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आरएसएस खाकी हाफपैंट को फुलपैंट में बदलने को तैयार

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 March 2016, 8:31 IST
QUICK PILL
  • आरएसएस के कैडरों के परंपरागत पोशाक में बदलाव पर लंबे समय से विचार चल रहा है. 11 मार्च से शुरू संघ के तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिध सभा के आखिरी दिन इस बदलाव की घोषणा हो सकती है.
  • आरएसएस के सूत्र के अनुसार संगठन खाकी हाफपैंट की जगह नीली फुलपैंट को अपनी पोशाक के रूप में स्वीकार कर सकता है. युवाओं की पसंद को देखते हुए संगठन कुछ बड़े बदलाव करना चाहता है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जल्द ही अपनी परंपरागत खाकी हाफ पैंट को त्याग सकता है. संगठन में लंबे समय से इसपर विचार-विमर्श चल रहा था. संगठन 13 मार्च को इसकी घोषणा कर सकता है.

आरएसएस के सूत्रों की मानें तो संगठन खाकी हाफपैंट की जगह नीले रंग की फुलपैंट को अपने गणवेश में शाममिल कर सकता है.

संगठन के तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिध सभा (एबीपीएस) के समापन दिवस यानी 13 मार्च को इसकी घोषणा की जा सकती है. राजस्थान के नागौर में 11 मार्च से शुरू हो रही इस सभा में हर साल पूरे प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर के सभी नेता शामिल होते हैं. आरएसएस के क्रियान्वयन में इस सभा का काफी महत्व है.

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शुक्रवार से शुरू होने वाली सभा के लिए संगठन के तमाम प्रमुख नेता अभी से राजस्थान पहुंचने लगे हैं.

इस सभा में इस बात पर चर्चा होगी कि क्या आरएसएस की पहचान बन चुके खाकी हाफपैंट को बदलकर उसकी जगह फुलपैंट को पोशाक में शामिल किया जाए.

अपने 90 साल के इतिहास में आरएसएस ने अब तक केवल एक बार पोशाक में बदलाव किया है

एक आरएसएस पदाधिकारी ने कैच को बताया, "हमारी एक टीम संभावित भावी पोशाक पर काम कर रही है. वो उसके रंग और फैब्रिक पर विचार कर रहे हैं."

संगठन गाढ़े रंग की फुलपैंट को प्राथमिकता दे सकता है. कुछ सूत्रों के अनुसार नीली पैंट कई पदाधिकारियों की पहली पसंद है.

आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी. पिछले संगठन ने अपनी स्थापना के 90 साल पूरे किए. इस दौरान संगठन की पोशाक में केवल एक बार बदलाव हुआ है.

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स्थापना के समय आरएसएस कैडरों के लिए पुलिस की वर्दी से मिलती-जुलती पोशाक निर्धारित की गयी थी. संगठन का शुरुआती गणवेश खाकी शर्ट और खाकी हाफपैंट था. शर्ट में पुलिस और सेना की तरह दो पॉकेट होते थे.

बाद में खाकी शर्ट की जगह सफेद शर्ट को पोशाक में शामिल किया गया. ये बदलाव संघ के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवरकर गुरूजी ने किया था.

करीब दो साल पहले पोशाक के संग पहनी जाने वाली चमड़े की बेल्ट की जगह नायलॉन की बेल्ट को शामिल किया गया था. संगठन ने तब कहा था कि वो पर्यावरण हितों के कारण चमड़े का बेल्ट बदल रहा है.

एमएस गोलवरकर ने आरएसएस की खाकी शर्ट को बदलकर सफेद शर्ट को पोशाक में शामिल किया था

पिछली एबीपीएस रांची में हुई थी जिसमें संघ के कैडरों की पोशाक पर विचार करने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया गया था.

उस समय कहा गया था कि ये कमेटी इस विषय पर विचार करके अगले साल के एबीपीएस में अपना निर्णय पेश करेगी.

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संगठन के अंदर कई नेता ये आवाज उठाते रहे हैं कि युवा पीढ़ि को खाकी हाफपैंट वाली पोशाक पसंद नहीं आती.

माना जा रहा है कि इसीलिए संगठन सैन्य वर्दी जैसी पोशाक को बदलकर सिविल ड्रेस जैसी पोशाक लाना चाहता है.

कुछ विश्लेषक नीली फुलपैंट लाने के पीछे आंबेडकरवादियों को करीब लाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं. आरएसएस लंबे समय से दलितों को खुद से जोड़ने की कोशिश कर रहा है.

पिछले कुछ सालों में आरएसएस की शाखा में शामिल होने वालों की संख्या घटी है. ऐसे में संगठन को शायद उम्मीद है कि पैंट की लंबाई बढ़ाने से उसके कैडरों की कतार की लंबाई में भी बढ़ोतरी होगी.

First published: 10 March 2016, 8:31 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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