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समाजवादी पार्टी: चाचा-भतीजा संग्राम और मोहग्रस्त पितामह

अतुल चौरसिया | Updated on: 11 February 2017, 6:43 IST

उत्तर प्रदेश के शीर्ष राजनीतिक परिवार की लड़ाई एक बार फिर से सतह पर आ गई है. लंबे समय से मुलायम सिंह यादव की नाक के नीचे भाई शिवपाल और पुत्र अखिलेश गुत्थमगुत्था हैं. रविवार को अचानक यह लड़ाई सिर के ऊपर चली गई. शिवपाल यादव ने रविवार को मैनपुरी में एक कार्यक्रम के दौरान बेहद भावुक अंदाज में कहा कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं. वह इस्तीफा दे सकते हैं.

शिवपाल यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि पार्टी के नेता जमीनें कब्जाने में लगे हुए हैं. इस पर लोगों की राय है कि ऐसे ज्यादातर तत्वों को तो कथित तौर पर शिवपाल यादव का ही संरक्षण मिला हुआ है. हाल ही में मथुरा के जवाहर बाग में हुए कांड के पीछे भी आरोपियों को शिवपाल यादव का ही संरक्षण होने की बातें सामने आई थीं. तो फिर शिवपाल क्यों निराश हैं?

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दरअसल शिवपाल का दर्द दिनों दिन यादव परिवार के बीच गहराते जा रहे विरासत कब्जाने की होड़ और सत्ता में अधिकतम हिस्सेदारी का है. कहीं न कहीं शिवपाल यादव इस होड़ में खुद को पिछड़ता पा रहे हैं. पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद अखिलेश यादव विरासत की लड़ाई में शिवपाल से काफी आगे निकल गए हैं.

रविवार को शिवपाल द्वारा जाहिर की गई निराशा के बीज पिछले कुछ महीनों के दौरान पैदा हुई परिस्थितियों में छिपे हैं. इस दौरान शिवपाल यादव को एक के बाद एक झटके झेलने पड़े हैं.

अमर सिंह की पार्टी में वापसी ने आंतरिक संबंधों और समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया है

बीते साल नवंबर महीने में पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर मची बंदरबांट में शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव के दो सबसे करीबी साथियों सुनील यादव और आनंद भदौरिया को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. शिवपाल पार्टी के उत्तर प्रदेश चुनावों के प्रभारी हैं.

इसके विरोध में अखिलेश यादव ने सैफई महोत्सव का बहिष्कार कर दिया. मजबूरन दोनों युवा नेताओं को पार्टी में फिर से वापस लेना पड़ा. चाचा-भतीजे की लड़ाई में यह शिवपाल की स्पष्ट हार थी. चीजें आगे बढ़ती रहीं.

आगामी विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे की जिम्मेदारी शिवपाल के कंधे पर है. चर्चा है कि अब तक दिए गए टिकटों में शिवपाल ने जिन लोगों को चुना है उनसे अखिलेश यादव ज्यादा खुश नहीं हैं.

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शिवपाल यादव के लिए एक और बड़ा झटका दो महीने पहले तब लगा जब उनकी पहल पर पार्टी ने माफिया मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकदा दल का विलय करवा दिया. एक बार फिर अखिलेश इस विलय के खिलाफ खड़े हो गए. दो दिनों के भीतर ही विलय रद्द घोषित हो गया. यह एक और बड़ी हार थी शिवपाल यादव की.

अमर सिंह का आगमन

लंबे समय बाद करीब दो महीने पहले अमर सिंह की पार्टी में वापसी ने आंतरिक संबंधों और समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया है. एक आम मान्यता है कि अखिलेश यादव की अपने एक अन्य चाचा राम गोपाल यादव से गाढ़े रिश्ते हैं. इन दोनों को ही अमर सिंह कुछ खास पसंद नहीं रहे हैं. राम गोपाल यादव ने तो एक दौर में अमर सिंह के खिलाफ मुखर होकर बयान भी दिए हैं.

इसके विपरीत शिवपाल के रिश्ते अमर सिंह से हमेशा मधुर रहे हैं. हाल के दिनों में अमर सिंह के पार्टी में आगमन के बाद शिवपाल के साथ उनका उठना-बैठना अचानक से तेज हो गया था. पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि इस जुगलबंदी ने अखिलेश यादव को बेहद असहज कर दिया है, विशेषकर चुनाव नजदीक होने के कारण अखिलेश यादव खुद को असर्ट करने लगे हैं.

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चाचा-भतीजे के बीच जारी गतिरोध का नतीजा रहा कि महीने भर पहले जब अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तब शिवपाल ने उसका बहिष्कार किया.

तात्कालिक गुस्सा

ताजा विवाद में शिवपाल यादव ने अपने गुस्से का इजहार करते हुए कहा- 'अधिकारी उनकी बात ही नहीं सुन रहे हैं. वे ऐसा ही रहा तो इस्तीफा दे देंगे.' शिवपाल के इस गुस्से के पीछे एक दिलचस्प कहानी उभर कर सामने आ रही है. यू तो ज्यादातर महत्वपूर्ण ओहदों पर अधिकारी मुलायम सिंह और शिवपाल के करीबी ही हैं.

जुलाई महीने में चीफ सेक्रेटरी के पद पर दीपक सिंघल की नियुक्ति हुई. उनकी नियुक्ति के पीछे शिवपाल और अमर सिंह का समर्थन बताया जा रहा है. दीपक सिंघल के बारे में कहा जाता था कि वे शिवपाल के बेहद करीबी हैं, लेकिन आज की तारीख में यह बात सही नहीं हैं. खबरें हैं कि चीफ सेक्रेटरी बनते ही सिंघल ने पाला बदल लिया. बापू भवन स्थित सचिवालय में तैनात एक अधिकारी बताते हैं, 'एक साथ कई सत्ता केंद्र होने के कारण अधिकारियों को कामकाज मेें बहुत दिक्कत होती है. सिंघल की जगह कोई भी होता तो यही करता. जब आपको सीधे मुख्यमंत्री को रिपोर्ट करना है तो बाकी लोगों से आदेश क्यों लेंगे.'

अखिलेश यादव ने जिस तत्परता से सिंघल को अपने पाले में खींचा उसने शिवपाल यादव की नाराजगी को बहुत बढ़ा दिया. इसके अलावा सलाहकार के तौर पर अखिलेश यादव ने पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को भी अपने साथ बनाए रखा.

पहाड़ सरीखा परिवार

एक बड़ी समस्या मुलायम सिंह का लगातार फैलता परिवार भी है. मुलायम सिंह इस पूरे कुनबे को एक साथ जोड़े रखना चाहते हैं. जबकि अखिलेश पार्टी पर एकक्षत्र नियंत्रण चाहते हैं.

मुलायम परिवार का लगभग हर बालिग सदस्य किसी न किसी राजनीतिक पद पर है. परिवार के 11 सदस्य सीधे तौर पर चुनावी राजनीति के जरिए सत्ता में हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में नातेदार-रिश्तेदार विभिन्न को-ऑपरेटिव सोसाइटी आदि के अध्यक्ष हैं.

शिवपाल यादव के पुत्र आदित्य यादव भी उत्तर प्रदेश प्रादेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन के अध्यक्ष हैं. माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में शिवपाल उन्हें चुनाव लड़ाना चाहते हैं, लेकिन अखिलेश यादव इसका विरोध कर रहे हैं. बेटे के टिकट में अड़ंगा भी दोनों के बीच टकराव की एक बड़ी वजह बनता जा रहा है.

मुलायम सिंह की दुविधा

शिवपाल के बयान के अगले दिन ही मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के लखनऊ स्थित मुख्यालय में शिवपाल के गुस्से को दूर करने और अखिलेश की बांह मरोड़ने का काम किया. उन्होंने कहा, 'अगर शिवपाल पार्टी से अलग हो गए तो समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी. अखिलेश यादव चापलूसों से घिरे हुए हैं. उन्हें सच्चाई का अंदाजा नहीं है.'

इस बयान ने समस्या को कम करने की बजाय अटकलों को और बढ़ावा दिया. शिवपाल ने सिर्फ इस्तीफे की बात कही थी जबकि मुलायम सिंह यादव पार्टी से ही अलग होने की जानकारी देकर लोगों को चौंका दिया. यही नहीं उन्होंने बताया कि शिवपाल दो बार इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं.

इस बयान के अगले ही दिन शिवपाल यादव मुलायम सिंह से मिलने उनके लखनऊ स्थित आवास पर पहुंचे.

शिवपाल के नाराज होने की सूरत में उनका लंबा-चौड़ा समर्थक वर्ग सपा से छिटक सकता है

मुलायम सिंह की स्थिति भाई और बेटे के मोह में फंसे दुविधाग्रस्त पिता वाली हो गई है. वे छोटे भाई को नाराज भी नहीं करना चाहते और बेटे को अपनी राजनीतिक विरासत भी पूरी तरह सौंप देना चाहते हैं. यह बात शिवपाल यादव अब तक पचा नहीं सके हैं. 2012 में अखिलेश की ताजपोशी का विरोध करने वाले अकेले शिवपाल यादव थे.

शिवपाल ने लंबे समय तक संगठन में काम किया है. मुलायम सिंह के सक्रिय राजनीतिक दौर में शिवपाल उनका दाहिना हाथ बनकर संगठन का काम देखते थे. इस प्रक्रिया में बीते दो दशकों के दौरान उन्होंने अपने समर्थक नेताओं की एक पूरी फौज पार्टी में खड़ी कर ली है. पार्टी में दबे-छिपे यह चर्चा हमेशा चलती रहती है कि शिवपाल यादव किसी भी समय पार्टी के 80 से 100 विधायकों को अपने पाले में खड़ा कर सकते हैं.

शिवपाल के नाराज होने की सूरत में यह लंबा-चौड़ा समर्थक वर्ग सपा से छिटक सकता है. मुलायम सिंह यादव इस चक्कर में भी खुद को शिवपाल के पक्ष में दिखाकर बेटे की नाराजगी मोल ले रहे हैं.

लखनऊ के राजनीतिक गलियारे में मौजूद रहने वालों की मानें तो पार्टी की स्थिति आगामी चुनावों के मद्देनजर फिलहाल डावांडोल है. यह घटना पार्टी में भरोसे की कमी और आगामी चुनाव में हार के अंदेशे को भी दर्शाती है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे पार्टी में भगदड़ मचने की संभावना बढ़ती जाएगी. इस समय भी करीब 20-25 सपा विधायक भाजपा और बसपा के संपर्क में बताए जा रहे हैं. चुनाव से पहले अगर स्थितियां बिगड़ती हैं तो पार्टी छोड़ने वालों की संख्या और बढ़ सकती है.

मुलायम सिंह यादव इस स्थिति को संभालने की कोशिश में भाई की तारीफ और बेटे पर हंटर चलला रहे हैं, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया हालात को और जटिल बना रही है.

First published: 18 August 2016, 8:02 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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