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जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर का है केवल एक ही 'सरदार'

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 October 2016, 10:42 IST

आजादी के बाद रियासतों में बिखरे भारत को एकजुट करने का मुश्किल काम सफलतापूर्वक करने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्तूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था. उस वक्त यह इलाका ब्रिटिशकालीन भारत के बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था.  

देश की आजादी की लड़ाई में सरदार पटेल का अहम योगदान रहा. 1928 में गुजरात के बारदोली में किसान आंदोलन का सफलतापूर्वक नेतृत्व करने के लिए महात्मा गांधी ने उन्हें सरदार की उपाधि दी. आजाद भारत के वह पहले गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री थे.

आजादी मिलने के बाद रियासतों को संघीय भारत का हिस्सा बनाना आसान नहीं था. देश को एक सूत्र में बांधने के लिए सरदार पटेल को लौह पुरुष की उपाधि भी मिली. जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी. 

जर्मनी के बिस्मार्क से तुलना

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लिखा था, "रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी कि इसे केवल तुम (सरदार पटेल) ही हल कर सकते थे." 

सरदार पटेल ने जिस सूझबूझ और कूटनीति से बिना किसी खून-खराबे के भारत को एक किया, उसकी तुलना जर्मनी के शासक ओटो वान बिस्मार्क से की जाती है, जिसने 1860 में जर्मनी का एकीकरण किया था.

562 रियासतों का एकीकरण

आजादी मिलने के बाद सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री के साथ प्रथम गृह, सूचना और रियासत विभाग के मंत्री भी थे. 562 छोटी-बड़ी रियासतों में फैले भारत को संघीय ढांचे में मिलाकर रियासतों का एकीकरण सरदार पटेल की ऐतिहासिक सफलता थी.

आजादी से पहले ही 5 जुलाई 1947 को एक रियासत विभाग की स्थापना की गई थी. पीवी मेनन के साथ मिलकर सरदार पटेल ने देसी रियसतों को मिलाने का काम शुरू कर दिया था.

नतीजतन केवल तीन रियासतों को छोडकर बाकी सभी रजवाड़ों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. जम्मू एवं कश्मीर, जूनागढ और हैदराबाद के राजाओं को विलय मंजूर नहीं था.

सरदार पटेल और जम्मू-कश्मीर

15 अगस्त 1947 को आजादी के साथ ही बंटवारे का जख्म भी मिला. सांप्रदायिक दंगों की चपेट में फंसे होने के साथ ही देश सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी का सामना कर रहा था. जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया.

हैदराबाद के निजाम ने विलय प्रस्ताव को नकारते हुए आजाद रहने का फैसला किया था. वहीं जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह कोई भी अंतिम फैसला नहीं ले पाए थे.

जम्मू-कश्मीर के राजा हिंदू थे, लेकिन वहां की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी. इसके अलावा जूनागढ़ और हैदराबाद के शासक मुस्लिम थे. जबकि वहां की बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी.

सांप्रदायिक हिंसा के माहौल में इन रियासतों को लेकर कोई भी गलत फैसला देश को नई मुश्किल में डाल सकता था. लिहाजा, सरदार पटेल ने बहुत धैर्य से काम लिया.

जम्मू-कश्मीर के मामले में पाकिस्तान ने उतावलापन दिखाते हुए कबायलियों के भेष में अपनी फौज के जरिए कश्मीर पर हमला कर दिया.

25 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने आखिरकार भारत में विलय का फैसला कर लिया. इसमें कश्मीरियों के बड़े नेता शेख अब्दुल्ला की सहमति भी शामिल थी, जो सरदार पटेल की बहुत बड़ी जीत थी.

सरदार पटेल और जूनागढ़

अब बारी जूनागढ़ की थी, जो चारों तरफ से भारत से घिरा था. 15 अगस्त, 1947 को जब भारत ने विभाजित स्वतंत्रता पायी, उस दिन जूनागढ़ के नवाब मोहब्बत खान बाबी ने खास "गजट" के जरिए घोषित कर दिया कि जूनागढ़ का पाकिस्तान में विलय हो गया है

सरदार पटेल ने जूनागढ़ को तेल-कोयले की सप्लाई, हवाई-डाक संपर्क रोक कर आर्थिक घेरेबंदी कर दी. जूनागढ़ की जनता भी नवाब के खिलाफ विद्रोह पर उतर आई. आखिरकार, 26 अक्टूबर 1947 को जूनागढ़ का नवाब मोहब्बत खान बाबी परिवार समेत पाकिस्तान भाग गया. जूनागढ़ के दीवान शाहनवाज भुट्टो पाकिस्तान के पूर्व पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता थे.

माना जाता है कि शाहनवाज भुट्टो ने ही पाकिस्तान के साथ विलय की साजिश रची थी. 7 नवंबर 1947 को जूनागढ़ को औपचारिक तौर पर भारत में शामिल कर लिया गया. जूनागढ़ के विलय में सरदार पटेल की खास दिलचस्पी छुपी भी नहीं थी क्योंकि यहीं पर प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर था.

12 नवंबर को जब पटेल जूनागढ़ पहुंचे तो उन्होंने सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू कराने का आदेश भी दिया. गांधी जी के निर्देश के बाद सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए सरदार पटेल ने आम लोगों के दान से धन जुटा कर सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया.

सरदार पटेल और हैदराबाद

अब केवल हैदराबाद रियासत बची थी, जो भारत में शामिल नहीं हो पाई थी. हैदराबाद के विलय की योजना में भी सरदार पटेल ने सांप्रदायिक सौहार्द का पूरा ध्यान रखा.

दरअसल 87 फीसदी हिंदू आबादी वाले हैदराबाद का निजाम उस्मान अली खान विलय न करने पर अड़ा था. वहीं उसके उकसावे पर कासिम रिजवी नाम के शख्स ने भाड़े की सेना (रजाकार) बना ली, जो हैदराबाद की जनता पर अत्याचार कर रही थी.

इन हालात में 13 सितंबर 1948 को सरदार पटेल ने भारतीय फौज को हैदराबाद पर चढ़ाई करने का आदेश दे दिया. ऑपरेशन पोलो के तहत भारतीय सेना ने दो ही दिन में हैदराबाद पर कब्जा कर लिया.

हालांकि सरदार पटेल ने इसके बाद कूटनीतिक चालाकी से निजाम को अपने साथ मिला लिया, जिससे देश का सांप्रदायिक माहौल खराब न हो, साथ ही पाकिस्तान का विरोध भी दरकिनार हो जाए.

इस तरह सरदार पटेल ने तीन रियासतों जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद के भारत में विलय का काम बखूबी अंजाम दिया. भारत के इतिहास में सरदार की गिनती उस लौह पुरुष के तौर पर होती है, जिसने जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर को भारत के हाथ से छिनने से बचा लिया.

First published: 31 October 2016, 10:42 IST
 
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