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स्कूल बढ़े, पढ़ाई का स्तर गिरा

श्रिया मोहन | Updated on: 1 April 2016, 12:32 IST
QUICK PILL
  • भारत में शिक्षा के अधिकार का कानून बने हुए छह साल हो चुके हैं. विशेषज्ञों की माने तो इस दौरान भले ही स्कूलों की संख्या में इजाफा हुआ तो लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आई है.
  • वहीं पिछले साल के मुकाबले इस साल निजी स्कूलों में जाने वाले छात्रों की संख्या 18 फीसदी से बढ़कर 35 फीसदी हो गई.

क्या आप किसी पांचवीं पास वैसे व्यक्ति को जानते हैं जो दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ सकता? ऐसे कई आंकड़े प्रथम की सालाना रिपोर्ट में सामने आए हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था है. रिपोर्ट बताती है कि राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है. 

डॉ. माधव चौहान प्रथम के को-फाउंडर और प्रेसिडेंट हैं जो भारत में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली सबसे प्रतिष्ठित एनजीओ है. कैच ने शिक्षा के अधिकार के छह साल पूरे होने पर चौहान से शिक्षा की स्थिति को लेकर बातचीत की.

आप भारत के शिक्षा क्षेत्र में पिछले कई सालों से सुधार की कोशिश करते रहे हैं. छह सालों में शिक्षा के अधिकार से क्या कुछ बदला है?

यह कहना बेहद मुश्किल है. सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर को छोड़ दे तो स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है. इसके साथ ही स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. लेकिन इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में जाने वाले छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई है. 

पिछले साल के मुकाबले निजी स्कूलों में जाने वाले छात्रों की संख्या 18 फीसदी से बढ़कर 35 फीसदी हो गई है. शिक्षा के अधिकार का बहुत अधिक असर नहीं हो रहा है.

प्रथम एएसईआर का सर्वेक्षण हमें लगातार बता रहा है कि पांचवीं ग्रेड रखने वाली आधी आबादी दूसरी ग्रेड की किताबें भी नहीं पढ़ पा रही हैं. हमारी शिक्षा व्यवस्था में कहां खामी रह गई है?

कई चीजें गलत हो रही हैं. हम वैसी बुनियाद नहीं रख पा रहे हैं जैसा कि होना चाहिए. हमें इस बात पर ध्यान रखना होगा कि हम बच्चों को क्या पढ़ाना चाहते हैं. शिक्षा पढ़ाई, लिखाई और बुनियादी समझ के बिना अधूरी है. यह सब कुछ नहीं किया जाता है. इसका खामियाजा बच्चों को बाद में भुगतना पड़ता है. ऐसा भी नहीं है कि निजी स्कूल बेहतर कर रहे हैं.

कई चीजें गलत हो रही हैं. मसलन हमारा पाठ्यक्रम बच्चों की क्षमता के मुकाबले ज्यादा भारी है. शिक्षा के अधिकार में एक और बात है कि इसके तहत शिक्षकों को समय के भीतर सिलेबस पूरा करना होता है. इसलिए शिक्षक  भी बच्चों की समझ की परवाह किए बिना लगातार पढ़ाते चले जाते हैं.

 शिक्षा के अधिकार की दूसरी बड़ी खामी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी होना है. हालांकि यह अच्छी बात है. लेकिन कुछ इलाकों में स्कूलों की संख्या बेवजह बढ़ाई गई है.

महाराष्ट्र में ऐसे हजारों स्कूल हैं जहां 20 या 10 से भी कम बच्चे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि हर ग्रेड में दो से चार छात्र पढ़ाई कर रहे हैं.

इसकी वजह से मल्टी ग्रेड टीचिंग हो रही है. इसलिए तीसरी और पांचवीं ग्रेड को साथ पढ़ाया जा रहा है. इससे बच्चों के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा हो रही है.

आप राजस्थान जैसे राज्य के बारे में क्या सोचते हैं जहां छात्रों को फेल किए जाने को लेकर कानून में संशोधन का विचार किया जा रहा है?

अगर बच्चे हर ग्रेड में बेसिक सीख रहे हैं तो उन्हें अगले ग्रेड में प्रोमोट करने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन अगर आपका मकसद सिर्फ सिलेबस को पूरा करना है तो फिर इस बात से कोई मतलब नहीं पड़ता कि बच्चा किस ग्रेड में पढ़ाई कर रहा है.

लेकिन आप कह सकते हैं कि बच्चे को हर ग्रेड में सिलेबस की जरूरत नहीं बल्कि पहले और तीसरे ग्रेड के बीच बच्चे को कुछ बेसिक बताया जाए.

अगर आप आयु आधारित ग्रेड हटाते हैं और इसके बदले में बच्चों को बेसिक पढ़ाए जाने पर ध्यान देते हैं तो बच्चे बेहतर सीख पाएंगे.

क्या आप यह कह रहे हैं कि आजकल पढ़ाई में गुणवत्ता का अभाव है? क्या शिक्षक पढ़ाने के लिए खुद को अपडेट रखने में सफल नहीं हो पा रहे हैं?

मान लीजिए मैं आपको चार लेन की सड़क पर ड्राइव करना सिखा रहा हूं और फिर मैं आपको गांव की उबड़ खाबड़ सड़क पर कार चलाने को दे देता हूं. क्या आप चला पाएंगे?

ऐसा इसलिए नहीं कि आप खराब चलाते हैं या फिर आपके प्रशिक्षण में खामी है. दरअसरल आपको मिली स्थिति खराब है.

आप क्लास में वैसे शिक्षक को सिलेबस पढ़ाने के लिए भेज रहे हैं जो यह मानकर चल रहा है कि बच्चे को पिछली ग्रेड में सब कुछ पता है.  फिर इसके बाद उसी शिक्षक को कई ग्रेड में कई सिलेबस पढ़ाना होता है. ऐसे में आप शिक्षक से क्या उम्मीद कर सकते हैं?

जिस तरह से क्लास रुम चलाया जा रहा है वह अपने आप में गलत है. शिक्षक बस क्लास रुम में बच्चों को पढ़ा रहा है.

First published: 1 April 2016, 12:32 IST
 
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