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अकाली-बीजेपी गठबंधन दोनों की मजबूरी है

राजीव खन्ना | Updated on: 9 February 2016, 22:23 IST
QUICK PILL
  • कई मतभेदों के बीच पंजाब विधानसभा में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन जारी रहेगा. बीजेपी के एक धड़े का मानना है कि पंजाब में पार्टी अपने बूते पर चुनाव लड़ सकती है.
  • हालांकि पार्टी नेतृत्व गठबंधन को तोड़े जाने के पक्ष में नहीं है. अगले कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी की रणनीति ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की है.

विधानसभा चुनाव के पहले शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी गठबंधन के बीच मतभेद उभरने शुरू हो गए हैं. बीजेपी के एक धड़े का मानना है कि पार्टी को अकाली दल के साये से बाहर निकलते हुए अपने बूते पर राज्य में चुनाव लड़ना चाहिए. हालांकि इसके बावजूद राज्य में बीजेपी-अकाली गठबंधन बने रहने की संभावना है.

बीजेपी का कमजोर संगठन और पार्टी के भीतर चल रही उठापटक को देखते हुए इस बात की संभावना नहीं के बराबर है कि पार्टी राज्य में अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी. इस बीच बीजेपी की नजर इस बात पर है कि कैसे अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा जाए. विश्लेषकों की माने तो राज्य में अब दोनों दलों के लिए गठबंधन को तोड़े जाने को लेकर काफी देर हो चुकी है. राज्य में अगले कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं.

विश्लेषकों की माने तो पंजाब में अब दोनों दलों के लिए गठबंधन को तोड़े जाने को लेकर काफी देर हो चुकी है

गठबंधन में जारी मतभेदों के बीच बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के प्रेसिडेंट अमित शाह और अरुण जेटली से मुलाकात कर उन्हें राज्य की जमीनी स्थिति के बारे में जानकारी दी है. सूत्रों ने कहा कि पार्टी के नेताओं को लग रहा था कि उन्हें दिल्ली इसलिए बुलाया गया है ताकि पंजाब बीजेपी के प्रेसिडेंट के चुनाव के बारे में चर्चा की जा सके. हालांकि उन्हें उस वक्त आश्चर्य का सामना करना पड़ा जब पार्टी ने उनसे पंजाब की जमीनी स्थिति और सत्ता विरोधी लहर के बारे में बातचीत की.

पार्टी नेतृत्व गठबंधन को लेकर जारी अटकलों को दूर करने की कोशिश में लगा हुआ है और उसने बैठक के बारे में कुछ भी कहने से मना कर दिया है. पंजाब बीजेपी के महासचिव तरुण चुग ने कहा, 'पार्टी नेतृत्व ने बता दिया है कि उन्हें क्या करना है. इस मामले में सिर्फ अमित शाह ही फैसला लेंगे.' अमित शाह भी पंजाब के उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल से मिलकर गठबंधन को जारी रखने के फैसले के बारे में बताएंगे.

पिछले एक महीने के दौरान दोनों दलो के बीच मतभेद उभर कर सामने आए हैं. बीजेपी की तरण तारण यूनिट ने अकाली उम्मीदवार रविंदर सिंह ब्रह्मपुरा को समर्थन नहीं देने का फैसला किया. 

बीजेपी के जिला प्रेसिडेंट नवरीत शफीपुर ने कथित तौर पर कहा था कि न केवल बीजेपी के कार्यकर्ता अकाली दल के उम्मीदवार का विरोध करेंगे बल्कि वह अकाली नेतृत्व का भी पर्दाफाश करेंगे. उन्होंने कहा कि बीजेपी के पास मजबूत पार्टी का संगठन है और वह उप चुनाव में अच्छा दखल देगी. 

हाल ही में गणतंत्र दिवस परेड में सिक्ख रेजिमेंट के शामिल नहीं होने की वजह से दोनों दलों के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी. मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर इस मामले का विरोध किया था. उन्होंने इसे दुखद और अफसोसजनक फैसला करार दिया था.

बादल ने कहा कि सिक्ख रेजिमेंट को परेड में शामिल नहीं किए जाने का फैसला कभी भी अफसोसजनक रहेगा लेकिन इस बारे फ्रांसीसी राष्ट्रपति के परेड में शामिल होने की वजह से सिक्ख रेजिमेंट को परेड में शामिल नहीं किया जाना ज्यादा दुखद है क्योंकि फ्रांस में सिक्खों को कई तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ रहा है.

अकाली दल ने हाल ही में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू के उस बयान पर गहरी आपत्ति जताई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि पंजाब के अशांत राज्य का दर्जा नहीं हटाया जाएगा. अकाली दल की आपत्ति के बाद गृह मंत्रालय ने इस मामले में सफाई देते हुए कहा कि पंजाब अशांत राज्य नहीं है और रिजिजू के बयान को मीडिया में तोड़ मरोड़कर पेश किया गया.

बीजेपी का नेतृत्व सभी जिलों में ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहता है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कैच न्यूज को बताया, 'बीजेपी और जनसंघ का अकालियों के साथ 60 के दशक से गठबंधन रहा है. तब से लेकर अभी तक दो बार ऐसे मौके आए जब दोनों दलों ने साथ चुनाव नहीं लड़ा.

1970 और 1992 में बीजेपी और अकाली ने साथ-साथ चुनाव नहीं लड़ा था. पहली बार दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर समझौता नहीं हो पाया जबकि दूसरी बार बीजेपी ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ा. यह इसलिए किया गया था ताकि यह संदेश दिया जा सके कि आतंकवाद के बावजूद पंजाब में लोकतंत्र जारी है. अब हमारे कार्यकर्ताओं का जाल पूरे राज्य में है तो हमें उसी अनुपात में सम्मान मिलना चाहिए.'

चार मौकों पर बीजेपी को 117 सीटों वाली विधानसभा में 23 सीटें दी गईं. 2007 में पार्टी 23 में से 19 सीटें जीती

उन्होंने कहा, 'बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वजह से ही अकाली दल अब राष्ट्रवाद के बारे में बात कर रहा है. आप उनके नेताओं के तब और आज के बयानों की तुलना कर सकते हैं. हमारा विरोध इस बात को लेकर है कि हमें सीमाई इलाकों में लड़ने के लिए सीट क्यों दी गईं. हमें मालवा क्षेत्र में बेहतर प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया गया. ऐसे कई मौके आए जब अकाली अपनी सीट नहीं जीत पाए.'

चार मौकों पर बीजेपी को 117 सीटों वाली विधानसभा में 23 सीटें दी गईं. हमने 2007 में 23 में से 19 सीटें जीतीं. बीजेपी नेताओं का मानना है कि केंद्र में उनकी सरकार है और वह राज्य की विभिन्न योजनाओं के लिए पैसे दे रही है तो ऐसे में पार्टी को लोगों के बीच इस मुद्दे को भुनाना चाहिए.

पार्टी के एक धड़े का मानना है कि पार्टी को जल्द ही नए प्रेसिडेंट का चुनाव करना चाहिए. सूत्रों ने कहा, 'पार्टी फिलहाल कहीं से भी चुनावी मूड में नजर नहीं आ रही है. राज्य नेतृत्व का दावा है अभी तक उससे 23 लाख लोग बतौर सदस्य जुड़ चुके हैं लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बिलकुल अलग हैं. हमारे पास अकेले चुनाव लड़ने की ताकत नहीं है. इसके अलावा इस बारे में फैसला लेने में अब बहुत देर हो चुकी है.'

कमल शर्मा को पार्टी के भीतर ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनका कथित तौर पर ड्रग्स तस्करी और घूसखोरी मामले में सामने आ चुका है. दूसरे धड़े के एक नेता ने कहा, 'हम किस मुंह से वोट मांगेगे जब राज्य के विधानसभा चुनाव के मद्देजनर ड्रग्स तस्करी एक बड़ा मुद्दा है.' 

First published: 9 February 2016, 22:23 IST
 
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