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आम आदमी पार्टी में वो सारी बुराइयां हैं जो दूसरी राजनीतिक पार्टियों में हैं: संतोष हेगड़े

सुहास मुंशी | Updated on: 7 February 2016, 16:56 IST
QUICK PILL
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े 2006 से 2011 तक कर्नाटक के\r\n लोकायुक्त रहे. उनके कार्यकाल में ही बेल्लारी माइंस समेत भ्रष्टाचार के \r\nकई मामले सामने आए थे. लोकायुक्त के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद \r\nवो इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) से जुड़ गए. उस समय आईएसी का नेतृृत्व \r\nसमाजसेवी अन्ना हजारे कर रहे थे.
जब अरविंद केजरीवाल ने नवंबर, 2012 में \r\nराजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की तो वो अपने कुछ साथियों के साथ उससे अलग\r\n हो गए. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के एक साल पूरे \r\nहोने के मौके पर कैच ने संतोष हेगड़े से विशेष बातचीत की. पढ़ें बातचीत के \r\nचुनिंदा अंश:

अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी दोनों का उदय आईएसी के कोख से हुआ था. केजरीवाल के राजनीतिक पार्टी बनाने के फैसले पर आईएसी दो खानों में बंट गई थी. अब उस पार्टी के एक साल सरकार में रहने के बाद आप पूरे मामले को कैसे देखते हैं?


आईएसी का गठन अन्नाजी ने भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए किया था ताकि केंद्र में एक मजबूत लोकपाल का गठन किया जा सके. आईएसी के शुरुआती सदस्यों के ज़हन में दूर तक राजनीति करने का ख़्याल नहीं था.

मैंने कभी नहीं देखा कि कोई सुप्रीम कोर्ट का जज राजनीति में आने के लिए किसी भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का हिस्सा बना हो. मैं भी इसलिए इस आंदोलन से नहीं जुड़ा था.

मुझे अन्नाजी के मक़सद पर भरोसा था. हमें आईएसी के कुछ सदस्यों के राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अनुमान नहीं था. आम आदमी पार्टी के गठन से मुझ समेत आईएसी के कई नेता हैरान हुए थे.

आईएसी से निकलकर एक राजनीतिक पार्टी के बनाने के केवल अन्नाजी खिलाफ नहीं थे. बहुत सारे लोगों का यही ख्याल था.

आईएसी का असल निशाना ही राजनीतिक प्रभुवर्ग था जो ज्यादातर भ्रष्टाचार के केंद्र में होता है. इस लिहाज से आईएसी का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए करना उचित नहीं था.

आम आदमी पार्टी दूसरी राजनीतिक पार्टियों से कितनी अलग है? क्या अरविंद केजरीवाल मुख्यधारा के दूसरे राजनेताओं से अलग हैं? योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के संग जो हुआ वो मुख्यधारा की पार्टियों से किस तरह अलग था?


मुझे नहीं लगता कि कोई फर्क है. आम आदमी पार्टी में वो सारी बुराइयां हैं जो दूसरी राजनीतिक पार्टियों में हैं. मीडिया में खबर आई थी कि आम आदमी पार्टी के एक मंत्री का घूस लेने का स्टिंग ऑपरेशन सामने आया था.

उसके एक अन्य मंत्री पर अपनी बीवी को पीटने का आरोप है. एक अन्य मंत्री पर दूसरे के घर में घुसने और तोड़फोड़ करने का आरोप है. उनके एक एलएलए पर एक नौकरशाह को हड़काने का आरोप है.

थोड़े समय में हुई इन घटनाओं को देखकर तो नहीं लगता कि आम आदमी पार्टी और मुख्यधारा की दूसरी राजनीतिक पार्टियों में कोई फर्क है.

क्या आप को लगता है कि कुछ क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी ने अच्छा काम किया है, मसलन सम-विषम नियम के संग किया गया प्रयोग?


उनके घोषणापत्र में भ्रष्टाचार के लड़ाई की बात कही गई है जो अच्छी बात है. प्रदूषण के खिलाफ उनकी लड़ाई भी काबिले-तारीफ है लेकिन इसपर कुछ पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है. मसलन, उन कार मालिकों का क्या होगा जिनके पास ड्राइवर है, क्या वो उन्हें 15 दिनों की तनख्वाह देंगे?

अरविंद केजरीवाल की भी नरेंद्र मोदी की तरह पूरी पार्टी को एक व्यक्ति के ईर्दगिर्द केंद्रित कर देने के लिए आलोचना हो रही है. आपका इसपर क्या कहना है?


क्या आपको उदार तानाशाह का विचार लोकतंत्र के विचार से बेहतर लगता है?

अरविंद केजरीवाल अक्सर ही खुद को नरेंद्र मोदी के बरक्स प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करते हैं. शायद इसीलिए वो केंद्र सरकार पर लगातार हमले करते रहते हैं. क्या आपको लगता है कि वो पीएम पद के लिए एक बेहतर उम्मीदवार हो सकते हैं?


पहले उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में अपनी काबिलियत साबित करनी होगी.

क्या आपको लगता है कि आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार मुक्त स्वच्छ प्रशासन के अपने एजेंडे से भटक गई है? क्या आपको लगता है कि पार्टी अपनी मौजूदा विचारधारा पर बने रहकर एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन सकती है?


मुझे नहीं लगता है कि अभी ऐसी कोई मुकम्मल तस्वीर उभरी है. लेकिन पार्टी में संभावनाएं हैं.

मोदी और केजरीवाल दोनों में से किसकी सरकार अब तक बेहतर प्रदर्शन किया है?


हमें दोनों को अभी थोड़ा समय देना चाहिए.

First published: 7 February 2016, 16:56 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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