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मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी उतना ही संघ का है जितना की बीजेपी

चारू कार्तिकेय | Updated on: 9 July 2016, 7:40 IST

क्या आप ऐसा मानते है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक मुस्लिम-विरोधी संगठन है? अगर आप ऐसा मानते हैं तो हम आपको बता दें कि संघ अपने अधीन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) नाम का एक उप-संघटन संचालित करता है. एमआरएम का दावा है कि उसका उद्देश्य ‘‘हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच समझ और संवाद को बढ़ाना’’ है. इनकी वेबसाइट पर साफ लिखा है कि यह संगठन ‘‘आरएसएस नेताओं की पहल पर’’ गठित किया गया था.

लेकिन अब संघ को एक दिक्कत है. एमआरएम ने हाल ही में एक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जिसमें आमंत्रित किये गए विशिष्टजनों में कथित तौर पर भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित का नाम भी शामिल था. इसी दौरान पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने जम्मू-कश्मीर के पंपोर में हमला करते हुए सीआरपीएफ के आठ जवानों की जान ले ली. पाकिस्तान उच्चायोग में चल रहे इफ्तार के दौरान जब पत्रकारों ने उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने इस सवाल का जवाब देने की बजाय उनसे ‘‘इफ्तार पार्टी का आनंद लीजिये’’ कहा.

बासित की यह असंवेदनशीलता देश को नागवार गुजरी और उसके बाद से ही एमआरएम पर बासित का निमंत्रण रद्द करने का दबाव पड़ने लगा.

अंदाजा लगाइये इसके बाद क्या हुआ? आखिरकार एमआरएम ने बासित का निमंत्रण रद्द कर दिया. एमआरएम के आधिकारिक राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजल ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘‘जब हमने देखा कि उनके उच्चायुक्त के मन में हमारे मारे गए जवानों के प्रति संवेदना तक नहीं है तो हमने पाकिस्तन का निमंत्रण रद्द करने का फैसला किया. उनका बयान पाकिस्तान के असली इरादे स्पष्ट करता है कि यह देश हमारे लिये कभी भी अच्छा नहीं हो सकता.’’

इफ्तार और एमआरएम को लेकर आरएसएस का स्पष्टीकरण

सामान्य परिस्थितियों में इस मामले में अगर आरएसएस की बात करें तो उनके लिये मामला यहीं समाप्त हो जाना चाहिये था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सामान्यतः आरएसएस दैनिक राजनीतिक गतिविधियों को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं देती है लेकिन इस बार उसने अपने अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ मनमोहन वैद्य को एक स्पष्टीकरण के साथ आगे बढ़ाया.

एमआरएम से संबंधों को लगभग नकारते हुए वैद्य ने कहा, ‘‘आरएसएस द्वारा इफ्तार पार्टी आयोजित करने संबंधी मीडिया की रिपोर्ट तथ्यात्मक रूप से गलत हैं. आरएसएस ऐसी कोई पार्टी आयोजित नहीं कर रहा है. इफ्तार पार्टी का आयोजन कर रहा संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच राष्ट्रीय जागरुकता जगाने वाला एक स्वतंत्र संगठन है.”

उन्होंंने अपने बयान में कहा, आरसएस केवल ऊपरी तौर पर ‘‘राष्ट्रीय स्तर पर एमआरएम के विचारों को साझा करते हैं और एमआरएम के राष्ट्रीय जागरुकता संबंधी कार्यक्रमों को अन्य राष्ट्रीय कार्यों की तरह समर्थन करते हैं.’’

आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार जो एमआरएम के संरक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं से संबंधित सवालों को लेकर बयाम में कहा गया कि कुमार एक वरिष्ठ आरएसएस पदाधिकारी हैं जो सिर्फ ‘‘एमआरएम से संपर्क में रहते हैं. वे एमआरएम में किसी औपचारिक पद पर नहीं हैं.’’

क्या यह सब सच है?

इनमें से कुछ भी सच नहीं है? एमआरएम की वेबसाइट पर एक नजर डालने पर ही आप इस संगठन और आरएसएस और विशेषकर कुमार के बीच के संबंध को आसानी से समझ सकते हैं.

एमआरएम का गठन 2002 में ‘‘राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन-एक नयी राह’’ के मूल नाम से हुआ था. 2005 में ‘‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’’ का नाम अपनाने वाला यह संगठन पूर्व आरएसएस प्रमुख सुदर्शन के दिमाग की उपज माना जाता है. सुदर्शन को संघ के भीतर एक कट्टरपंथी के रूप में जाना जाता है और वे अक्सर पूर्व प्रधामंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का विरोध भी करते थे.

एमआरएम की वेबसाइट के मुताबिक नई दिल्ली में 24 दिसंबर 2002 को आयोजित हुई एक सभा में पहली बार इस संगठन के गठन के विचार ने आकार लिया था. यह सभा एक पत्रकार मुजफ्फर हुसैन और उनकी बेगम नफीसा जो उस समय राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य थीं, की पहल पर आयोजित हुई थी. उस समय सुदर्शन के अलावा आरएसएस विचाकर एमजी वैद्य, आॅल इंडिया इमाम कौंसिल के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना जमील इलियासी, जाने-माने इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान और फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौला मुकर्रम सहित कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं.

इस सभा के प्रारंभ में ही सुदर्शन के पहले शब्दों ने एमआरएम को लेकर आरएसएस की सोच साफ कर दी थी, ‘‘दुनिया ने अबतक इस्लाम के सिर्फ हिंसक स्वरूप को ही देखा है. लेकिन इसका एक और चेहरा है जो है शांति का. क्या कोई पहल करेगा कि दुनिया के सामने इस्लाम का यह दूसरा चेहरा भी सामने आ पाए?’’ साथ ही उन्होंने यह भी पूछा, ‘‘आखिर इस देश के मुसलमानों ने अल्पसंख्यक का दर्जा स्वीकार क्यों किया जबकि वे जन्म से इस धरती का हिस्सा हैं और उनकी भी वही संस्कृति, जाति और पूर्वज हैं जो हिंदुओं के हैं.’’

इंद्रेश कुमार, मुसलमानों के बीच आरएसएस के मसीहा

एमआरएम की वेबसाइट स्वीकार करती है कि इंद्रेश कुमार ने इसकी स्थापना में ‘‘एक बेहद महत्वपूर्ण’’ निभाई थी. कुमार का मानना था कि जब हिंदु और मुसलमान ‘‘एक ही पूर्वज, संस्कृति और मातृभूमि साझा करते हैं तो फिर इन दोनों के बीच टकराव की गुंजाइश ही कहां है.’’

वेबसाइट का दावा है कि एमआरएम ने ‘‘भारतीय मुसलमानों के बीच एक नए युग की शुरुआत की है’’ और आरएसएस की ‘‘कट्टटपंथी, सांप्रदायिक हिंदू संगठन’’ की छवि को तोड़ने में मदद की है. वेबसाइट का दावा है, ‘‘मुसलमान बुद्धिजीवी और धार्मिक नेता अब खुलकर आरएसएस को अपने ‘‘सच्चे हितैषी’’ के रूप में अपनाने लगे हैं और इंद्रेश कुमार को मसीहा.’’

एमआरएम की वेबसाइट में भी कुमार को संरक्षक के रूप में दिखाया गया है. वेबसाइट पर एमआरएम की गतिविधियों को प्रदर्शित करती हर दूसरी तस्वीर में कुमार को देखा जा सकता है.

कुमार अब संघ का हिस्सा नहीं हैं और संघ चाहता है कि संगठन पूरी तरह से कुमार के नियंत्रण से मुक्त हो जाए

तो आखिर वह क्या कारण है जिसके चलते आरएसएस खुद को न सिर्फ एमआरएम से बल्कि कुमार से भी दूर दिखाना चाहता है? कहीं इसका कारण यह तो नहीं है कि कुमार अब संघ का हिस्सा नहीं हैं और संघ चाहता है कि संगठन पूरी तरह से कुमार के नियंत्रण से मुक्त हो जाए? आखिरकार कुमार कभी इतनी गुमनामी में नहीं खोए जितना 2007 के अजमेर विस्फोट और 2008 के मालेगांव विस्फोट में आने के बाद. सबसे पहले तो मालेगांव विस्फोट के मुख्य आरोपी कर्नल पुरोहित ने पूछताछ के दौरान कुमार का नाम लिया. इसके बाद अजमेर मामले में राजस्थान एटीएस द्वारा दाखिल किये गए आरेपपत्र में भी उनका नाम आया.

आरएसएस के सूत्रों का कहना है कि संगठन इतने वर्षों के दौरान कुमार द्वारा हासिल किये गए कद को लेकर खुश नहीं था और हो सकता है कि इसी वजह से वो एमआरएम को उनके नियंत्रण से मुक्त करना चाहता था. हालांकि निकट भविष्य में ऐसा करना संभव नहीं प्रतीत होता क्योंकि अभी भी संघ के एक बड़े खेमे में उनका जबर्दस्त प्रभाव है और वास्तव में संगठन तो एमआरएम के माध्यम से उनके द्वारा किये जा रहे काम को लेकर काफी खुश और प्रभावित था.

अगर कोई एक चीज जो इस वर्ष के इफ्तार के चलते सामने आ पाई है तो वह यह है कि कुमार, एमआरएम और आरएसएस के बीच के संबंध बदल रहे हैं.

First published: 9 July 2016, 7:40 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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