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संघ अधिवेशन: 'सांस्कृतिक विस्तार' के बाद 'राजनीतिक विस्तार' पर ध्यान

पाणिनि आनंद | Updated on: 14 March 2016, 0:12 IST

राजस्थान के नागौर में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में जिस एक बात पर केंद्रीय भाव से चर्चा हो रही है, वो संघ के विस्तार और प्रभाव को लेकर है. इसके तहत संघ अपने विस्तार और वर्चस्व से जुड़े तमाम पहलुओं पर चर्चा कर रहा है और इस दिशा में कुछ अहम प्रस्ताव आ रहे हैं.

नागौर में 11-13 मार्च के दौरान संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का आयोजन चल रहा है. इसमें हिस्सा लेने के लिए संघ के राष्ट्रीय और राज्यों के प्रमुख पदाधिकारियों के अलावा संघ के अनुषंगिक संगठनों के प्रतिनिधि और केंद्र व राज्य सरकारों के अहम लोग भी हिस्सा ले रहे हैं.

पढ़ें: अब संघ के स्वंयसेवक खाकी हाफ पैंट के बजाए भूरे फुल पैंट में नजर आएंगे

संघ में रणनीति और निर्णय की दृष्टि से प्रतिनिधि सभा का खासा महत्व होता है. यह ऐसा अवसर है जब संघ अपने साल भर के कामकाज की समीक्षा भी करता है और अगले कार्यक्रम की रूपरेखा भी तय करता है. साथ ही कई तात्कालिक और लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों, सवालों पर संघ अपनी रणनीति भी इस बैठक के दौरान तय करता है.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सरकार के लिए एक मार्गदर्शक के तौर पर भी काम करना चाहता है

इनमें देश और समाज के बीच अपनी संख्या के विस्तार से लेकर राजनीतिक और वैचारिक वर्चस्व को भी आगे ले जाने से संबंधित विषयों पर चर्चा हो रही है. इस समय कई राज्यों में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकारें हैं और केंद्र में भी पार्टी सत्ता में है. ऐसे में यह संघ के लिए एक अनुकूल परिस्थिति है और वो इस स्थिति का पूरा लाभ लेना चाहता है.

विस्तार और लोकप्रियता

संघ अपनी स्थापना के 10वें दशक में प्रवेश कर चुका है. सत्ता और माहौल को अनुकूल पाते हुए संघ के एजेंडे में संख्या और प्रभाव का बढ़ना बहुत अहम है. संघ की शाखाओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों के दौरान बढ़ी हैं. नई पीढ़ी को अपने से जो़ड़ने के लिए गणवेश में बदलाव किए जा रहे हैं. अब स्वंयसेवक अब खाकी हाफ पैंट के बजाए भूरी फुल पैंट पहनेंगे.

दरअसल, इससे युवाओं में हाफ पैंट के प्रति एक संकोच और असहजता की बाधा को खत्म करके उन्हें संघ के करीब लाने की कोशिश की जा रही है. संघ के लोग किसी फौजी या सिपाही जैसे न दिखकर आम नागरिकों जैसे दिखें, इसके लिए गणवेश को और सहज बनाना ज़रूरी है.

संघ फिलहाल राज्यों में चुनाव के सवाल पर बहुत समय नहीं लगाना चाहता

संघ के ड्रेसकोड में हुए इस बदलाव की जानकारी देते हुए सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने बताया कि 'हमारा संगठन वक़्त के साथ बदलता रहता है, हम कोई जड़तावादी संस्था नहीं हैं. हमारी पहचान केवल खाकी हाफ पैंट से ही नहीं है, बल्कि अन्य कई चीजें भी हैं, जो हमारी पहचान में शामिल हैं. जब हम नए रंग का उपयोग करना शुरू कर देंगे, तो लोगों को धीरे-धीरे इसकी भी आदत हो जाएगी'.

इसके अलावा शनिवार को जो अहम प्रस्ताव प्रतिनिधि सभा में पारित हुए उनमें से एक स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर है. इस तरह संघ लोगों के बीच यह संदेश तो देना ही चाहता है कि वो जनहित के अनुकूल सोच और प्रयास कर रहा है, वहीं साथ साथ सरकार को निर्णय लेने के लिए संघ अपने ढंग से खाका बनाकर सामने रखना चाहता है.

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इस तरह संघ सरकार के लिए एक मार्गदर्शक के तौर पर भी काम करना चाहता है. संघ के लिए सरकार की छवि से ज्यादा अहम उनकी अपनी छवि है और उनका एजेंडा सरकार की तरह न होकर दीर्घकालिक विषयों पर आधारित है. शिक्षा और स्वास्थ्य पर दो बड़े प्रस्ताव विचारधारात्मक दखल और सरकार के भावी कार्यक्रमों की गंगोत्री के तौर पर देखे जाएंगे.

शिक्षा, संस्कृति और संचार

राष्ट्रवाद पर आधारित शिक्षा, भारत में हिंदू अनुकूल इतिहासबोध, संस्कृत और धार्मिकता के साथ विज्ञान और तकनीक को एकसाथ पढ़ाया जाना जैसे कई बिंदुओं पर संघ लगातार काम करता रहा है. इस बैठक में भी इन तीनों विषयों पर चर्चा की जा रही है और इसपर व्यापक रूपरेखा बनाने का प्रयास हो रहा है.

संघ जेएनयू के मसले को फिलहाल ठंडे बस्ते में नहीं डालना चाहता

संघ के नेतृत्व के पास अभी ये विषय प्राथमिकता के तौर पर हैं. देश के बौद्धिक जगत से लेकर साहित्य और संचार माध्यमों तक अपने अनुकूल लोगों को लाना, उन्हें स्थापित करना और अपनी पहचान बनाना संघ की रणनीति का हिस्सा है.

शनिवार को संघ द्वारा पारित प्रस्ताव में एक अहम प्रस्ताव शिक्षा पर रहा. इस प्रस्ताव में कहा गया है, “अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का यह मानना है कि प्रत्येक बालक-बालिका को मूल्यपरक, राष्ट्र भाव से युक्त, रोजगारोन्मुख तथा कौशल आधारित शिक्षा समान अवसर के परिवेष में प्राप्त होनी चाहिए. राजकीय व निजी विद्यालयों के शिक्षकों का स्तर सुधारने हेतु शिक्षकों को यथोचित प्रशिक्षण, समुचित वेतन तथा उनकी कर्त्तव्यपरायणता दृढ़ करना भी अति आवश्यक है".

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प्रस्ताव आगे कहता है, "परम्परा से अपने देश में सामान्य व्यक्ति को सस्ती व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में समाज ने महती भूमिका निभाई है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी सभी धार्मिक-सामाजिक संगठनों, उद्योग समूहों, शिक्षाविदों व प्रमुख व्यक्तियों को अपना दायित्व समझकर इस दिशा में आगे आना चाहिए.”

राष्ट्रद्रोह एवं अन्य विषय

प्रतिनिधि सभा में संघ फिलहाल राज्यों में चुनाव के सवाल पर बहुत समय नहीं लगाना चाहता. जिस एक राज्य को लेकर ध्यान है वो है असम. लेकिन अगले वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र कुछ अहम रणनीतिक तैयारियों का खाका इस बैठक के दौरान बन रहा है. रोहित वेमुला के मसले पर और जाट आरक्षण के सवाल पर भी जो नुकसान संघ या अन्य संगठनों को हुआ है, उसपर भी विचार विमर्श किया जाना है.

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संघ जेएनयू के मसले को फिलहाल ठंडे बस्ते में नहीं डालना चाहता. इस पूरे मामले पर संघ ने अहम भूमिका निभाई है और उन्हें अब इसकी समीक्षा के साथ साथ आगे की रणनीति भी तैयार करनी है. जेएनयू का मसला अगले साल तक नहीं खींचा जा सकता. लेकिन अगले साल के लिए एक माहौल बनाने में इस मुद्दे की भूमिका और असर कितना होगा, इसपर चर्चा की जा रही है.

साथ ही संघ और यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी में लोगों के दायित्वों में आपेक्षित बदलाव के लिए भी इस बैठक के दौरान निर्णय लिए जा सकते हैं. माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी में संगठन मंत्री रामलाल को अब कोई ज़िम्मेदारी दी जा सकती है और उनकी जगह पर किसी और को यह दायित्व दिया जा सकता है. इस दिशा में के सतीश और शिव प्रकाश जी का नाम चल रहा है.

First published: 14 March 2016, 0:12 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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