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पंजाब चुनाव: हर तरफ भगवा... सफेद और लाल रंग कहां गए?

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 14 February 2017, 7:47 IST

इन दिनों वामपंथी पार्टियों के अलावा सभी पार्टियां भगवा रंग में नजर आ रही हैं. लगता है जैसे ये पार्टियां अपने लोगों और चुनाव चिह्नों के परंपरागत रंग और पहचान भूल गई हैं. उनके चुनाव चिह्न ही भगवा नहीं हैं, बल्कि उनका वैचारिक धरातल भी भगवा रंग में ढलता नजर आ रहा है. संकीर्ण संप्रदायवादी नजरिया. 

जिस तरह से तीनों पार्टियां एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए रंग बदल रही हैं, उससे पुष्टि होती है कि यहां कोई भी पार्टी अपने आदर्शों के लिए नहीं है. उन पर सत्ता में आने की मौकापरस्ती हावी है. अरविंद केजरीवाल की आप का नारा है- ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’. यह आरएसएस के ‘राष्ट्रवाद’ के करीब है और भगत सिंह के ‘क्रांतिकारी समाजवाद’ से बिल्कुल मेल नहीं खाता. 

आप नेता भगवंत मान का भगत सिंह स्टाइल में भगवा पगड़ी पहनना, इतिहास से बिलकुल मेल नहीं खाता. भगत सिंह ने अपने जीवन में कभी भगवा या पीली पगड़ी नहीं पहनी. उन्होंने कोर्ट या जेल में ‘रंग दे बसंती चोला...’ गाया जरूर, पर कभी पीली या भगवा पगड़ी या टोपी नहीं पहनी. इस तरह के पहनावे की सभी तस्वीरें उनकी शख्सियत और विचारधारा को तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं. 

भगत सिंह की जो असली तस्वीरें हैं, उन चारों में वे सफेद पगड़ी और खादी का कुर्ता-पायजामा पहने हुए हैं, जो उस समय केवल कांग्रेसियों की ही नहीं, सभी स्वतंत्रता सेनानियों की पोशाक थी.

वामपंथियों का सुनहरा दौर

1951-52 तक पेप्सू (पटियाला और ईस्ट पंजाब स्टेट्स) चुनावों में विधानसभा में वामपंथियों की काफी अच्छी उपस्थिति थी. 60 विधायकों में 5 इसके थे. 1954 के चुनावों में भी यही स्थिति थी. अगले चुनाव से पहले पेप्सू 31 अक्टूबर 1956 में पंजाब में मिल गया था. उस समय चुनावी मैदान में सीपीआई के अलावा अन्य वामपंथी पार्टियां लाल कम्यूनिस्ट पार्टी, किसान मजदूर पार्टी और फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सिस्ट) थीं. 

1951-52 के पंजाब चुनावों में 126 सीटों में से वामपंथी पार्टियों को 6 सीटें मिलीं और 1957 में भी पूरी सीटों के साथ इतनी ही. यह पेप्सू के मिलने के बाद हुआ, जब 154 सीटें हो गई थीं. पंजाब विधानसभा के पहले चुनावों में समाजवादी पार्टी को भी अच्छे नतीजे मिले थे और 1957 में भी. 1962 में सीपीआई की सीटें 9 हो गईं और समाजवादी ने भी 4 जीतीं. 

1964 में सीपीआई के विभक्त हो जाने से, उन्होंने 1967 का चुनाव अगल-अलग लड़ा और उनकी संयुक्त ताकत 8 रह गई, जबकि सीपीआई को 5 और सीपीएम को 3 मिली. हरकिशन सिंह सुरजीत ने 1967 में केवल अपनी सीट जीती, सीपीआई के अग्रणी नेता सत्य पाल डांग अमृतसर से जीते और 1967 में पंजाब में पहली गैरकांग्रेसी सरकार में मंत्री बने. 

‘चुनावों के बहिष्कार’ की मांग के साथ नक्सल गुटों के आने से 1967 में सीपीएम भी विभक्त हुई. 1969 के चुनावों में उनकी ताकत महज 6 रह गई. सीपीआई को 4 और सीपीएम को केवल 2 सीटें मिलीं. 1972 के चुनावों में सीपीआई ने 10 सीटें जीतकर शानदार वापसी की, और सीपीएम को 1 मिली. 

सत्य पाल डांग अमृतसर सीट से लगातार तीन बार जीते. 1997 में आपात के बाद के चुनावों में सीपीएम ने 8 सीटें जीतकर पहली बार सीपीआई से बाजी मारी, जबकि सीपीआई को 7 ही मिली, फिर भी उनकी संयुक्त ताकत हमेशा 15 बनी रही. सत्य पाल सिंह ने अपनी सीट चौथी बार भी बरकरार रखी.

वामपंथ की दरकती ज़मीन

इंदिरा गांधी के बाद 1980 में सीपीआई फिर 9 सीटें जीतकर सीपीएम से आगे हो गई और सीपीएम को 5 ही मिलीं. पर उनकी संयुक्त ताकत को बहुत कम नुकसान हुआ, वह हमेशा 14 से 15 रही. इस बार सर्वाधिक लोकप्रिय कम्यूनिस्ट नेता सत्य पाल अपनी सीट नहीं बचा सके. 

पंजाब में राजीव-लोगोंवाल के साए में हुए 1985 के चुनावों में साम्यवादियों को जबर्दस्त हार देने के लिए कांग्रेस पार्टी चुपचाप अकाली दल के साथ हो गई. इस चुनाव में केवल सीपीआई को 1 सीट मिली. यहां तक कि सत्य पाल भी कांग्रेस उम्मीदवार से हार गए. 1992 के चुनाव खालिस्तानी बंदूकों के साए में हुए. अकाली ने कांग्रेस के लिए इस चुनाव का बहिष्कार किया. 

खालिस्तानी आतंकियों के कारण जबर्दस्त हारे वामपंथी इस चुनाव में साधारण वापसी कर सके. सीपीआई को 4 और सीपीएम को 1 सीट मिली. आईपीएफ के अधीन लड़ रही सीपीआएमएल को भी 1 सीट मिली. हालांकि उन्होंने कांग्रेस को नीचा दिखाने के लिए विधायक का चुनाव किया. एक सीट यूसीपीआई ने जीती, जो कांग्रेस के बराबर थी. 

बहुजन समाज पार्टी का 9 सीटें जीतकर इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन रहा, जो यह फिर बनाए नहीं रख सकी. सत्य पाल की पत्नी विमला डांग ने अपने बलबूते पर कांग्रेस से अपनी अमृतसर-पश्चिम की सीट वापस जीती. 1997 के चुनावों में वामपंथी पिछड़ गए, क्योंकि सीपीआई को 2 और सीपीएम को एक भी सीट नहीं मिली. 

1997 में अकाली-भाजपा शानदार जीतीं. भाजपा को अकेले को 18 और अकाली को 75 सीटें मिलीं. 2002 का साल कांग्रेस पार्टी की वापसी का था और सीपीआई को केवल दो सीटें मिलीं. इस समय तक सीपीएम भी सीपीएम और सीपीएम (पंजाब) में विभक्त हो गई, इससे उनके चुनावी भविष्य पर बहुत बुरा असर पड़ा. 

2007 और 2012 के चुनावों में वामपंथी पार्टी अभिशप्त रही. पंजाब विधानसभा में एक भी वामपंथी पार्टी की प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं थी. 2007 में भाजपा का शानदार प्रदर्शन रहा. 23 सीटों से चुनाव लड़ा और 19 जीतीं. उम्मीदवारों के जीतने के अनुपात का शायद यह सबसे ज्यादा प्रतिशत था.

  

मौजूदा हालात

2017 की स्थिति 2012 या इससे पहले के चुनावों से भिन्न है. जिस तरह से उनका ज्यादातर राज्यों में सफाया किया गया है, वामपंथियों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए था. बिहार, यूपी, पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र आदि राज्यों में उनकी सम्मानजनक स्थिति रही है. कुछ जन संगठनों से थोड़ा समर्थन मिलने के बावजूद राज्य विधान सभा में उनकी उपस्थिति नहीं है. 

खासकर 2011 में 34 साल के शासन के बाद जब वे पश्चिम बंगाल में हार गई थीं. 2014 में केंद्र में आरएसएस नियंत्रित मोदी सरकार के सत्ता में आने और उसके बाद की घटनाओं ने उनके संकट को बढ़ाया. राजनीतिक क्षितिज पर आम आदमी पार्टी के उदय से एक और लिबरल शक्ति के आने की उम्मीद हुई, जो कांग्रेस पार्टी की कमी को पूरा कर सके. पर इसमें भी बहुत जल्दी टूटन हुई . 

उसमें अंतर्विरोध और प्रशांत भूषण और डॉ. धर्मवीर गांधी जैसे सांसदों में नैतिकता की कमी से लोगों की उम्मीदें जल्दी ही धूमिल हो गईं. दरअसल जनता पार्टी से भी जल्दी, जो 1977 में महज तीन सालों में विफल हो गई थी. चाहे 1977 का उनका प्रयोग था या हाल का आप का प्रयोग, यह दक्षिणपंथी आरएसएस भाजपा है, जो लिबरल और वामपंथी ताकतों की कीमत पर अपना सामाजिक-राजनीतिक आधार विस्तृत कर रही है. 

मोदी सरकार का आधा कार्यकाल और उनके तानाशाही फैसलों ने लिबरल ताकतों को कंपा दिया है. इस स्थिति में उम्मीद थी कि वामपंथी इसके विरोध का नेतृत्व करेंगे. इससे चुनावी इलाकों में भी उनका प्रतिरोध होता. पर लगता है कि वामपंथी, भारत, खासकर पंजाब में अपने दायित्व पूरे करने में विफल रह रही है. 

चुनावी मैदान में वामपंथी

दो तरह की हैं संसदीय पार्टियां, जो चुनाव में हिस्सा ले रही हैं और कुछ चरमपंथी जन संगठन. ये ‘राज बदलो और समाज बदलो’ का प्रचार कर रही हैं. अपने अभियान में ये ‘नोटा’ बटन का प्रयोग करने का आग्रह कर रही हैं. चुनावों में सीपीआई, सीपीएम और आरएमपीआई (पहले सीपीएम पंजाब) का वामपंथी गठबंधन हिस्सा ले रहा है. 

इस गठबंधन का चौथा साथी सीपीआईएमएल (लिबरेशन) इनसे अलग हो गया और उसने अपने 8 उम्मीदवारों की घोषणा की है. दो वामपंथी ताकतें और हैं. आप बागी सांसद डां. धर्मवीर गांधी के नेतृत्व में अन्य सहित पंजाब फ्रंट, प्रो. मनजीत सिंह के नेतृत्व में डेमोक्रेटिक समाज पार्टी, जो पहले सीपीएम के एक्टिविस्ट थे, अब योगेंद्र यादव की स्वराज इंडिया के साथ हैं. ये आप से लाए हुए हैं.  

इन सभी संगठनों ने कई सीटों पर एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार खड़े किए हैं. वाम मोर्चे के 3 ग्रुपों ने आप या कांग्रेस के लिए 69 सीटों को समर्थन देने की घोषणा की है और 48 सीट से खुद लड़ रहे हैं. सीपीआई 23, सीपीएम 12, आरएमपीआई 13. डॉ. गांधी का पंजाब फ्रंट डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी के कुछ और उम्मीदवारों के साथ 15 सीटों से लड़ रहा है. इन्हें डॉ. गांधी समर्थन दे रहे हैं. सीपीआईएमएल के अन्य ग्रुपों के हिस्से के तौर पर कुछ और उम्मीदवार स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर खड़े हो सकते हैं. दस उम्मीदवारों को सीपीआईएमएल-न्यू डेमोक्रेसी ग्रुप स्पॉन्सर कर रहे हैं. 

नोटा का प्रचार कर रहे संगठन

नोटा के लिए कैंपेन कर रहे संगठन भारती किसान यूनियन (उग्रहन), भारती किसान यूनियन (एकता), नौजवान भारत सभा जैसे किसान संगठन हैं. इन संगठनों की मालवा किसानों के बीच काफी मजबूत स्थिति है. वे आत्महत्या करने वाले किसानों के लिए उग्र आंदोलन के माध्यम से क्षतिपूर्ति और अन्य राहत लेने में सक्षम हैं. 

वे संसदीय व्यवस्था को नहीं मानते फिर भी चुनाव समिति द्वारा दिए नोटा के लिए कैंपेन करके उस व्यवस्था को वैध बना रहे हैं, जिसके लिए वे लड़ने का वादा करते हैं. उग्र आंदोलनों के दौरान उन्हें सीएम या अन्य सरकारी अधिकारी के साथ बात करने में कोई परेशानी नहीं है, पर उन्हें उनकी व्यवस्था में कोई आस्था नहीं है. 

ये उग्र एमएल पार्टियां और संगठन चुनावी व्यवस्था में हिस्सा लेने में बेहद असुरक्षित महसूस करते हैं. उनका मानना है कि यह संस्था इतनी भ्रष्ट हैं कि इससे उनके चुने हुए क्रांतिकारी काडर भ्रष्ट हो जाएंगे. ऐसा पहले हुआ है, जब सीपीआईएमएल विधायक बिहार या पंजाब की सत्तासीन पार्टियों में शामिल हुए थे. 

पर यह विडंबना है कि मार्क्सवादी पार्टी का प्रशिक्षण और उपयोग क्रांतिकारी संगठनों द्वारा इतना कमजोर है कि उन पर विधानसभा/सांसद में भेजने पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद कि एके गोपालन, ज्योतिर्मय वासु, भूपेश गुप्त, इंदरजीत गुप्त, एके रॉय, सत्य पाल डांग जैसे सांसद और विधायकों की मजदूरों और किसानों के मुद्दों को उठाने में ऐतिहासिक भूमिका रही है और वे उनके लिए संसदीय मंच से थोड़ी-बहुत राहत दिलाने में भी सफल हुए हैं. 

यहां तक कि भगत सिंह और उनकी नौजवान भारत सभा भी ब्रिटिश उपनिवेश की केंद्रीय विधानसभा या स्थानीय चुनावों में दीवान चमन लाल जैसे कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए समाजवादी/प्रगतिशीलों का समर्थन करके हस्तक्षेप करते थे. उन्हें लाला लाजपत राय जैसे दक्षिणपंथी कांग्रेसियों की नाराजगी का सामना करना पड़ता था. 

राय कहा करते थे कि ये युवा मुझे ‘भारत का लेनिन’ बनाना चाहते हैं, जो मैं नहीं बनना चाहता.  भगत सिंह के कॉमरेड उनके जीवन काल में और उनके बाद भी पूरे भारतवर्ष में जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे समाजवादियों के संपर्क में रहे. या फिर पंजाब में डॉ. सत्य पाल और सईफुद्दीन किचल्यू जैसे नेताओं के साथ. 

चरमपंथी संगठनों को भारत में ज्यादा जनाधार नहीं मिला, ताकि वे चीन, रूस और क्यूबा की तरह बगावत करके सत्ता की लड़ाई लड़ सकें. इसके अभाव में, समाज के दमित वर्गों के सबसे ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान देने के लिए पूंजीपतियों के नेतृत्व की संसदीय व्यवस्था में हिस्सा लेने के मौके का प्रयोग नहीं करना आत्मघाती साबित हो रहा है. 

सीपीआईएमएल ने अपने पक्ष में एक आइकोनिक दलित गायक बैंत सिंह झब्बर को मंसा जिले में तैयार किया था. उनकी बेटी का सामंतों ने रेप किया और उनके दोनों हाथ काट दिए. अब वे आप में हैं. विडंबना यह है कि जब झब्बर आप में आए, तभी उनके हमलावर भी आप में शामिल हुए. उन्हें एक मंच ही साझा करना पड़ा. बाद में आप ने उनसे मुक्ति पा ली. 

संकट का दौर

पंजाब खालिस्तानी आंदोलन के आंतक के दौर से गुजरा है, खालिस्तानियों और राज्य दोनों से. और अब आए दिन होने वाली किसान आत्महत्याएं, युवाओं में बेरोजगार से नशे के आत्मघाती मार्ग पर उनके जाने से पंजाब हाल में सबसे खराब संकट से गुजर रहा है. आमजन सत्तासीन पार्टियों के भ्रष्टाचार से भी त्रस्त हैं. पहले कांग्रेस से और अब अकाली-भाजपा गठबंधन के भ्रष्टाचार से. 

नोटबंदी या पुलिस अत्याचार या संस्थागत स्थिति, औपनिवेशिक काल से भी बदतर है. हाल ही में पटियाला की एक कोर्ट ने सात उच्च रैंक के पुलिस अधिकारियों को क्षतिपूर्ति के तौर पर कृपाल सिंह को 49 लाख रुपए भुगतान करने का आदेश दिया और कहा कि वे कृपाल सिंह को डाटा इकट्ठा करने से रोकें. कृपाल सिंह मानवाधिकार एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालरा को एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स (इसे एनकाउंटर कहा गया) पर डाटा इक्ट्टा करने में मदद कर रहे थे. 

वे खालरा की पुलिस द्वारा हत्या के मामले को भी देख रहे थे. इसलिए पटियाला पुलिस ने उन्हें रेप के झूठे मामले में फंसाया. बाद में वे छोड़ दिए गए. उन्होंने झूठी गवाही का मुकदमा किया और उन्हें आर्थिक क्षतिपूर्ति दी गई. 

भगत सिंह का अपमान

इन महत्वपूर्ण चुनावों में वामपंथियों को क्या मिलेगा? उनका मानना है कि उनका ‘सांप्रदायिक फासीवाद, और जो अब भी बदतर है, 2019 के चुनावों के बाद भी उसके जारी रहने को रोकना प्राथमिक लक्ष्य है. यदि वे राज्य विधानसभा में अपने में से कुछ को भेजने के लिए प्रभावित नहीं कर पाते हैं तो.’

कोई भी पार्टी, इसमें वामपंथी भी शामिल है, पंजाब या सामान्य तौर पर भारत का वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक नजरिया नहीं पेश कर रही हैं, जो उनके आइकॉनिक हीरो-भगत सिंह और गदर पार्टी पर आधारित हो...क्रांतिकारी समाजवाद का आदर्श. स्थिति और भी दयनीय है. जो पार्टियां भगत सिंह के समय मुखर थीं, उनका हरियाणा आरएसएस मुख्यमंत्री एमएल खट्टर ने अपमान किया. 

वे एक अज्ञात आरएसएस नेता मंगल सेन के नाम पर चंडीगढ़ एयरपोर्ट का नाम करने के पक्ष में थे. उन्होंने पंजाब और हरियाणा सरकार के भगत सिंह नाम देने के शुरुआती फैसले का खंडन किया था. हालांकि भारी विरोध के कारण एयरपोर्ट का नाम मंगल सेन के नाम पर नहीं रखा गया, पर भगतसिंह पर भी नहीं रखा गया. जले पर नमक छिड़ते हुए उन्होंने भगत सिंह के लोकप्रिय आइकॉन का अपमान किया. जल्लीकट्टू के इनकार से तमिल का गौरव बढ़ सकता था, पर भगत सिंह के अपमान से पंजाब का गौरव आहत नहीं हुआ.  

वामपंथ की चुनावी रणनीति में खामियां

वामपंथियों की सबसे बड़ी खामी यह है कि वे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती हैं. उन्हें हर निर्वाचन क्षेत्र में महज कुछ सौ वोट मिलते हैं, जमा सुरक्षा राशि जब्त हो जाती है और मतदाताओं के बीच उपहास के पात्र बन जाते हैं. यदि वे कुछ हजार वोटों के साथ तीन या चार सीट भी पाते हैं, तो भी सम्मानजनक स्थिति बन सकती है. 

पर हर निर्वाचन क्षेत्र में कुछ सौ वोट ही पाना हास्यास्पद ही नहीं है, बल्कि कुछ मामलों में उन पर राजनीतिक मौकापरस्ती का इल्जाम भी लगता है. जब दो नंबर से चुने गए एमएलए का अंतर महज कुछ सौ या उससे कम हो. वामपंथी उम्मीदवारों पर आरोप लगता है कि उन्होंने जीतने वाले उम्मीदवार की मदद कर दी. 

यदि वामपंथी चाहते हैं कि उनकी मौजूदगी महसूस की जाए, तो उन्हें केवल उन 10-12 निर्वाचन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए, जहां उन्हें लगता है कि उनका मजबूत आधार है. अपने सभी काडरों की ऊर्जा को वहीं लगाना चाहिए. जीतने के मकसद से. और विधानसभा में किसान आत्महत्याएं, युवा बेरोजगारी या संस्थागत पुलिस अत्याचार, स्टूडेंड-कर्मचारियों के मुद्दे, औरतों पर अत्याचार आदि जैसे मुद्दों को उठाने के लिए अपनी उपस्थिति महसूस कराने के लिए. 

यदि उन्हें समर्थन देने वाले जन संगठन सडक़ों पर उतर आएं और उनके चुने हुए विधायक विधानसभा के भीतर इन मुद्दों पर लड़ें, तो काफी कुछ हो सकता है. लोगों के मुद्दे संसदीय मंच के भीतर और बाहर दोनों जगह लड़े जाने चाहिए. तभी व्यवस्था में राहत महसूस की जा सकती है, जैसा कि पहले होता था.  

वामपंथी एक होकर लड़ें

हाल के चुनावों में वामपंथी दल 117 में से 70 से ज्यादा सीटों पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. पर उनमें से एक भी सीट जीतना संदिग्ध लग रहा है. इसलिए 2007 और 2012 की तरह हो सकता है कि 2017 की विधानसभा में एक भी वामपंथी प्रतिनिधि ना हो. अब भी समय है, सभी वामपंथी संगठन-चार वामपंथी दल, डॉ, धर्मवीर गांधी, बागी आप सांसद और डेमोक्रेटिक समाज पार्टी सब मिलकर पूरे पंजाब में 15 से ज्यादा सीटें नहीं तय करें और मिलकर मजबूत कैंपेन करें. 

वे नोटा की कैंपेनिंग कर रहे संगठन को भी इस संयुक्त कोशिश में शामिल होने के लिए राजी करें ताकि किसान और युवाओं के मुद्दों पर जोर देने के लिए राज्य विधानसभा में कम से कम पांच सदस्य हो सकें. जहां उनकी पार्टी का प्रोग्राम और पंजाब के भविष्य की कल्पना देने वाला कोई उम्मीदवार नहीं है, वहां उन्हें सार्वजनिक सभाएं करने से कोई नहीं रोकता. 

किसी समय विधानसभा में उनके 15 विधायक हुआ करते थे. उन्हें अपनी खोई हुए जमीन और मजबूती पुन: पाने की शुरुआत करनी चाहिए. उन्हें पिछले एक दशक से जीरो पर रहने की बदकिस्मती को दूर करना है. सभी वामपंथी पार्टियों और संगठनों के प्रोग्राम और मांगें अलग-अलग नहीं हैं, ज्यादातर समान हैं. उन्हें बस अपने अहम और दूसरों पर हावी होने की आदत का त्याग करके अपने लक्ष्यों को गूंथ कर, एक होकर लडऩा है. वास्तविक धरातल पर योजना बनानी है.  

अन्य सीटों पर वे वास्तविक विश्लेषण करें और उसके हिसाब से अपने काडर को सलाह दें. बेशक उनका लक्ष्य अकाली-भाजपा गठबंधन को प्रभावी तरीके से हराना होना चाहिए. पर दो संभाव्य विकल्पों-आप और कांग्रेस का उन्हें शांति से विश्लेषण करना चाहिए. 

अरविंद केजरीवाल की कुछ अनुचित तिकड़मों की वजह से आम आदमी पार्टी को हराने की मंशा वर्तमान स्थितियों में सही राजनीतिक कदम नहीं है. यदि लोग नई पार्टी को आजमाना चाहते हैं, तो आजमाने दें, उन्हें अपने अनुभव से सीखने दें. सभी राजनीतिक दलों से खुद को बचाएं और जन मुद्दों पर व्यापक जोर दें. पंजाब के वामपंथी एक होकर चुनाव लड़ें, तो कुछ नहीं खोएंगे. बेशक जीतेंगे.

First published: 14 February 2017, 7:47 IST
 
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