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संघ का वास्तविक 'परिवार' आपकी सोच से कहीं ज्यादा बड़ा है

बद्री नारायण | Updated on: 12 November 2015, 16:19 IST
QUICK PILL
  • \r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n कभी-कभी\r\nआरएसएस के गतिविधियां पीएम\r\nनरेंद्र मोदी के एजेंडे के\r\nअनुकूल होती हैं. लेकिन\r\nआरएसएस हिंदुत्व की नई राजनीति\r\nविकसित कर रहा है.
  • आरएसएस\r\nको भी पीएम नरेंद्र मोदी के\r\nउभार से मदद मिली है.\r\nइसलिए मोदी\r\nऔर आरएसएस एक-दूसरे\r\nके पूरक हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 16 महीने के कार्यकाल में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने खुद को सत्ता के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने में कामयाब रहा है. लेकिन मोदी और आरएसएस के बीच क्या समीकरण है? दोनों में आखिरी फैसला कौन लेता है?

विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत को सुनिश्चित करने में आरएसएस की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन मोदी पर संघ का ज्यादा दबाव नहीं है. ये वर्ग बार बार इस बात पर जोर देता है कि गुजरात में मुख्यमंत्री काल में मोदी ने आरएसएस को लगभग निष्प्रभावी बना दिया था.

दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आरएसएस मोदी की लोकप्रियता बढ़ाने में, खासकर जमीनी स्तर पर काफी मदद कर रहा है. मैं भी इस तर्क से सहमत हूं.

लोकसभा चुनावों में आरएसएस के स्वंयसेवकों ने मोदी की प्रोपगैंडा टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था. उन्होंने बूथ स्तर पर कड़ी मेहनत की और चुनाव प्रचार की रणनीति बनाने वालों का ज़मीनी फीडबैक मुहैया कराए. आरएसएस अपनी शाखाओं से बाहर निकल आम लोगों के बीच चुनावी तैयारी में उतर गया था.

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि खुद मोदी भी आरएसएस प्रचारक रहे हैं. उनकी सोच और उनकी विश्व-दृष्टि संघ के अंदर विकसित हुई है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात में अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान वो आरएसएस के खांचे से निकलकर एक बिजनेस फ्रेंडली और टेक्नोलॉजी-प्रेमी प्रशासक के रुप में मशहूर हुए.

कैसे आरएसएस ने खुद को फिर से बदला है?

एक संगठन के तौर पर आरएसएस यथार्थ भी है और मिथक भी. इसके बारे में कोई अंतिम राय देना मुश्किल है. इसका एक कारण ये है कि यह अपने आपको लगातार बदल रहा है और विकसित हो रहा है. वो लगातार अपनी पुरानी छवि को तोड़ कर नई छवि बना लेता है.

मसलन, आरएसएस एक तरफ घोर सांप्रदायिक संगठन की तरह काम करता है और मुसलमानों के प्रति उसका रवैया भी सर्वज्ञात है, तो दूसरी तरफ प्राकृतिक आपदाओं के समय इसके कार्यकर्ता जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों की मदद और बचाव कार्य करते हैं.

आरएसएस से बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों के जुड़ाव के बारे में सभी जानते हैं. इन्हें संयुक्त रूप से संघ परिवार कहा जाता है. लेकिन कम ही लोग ये जानते हैं कि कई छोटे सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संगठन आरएसएस का संदेश फैलाने में लगे हुए है.

सेवा भारती, विद्या भारती, वंदेमातरम, कथा मंडल और वनवासी कल्याण मंडल जैसे संगठन देश के कई राज्यों में सक्रिय हैं और आरएसएस से करीब से जुड़े हैं. हिंदुओं को लुभाने के लिए कई संगठनों का नाम हिंदू देवी-देवताओं पर रखा जाता है.

90 के दशक के बाद आरएसएस के लिए रुपया भी राम जितना ही महत्वपूर्ण हो गया. उसने अपने सादगी का चोला उतार फेंका.

ये संगठन आरएसएस से स्वतंत्र से रूप से काम करते हैं. मसलन, उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में चलने वाले सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल आरएसएस नहीं चलाता. लेकिन इन स्कूलों में बच्चों में आरएसएस की विचारधारा डाली जाती है. इलाहाबाद, लखनऊ और वाराणसी के कई स्कूल और इंटरमीडिएट कॉलेज आरएसएस की विचारधारा से बहुत ज्यादा प्रभावित हैं.

ये संस्थाएं आरएसएस से जुड़े लोग चला रहे हैं और कई शिक्षक भी आरएसएस से जुड़े हैं. ये शिक्षक नियमित तौर पर विभिन्न आयु वर्ग के लिए अलग-अलग तरह की गतिविधियां आयोजित करते हैं. जैसे, बच्चों के लिए कार्यशाला और महिलाओं तथा बुर्जुगों के लिए कथा मंडल और कीर्तन मंडल. इन आयोजनों का उद्देश्य लोगों में हिंदू चेतना पैदा करना और हिंदुत्व का प्रसार करना होता है. इनमें में कुछ कार्यक्रम इतने बड़े स्तर पर होते हैं कि संघ प्रमुख मोहन भागवत भी उनमें शामिल होते हैं.

आरएसएस के बारे में फील्डवर्क करते हुए हम उसके अनाधिकारिक और अघोषित चेहरों को देख कर दंग हो गए. हमें महसूस हुआ कि आरएसएस एक हिमशैल की तरह है जिसका बड़ा हिस्सा पानी के अंदर छिपा होता है और एक छोटा हिस्सा ऊपर दिखाई देता है.

टीवी चैनलों में आरएसएस को लेकर बहस करने वाले राजनीतिक विश्लेषक आरएसएस की वास्तविक ताकत को नहीं समझते हैं. वह आरएसएस की व्याख्या करने के लिए उसकी चुनावी सफलता और सांप्रदायिकता जैसी सतही पहलुओं का उपयोग करते हैं.

दलित मुख्य लक्ष्य हैं

आरएसएस का असली निशाना उत्तर भारत का बड़ा दलित तबका है. लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को मिले दलित वोटों के पीछे आरएसएस द्वारा भाजपा के पक्ष में लंबे समय से की गयी जमीनी लामबंदी है. इसके लिए समरसता या सामाजिक सौहार्द्र कैंपेन चलाए गए. हिन्दू धर्म की सीमाओं के अंदर दलितों अस्मिता पर जोर दिया गया. गांवों, स्कूलों और बगीचों में भी संघ की शाखाएं लगाई गईं. संघ के कार्यकर्ता नियमित तौर पर दलित गांवों में जाकर बताते रहे कि वो हिन्दू समुदाय का अभिन्न अंग हैं.

मैंने अपनी किताब 'फैसीनेटिंग हिन्दुत्वः सैफ्रन पोलिटिक्स एंड दलित मूवमेंट' में दिखाया है कि आरएसएस का उद्देश्य 'मुस्लिम खतरे से हिंदू धर्म को बचाने के युद्ध में' दलितों को पैदल सैनिकों के रूप में प्रयोग करना है. कथित निचली जातियों को लुभाने के लिए बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब जाति आधारित आरक्षण का समर्थन करने लगे हैं जबकि पहले वो इसका विरोध करते थे.

गलतफहमी

आरएसएस के बारे में एक मिथ्या अवधारणा ये है कि इसके कार्यकर्ता बूढ़े, पुरातनपंथी और आज के तकनीकी युग से अनजान हैं. ये अवधारणा सच्चाई से बहुत दूर है. आरएसएस के कार्यकर्ताओं में तकनीकी-प्रेम तेजी से बढ़ा है. उन्होंने सोशल मीडिया पर काफी प्रभाव बना लिया है. अपने विचारों के प्रसार के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा ले रहे हैं.

आरएसएस ज्वाइन करने वाले हर कार्यकर्ता को एक डायरी दी जाती है जिसमें सभी सदस्यों के फोन नंबर होते हैं.

1990 के बाद आरएसएस के लिए राम की तरह ही रुपया भी जरूरी हो गया. संघ ने फंड जुटाने के लिए अपनी काफी ऊर्जा लगाई. इसके लिए दान, गुरुदक्षिणा और अनौपचारिक साधनों का प्रयोग किया गया. इसके प्रभाव आरएसएस में स्पष्ट है और लगता है कि इसने मितव्ययी तरीकों से छुटकारा पा लिया.

कुछ समय पहले तक संघ के कार्यकर्ता साइकिल का इस्तेमाल करते थे और आज वे महंगी एसयूवी और लग्जरी कारों में घूम रहे हैं.

आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार नई तकनीक और परिवहन के आधुनिक साधनों से संघ का कामकाज पहले से सुगम हो गया है. इसलिए आरएसएस को समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि इसने खुद को समय के साथ कैसे बदला है.

कभी-कभी आरएसएस के गतिविधियां नरेंद्र मोदी के एजेंडे के अनुकूल होती हैं. लेकिन आरएसएस हिंदुत्व की नई राजनीति विकसित कर रहा है. एक ऐसी राजनीति जो भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय से स्वतंत्र है.

आरएसएस को भी मोदी के उभार से मदद मिली है. इसलिए मोदी और आरएसएस एक-दूसरे के पूरक हैं.

First published: 12 November 2015, 16:20 IST
 
बद्री नारायण @CatchNews

The writer is a Social Historian and Cultural Anthropologist and currently Professor at the G.B. Pant Social Science Institute, Allahabad.

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