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'राष्ट्र विरोधी' संदीप पांडेय को बीएचयू में पढ़ाने की इजाजत नहीं!

अभिषेक पराशर | Updated on: 6 January 2016, 15:36 IST
QUICK PILL
  • पिछले ढाई साल से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आईआईटी में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढ़ा रहे संदीप पांडेय को \'राष्ट्र विरोधी\' बताते हुए आगे पढ़ाने से मना कर दिया गया है.
  • शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे पांडेय की पहचान एक गांधीवादी विचारक की है और वे प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुके हैं. 

शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे और रमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने  'राष्ट्र विरोधी' बताते हुए विजिटिंग फैकल्टी के पद से हटा दिया है. पांडेय ने बताया कि उन्हें अकादमिक कारणों से नहीं बल्कि 'राष्ट्र विरोधी' गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर फैकल्टी से हटाया गया है. वह पिछले ढाई साल से बीएचयू की आईआईटी फैकल्टी में केमिकल इंजीनियरिंग पढ़ा रहे थे.

पांडेय ने कहा, 'बीएचयू के वाइस चांसलर गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने आईआईटी के डायरेक्टर के ऊपर यह कह कर दबाव बनाया कि मैं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा हूं और सरकार के खिलाफ बातें करता हूं. इसके बाद उन्होंने मुझे हटाने का निर्णय लिया.'

संदीप पांडेय को हालांकि अभी तक फैकल्टी से हटाए जाने का आधिकारिक पत्र नहीं मिला है. इस बारे में पांडेय बताते हैं, 'हम पत्र का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन मैं जिन विषयों को पढ़ाता था वह मुझसे वापस ले लिया गया है. मैं पढ़ा नहीं रहा हूं और मुझे वहां से निकालने का फैसला किया जा चुका है.'

मैं जिन विषयों को पढ़ाता था वह मुझसे वापस ले लिया गया है, फिलहाल मैं पढ़ा नहीं रहा हूं

उन्होंने कहा कि बीएचयू के बोर्ड ऑफ गवर्नर ने 'राष्ट्र विरोधी गतिविधियों' में शामिल रहने की वजह से मुझे फैकल्टी से बाहर निकालने का फैसला किया है, वो मेरी अकादमिक योग्यता के कारण नहीं बल्कि मेरी विचारधारा के आधार पर फैसला ले रहे हैं.

बीएचयू छात्रसंघ से जुड़े रहे और फिलहाल आईआईएमसी में एसोसिएट प्रोफेसर आनंद प्रधान ने पांडेय को बर्खास्त करने के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा, 'पांडेय को हम सभी गांधीवादी विचारक के तौर पर जानते हैं.'

प्रधान के मुताबिक विश्वविद्यालय तो विचारधाराओं के टकराव की जगह होती है और उसे किसी एक विचारधारा से चलाने की कोशिश खतरनाक है. उन्होंने कहा, 'बीएचयू की पहचान विभिन्न विचारों को जगह देने की रही है और ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को उसकी अकादमिक योग्यता की बजाय उसकी विचारधारा के आधार पर विश्वविद्यालय से बाहर किया जाता है तो यह वैचारिक असहिष्णुता का उदाहरण है.'

राजनीति से प्रेरित फैसला

पांडेय बीएचयू के वाइस चांसलर को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में शामिल करने को ही राजनीति से प्रेरित बताते हैं. उन्होंने कहा कि जब बीएचयू आईटी था तब बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में वीसी को शामिल किया जाता था. लेकिन अब यह आईआईटी का दर्जा पा चुका है और इसकी अपनी स्वायत्ता है. ऐसे में बीएचयू के वीसी को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में शामिल किए जाने की कोई अनिवार्यता नहीं है.' पांडेय के मुताबिक वीसी को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में शामिल करने के पीछे शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी का हाथ है.'

जब इस मामले में कैच ने बीएचयू के रजिस्ट्रार ऑफिस से पुष्टि करने की कोशिश की तो मामले को एक जगह से दूसरी जगह तक टाला जाता रहा. पहले तो रजिस्ट्रार ने यह कहते हुए फोन रख दिया कि अभी इस मामले में फैसला नहीं लिया गया है. 

बीएचयू प्रशासन मेरी योग्यता पर सवाल उठाने की क्षमता नहीं रखता इसलिए वह मेरी विचारधारा को निशाना बना रहे हैं: पांडेय

बाद में रजिस्ट्रार ने कहा कि इस संबंध में सही जानकारी संबंधित डिपार्टमेंट से मिल पाएगी. और उन्होंने फिर से फोन काट दिया. बीएचयू आईआईटी ने यह कह कर इस मामले से पल्ला झाड़ लिया कि इस बारे में सिर्फ रजिस्ट्रार ऑफिस ही कोई जानकारी देगा.

देश में वैचारिक असहिष्णुता के मामले तेजी से बढ़े हैं. दक्षिणपंथी संगठन अक्सर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताकर उस पर हमला करते रहे हैं. पांडेय इसे मौजूदा राजनीतिक माहौल का ही नतीजा मानते हैं. उन्होंने कहा, 'बीएचयू प्रशासन मेरी योग्यता पर सवाल उठाने की क्षमता नहीं रखता इसलिए वह मेरी विचारधारा को निशाना बना रहे हैं.'

आनंद प्रधान सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहते हैं, 'देश में हर किसी को अपनी वैचारिकी रखने की संवैधानिक आजादी है. किसी विचारधारा का समर्थक होने में कोई गुनाह नहीं और वैसे भी संदीप पांडेय गांधीवादी विचारक रहे हैं.' गांधी के विचारों से किसी को क्या खतरा हो सकता है?

कुछ दिनों पहले ही नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट (एनएपीएम) की बैठक में भाग लेने के लिए पांडेय दिल्ली आए हुए थे और इसी दौरान उन्होंने केजरीवाल की शिक्षा नीति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था.

सरकार की सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड फॉर एजुकेशन के सलाहकार रह चुके पांडेय ने 2005 में नई दिल्ली से मुल्तान तक भारत-पाकिस्तान शांति यात्रा की अगुवाई की थी. पांडेय आईआईटी बनारस के छात्र रह चुके हैं. 

पांडेय भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं और आरटीआई आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका रही

1992 में उन्होंने आईआईटी कानपुर में पढ़ाना शुरू किया और फिर इसी दौरान आशा ट्रस्ट की स्थापना की. आशा लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण की दिशा में काम करने वाली संस्था है. पांडेय भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार सक्रिय तौर पर आवाज उठाते रहे हैं और आरटीआई आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका रही.

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First published: 6 January 2016, 15:36 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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