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दांव पर नौनिहाल: छत्तीसगढ़ में कोख में मर गए दौ सौ बच्चे!

शिरीष खरे | Updated on: 13 June 2016, 8:41 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ में बीते पांच महीने के दौरान 27 में 18 जिलों के सरकारी अस्पतालों से मिली सूचना के मुताबिक प्रसव के दौरान बड़ी संख्या में नवजात बच्चों की मौत हुई.
  • नौ जिलों ने अपने यहां के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए. दुर्ग संभाग में प्रसव दौरान सबसे ज्यादा 80 बच्चों की मौत हुई है. बस्तर संभाग में 40 से ज्यादा मौतें.

हर घर में ननजात बच्चे की किलकारी का इंतजार सभी को बेसब्री से रहता है, लेकिन कोख में ही अगर बच्चे दम तोड़ दे तो यह किसी भी परिवार और मां के लिए अंदर तक तोड़ देने वाली घटना सिद्ध होती है.

लेकिन छत्तीसगढ़ में यह हर दिन की सच्चाई है. हर महीने सैकड़ों बच्चे मां कोख में ही दम तोड़ रहे हैं. स्वास्थ्य के मामले में अति पिछड़ा यह आदिवासी बहुल प्रदेश अब इसके भयावह रूप में इस हद तक घिरता जा रहा है कि माओवाद प्रभावित बस्तर संभाग के तीन जिलों में ही बीते पांच महीनों के दौरान 40 से ज्यादा बच्चों की गर्भावस्था में मौत हो गई.

वहीं, प्रदेश के औद्योगिक इलाकों में भी हालात बेकाबू हो गए हैं. सबसे ज्यादा खराब स्थिति दुर्ग संभाग के पांच जिलों में हैं जहां 80 से अधिक बच्चों की मौत हुई है. यह खुलासा प्रदेश में सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली के तहत हर महीने भेजे जाने वाले आंकड़ों में हुआ है.

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प्रशिक्षित स्वास्थ्य विशेषज्ञ और जांच सुविधाओं के अभाव में नौनिहाल जन्म से पहले ही मौत के मुंह में जा रहे हैं

अहम तथ्य यह है कि इसमें राज्य के नौ जिलों के डाटा शामिल नहीं हैं. सेहत के पैमाने पर सबसे पीछे रहने वाले इन नौ जिलों के अधिकारियों ने अभी तक आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं. सभी जिलों के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य प्रबधंन सूचना प्रणाली के तहत हर महीने प्रसव दौरान महिलाओं और उनके बच्चों से जुड़ी सूचनाएं भेजना अनिवार्य होता है. 

मगर बस्तर, सुकमा, बलरामपुर, मुंगेली, गरियाबदं रायगढ़, सरगुजा, जशपुर, सूरजपुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जिलों ने नहीं बताया कि उनके यहां जन्म के पहले ही कितने बच्चों ने दम तोड़ दिया है.

दूसरी तरफ, रायपुर संभाग में एक दर्जन तो बिलासपुर संभाग में बीते पांच महीने के भीतर दो दर्जन से अधिक बच्चों की मौत प्रसव दौरान हुई है. मुख्यमंत्री का गृह जिला राजनांदगांव भी इस समस्या से अछूता नहीं है.

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अकेले राजनांदगांव जिले में जनवरी, 2016 से अब तक प्रसव दौरान 19 बच्चों की मौत हो चुकी है. यही स्थिति आदिवासी बहुल कांकेर जिले की है जहां 17 बच्चे मारे जा चुके हैं.

जांजगीर-चांपा से 11 बच्चों के मौत के आंकड़े प्राप्त हुए हैं. इसके अलावा, आदिवासी बहुल जिले धमतरी, कोरबा, महासमुंद, कोरिया, नारायणपुर, बीजापुर, कोण्डागांव, कवर्धा और बेमेतरा जैसे जिलों में भी मांओं की कोख सुरक्षित नहीं. यहां प्रसव पूर्व की जटिलताएं, प्रशिक्षित स्वास्थ्य विशेषज्ञ और जांच सुविधाओं के अभाव में नौनिहाल जन्म से पहले ही मौत के मुंह में जा रहे हैं.

प्रसव की असुरक्षित दर

महिला व बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि छत्तीसगढ़ में 11 प्रतिशत महिलाओं को ही पूरी गर्भावस्था के समय देखभाल की सुविधाएं मिल पाती हैं. 

जाहिर है यहां ज्यादातर महिलाएं आवश्यक जांच और दवाओं के अलावा पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रही हैं. यही वजह है कि बीते साल सरकारी रिकार्ड में प्रदेश की सौ से ज्यादा महिलाओं ने प्रसव दौरान दम तोड़ दिया.

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इस बारे में छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधान केंद्र के निदेशक डॉ. प्रबीर चटर्जी बताते हैं, "राज्य में जन्म से पहले बच्चों की मौत की मुख्य वजह प्रसव पूर्व देखभाल और गुणवत्तापूर्ण जांच सुविधाओं का अभाव है. कई बार इमरजेंसी के दौरान यातायात असुविधा के अलावा प्रशिक्षित कर्मचारी या उपकरणों का न होना भी जन्म से पहले बच्चों के लिए मौत के कारण बन जाते हैं. यदि समय रहते गर्भ की जटिलताओं जैसे संक्रमण और हाइपरटेंशन जैसे खतरों की पहचान कर ली जाए तो इस प्रकार की आधी मौतों को टाला जा सकता है."

राज्य में मातृ स्वास्थ्य की प्रभारी और स्वास्थ्य विभाग की उप-संचालक डॉ. अल्का गुप्ता का कहना है, "सवाल यह नहीं कि प्रसव दौरान बच्चों की मौत का आंकड़ा इतना अधिक क्यों है. प्रदेश में एक भी बच्चा मरे तो यह गंभीर मामला है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए पहले से ज्यादा सुविधाएं देने के प्रयास हो रहे हैं. पूरे प्रदेश में करीब पचास एफआरयू (प्रथम रेफरल इकाइयां) हैं. यहां सुरक्षित प्रसव के लिए विशेषज्ञ तैनात जा रहे हैं. लेकिन फिलहाल आदिवासी इलाकों में स्थितियां चिंताजनक हैं."

First published: 13 June 2016, 8:41 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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