकला मप्र पुलिस का अधिकारी.' ख़बर में लिखा है कि संघ प्रचारक सुरेश यादव द्वारा फेसबुक पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ किए गए कमेंट को आधार बनाकर थाना इंचार्ज ने उन्हें पीटकर अधमरा कर दिया.

अख़बार आगे लिखता है कि इस अधिकारी के कृत्य के बाद दुश्मन देश के हितचिंतक होने का सुबूत भी दे दिया है. राज एक्सप्रेस ने भी ज़ियाउल को तालीबानी अधिकारी लिखा है. एक अन्य अख़बार लिखता है कि 'आरएसएस प्रचारक पर हमला करने वाले सेवा मुक्त किए जाएं.'

ज़ियाउल के विरुद्ध सांप्रदायिक दुर्भावना?

36 साल के ज़ियाउल हक़ का चयन मध्यप्रदेश पुलिस में 2007 में हुआ था. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू अकादमी, सागर से ट्रेनिंग ली है. ट्रेनिंग में बेहतर प्रदर्शन और परेड कमांडर होने के नाते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उन्हें सम्मानित भी कर चुके हैं. बेहतर प्रदर्शन के नाते ही उन्हें सब इंस्पेक्टर से टीआई बनाया गया है.

इन उपबल्धियों के बावजूद, स्थानीय मीडिया उन्हें पाकिस्तानी और तालीबानी लिख रहा है. मीडिया के इस रवैये से नाराज़ ज़ियाउल के कई साथी, जो सागर में ट्रेनिंग के दौरान उनके साथ थे, ने अपना फेसबुक प्रोफ़ाइल काला कर लिया है जबकि कुछ ने उनकी तस्वीर लगा ली है. ज़ियाउल के एक साथी कहते हैं कि वह सांप्रदायिक तनाव फ़ैलाने के दोषी पर लगाम कसने गए थे लेकिन ख़ुद उस घृणा का शिकार हो गए और आज उन्हें अंडरग्राउंड होना पड़ रहा है.

First published: 3 October 2016, 5:12 IST
 
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