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व्यंग्य: भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा से ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 February 2016, 9:32 IST

भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा सांख्यिकी और देशभक्ति मामलों के विशेषज्ञ हैं. राजनीति इन्होंने राजस्थान में की लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के आंकड़े इनकी जिह्वा पर सरस्वती की मानिंद मौजूद रहते हैं.

बकौल आहूजा, उन्होंने इस विषय में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की है. बचपन से ही उनकी रुचि गणित और संघ की शाखा में हो गई थी. उनका दावा है कि उन्हें उनकी मूंछ में मौजूद बालों की संख्या पता है- 400,000. न एक बाल कम, न एक बाल ज्यादा.

जैसा की अमूमन होता आया है- हमारे देश में प्रतिभाओं की कद्र कम होती है, लोगों को उनका वाजिब हक नहीं मिलता. आहूजा भी उसी नजरअंदाजी के शिकार हैं.

वे इस बात पर संतोष कर लेते हैं कि इस देश ने तो आमर्त्य सेन को भी भारत रत्न, नोबल पुरस्कार मिलने के बाद दिया था. ऐसी उद्भट प्रतिभा से कैच ने बातचीत करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने विषय की गंभीरता को देखते हुए ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत की हामी भरी.

उनके साथ हुई बातचीत के संपूर्ण अंश:

आपके राजनीतिक गुरू कौन हैं?

हमारी राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा सुब्रमण्यम स्वामी की देखरेख में हुई है. बाकियों के लिए वे इंसान होंगे, मेरे लिए तो वे भगवान हैं. मुझे लगता है कि आंकड़ों की बाजीगरी में उनका कोई सानी नहीं हैं.

आप सम हैं या विषम?

सम में हमारी अटूट श्रद्धा है. विषम तो अरविंद केजरीवाल की साजिश है. महीना भर पहले कोई जानता भी था कि विषम क्या होता है. केजरीवाल हमेशा ही हमारे खिलाफ साजिश करता रहता है.

सम ही जीवन है. आप हमारी सांख्यिकी के आंकड़े देख लीजिए आपको पता चल जाएगा सम संख्याओं का प्रभाव. एक भी विषम संख्या नहीं मिलेगी. चाहे 2000 कंडोम हों माफ कीजिएगा निरोध हों या 3000 शराब की बोतलें हों या 500 गर्भनिरोधक सुइयां. कहीं भी आपको विषम नहीं मिलेगा. हम सम पर जीते हैं.

ये 2000 यूज्ड कांडोम माफ कीजिएगा इस्तेमाली निरोध की संख्या हर दिन 2000 ही नियत क्यों रहती है? क्या इस गणना का कोई वैज्ञानिक फार्मूला है?

देखिए ये तो वो देशद्रोही लोग बताएंगे कि हर दिन 2000 निरोध ही क्यों इस्तेमाल करते हैं. लेकिन हमारे पास इसकी गणना करने का ठोस वैज्ञानिक तरीका है. जबसे प्रधानमंत्रीजी ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया है तभी से हमारी नजर जेएनयू पर गड़ गई थी.

स्वच्छता के नाम पर हमने बड़ी संख्या में खुफिया विभाग के अधिकारियों को जेएनयू के जमादारों के रूप में भर्ती किया. उनका काम हर दिन सुबह-सुबह इस्तेमाली निरोध, शराब की बोतलें, गर्भनिरोधक सुइयां, मुर्गे की हड्डिया आदि की अलग-अलग श्रेणियों में संख्या तय करना था. और मैं आपको बता दूं कि हमारे कर्मचारी इतने पारंगत थे कि कभी भी कोई संख्या विषम नहीं होने दी.

यह कैसे तय करते हैं कि हड्डियां मुर्गे की थीं या बकरे की?

डीएनए टेस्ट भाई साब, डीएनए टेस्ट... यह सब तो हमारे लिए बाएं हाथ का खेल था क्योंकि मामला राष्ट्रप्रेम बनाम राष्ट्रद्रोह का था. हमें देशद्रोह के इस किले को ढहाना था.

आईबी को जमादारी के काम में लगाने का विचार कैसे आया?

हाहा... आप ऐसी बातें पूछ रहें जो मुझे बतानी नहीं चाहिए. लेकिन आज इस मुकाम पर जब हमने जेएनयू के देशद्रोह को बेनकाब कर ही दिया है तब यह बात बताने में मुझे कोई हिचक नहीं है. मोदीजी मन ही मन इंदिराजी को पूजते हैं, उनकी इच्छा है कि वो भी एक बार युद्ध लड़ें, बांग्लादेश की तरह कोई नया देश खड़ा करें, देश की दुर्गा न सही, भारत के भीष्म पितामह बन जाएं.

उनकी इच्छा है कि एक बार वे भी आपातकाल का स्वाद चखें. आपातकाल में इंदिराजी ने पूरे देश के देशद्रोहियों के पीछे आईबी लगा रखी थी. मोदीजी क्या जेएनयू के पीछे आईबी नहीं लगा सकते. ये सब राजनीति में करना पड़ता है.

तो क्या आपके आंकड़ों को मोदीजी का भी समर्थन प्राप्त है?

आप मुझे फंसाने की कोशिश कर रहे हैं. यह सब नीति का हिस्सा होता है. पहले यह काम योजना आयोग करता था अब मोदीजी ने नीति आयोग का गठन किया है. लोगों के मन में नीति आयोग के कामकाज को लेकर भ्रम है, उन्हें पता ही नही है कि नीति आयोग क्या करता है.

मैं आज पूरी जिम्मेदारी से आपको बता रहा हूं कि नीति आयोग इन आंकड़ों पर नजर रखता है. ये सारे निष्कर्ष नीति आयोग ने ही बाकायदा ठोक-पीटकर जारी किए हैं. आपको लगता है कि हम सिर्फ आईबी के नाकारा लोगों के भरोसे इतनी बड़ी घोषणा कर देंगे.

आईबी नकारा क्यों?

मेरा मतलब सबसे नहीं है, लेकिन मेरी बात मानिए, ज्यादातर आईबी वाले फेल हैं. इनके भरोसे रहे तो मोदीजी की लुटिया डूब जाएगी. आजतक ये बता ही नहीं पाए कि असल में नारा कौन लगा रहा था.

चार लड़के अभी भी फरार हैं, इन्हें पता ही नहीं ये कहां हैं. वो तो शुक्र हो आप जैसे राष्ट्रवादी मीडिया का जिन्होंने सारी रिकॉर्डिंग कर ली और बात सामने आ गई.

आप तो शर्मिंदा कर रहे हैं, हम लोग तो बस पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे...

ऐसी बात नहीं है भाई साब. हम सबको तो नहीं लेकिन कुछेक लोगों के लिए पद्मश्री और पद्म भूषण की संस्तुति मोदीजी से कर चुके हैं. चौधरी, गोस्वामी, चौरसिया और सरदाना जैसे पत्रकारों ने राष्ट्ररक्षा में खुद को होम कर दिया, उनके प्रति हमारी कुछ तो जिम्मेदारी बनती है. हम भूल नहीं सकते उन्हें. इतिहास गवाह रहेगा जब राष्ट्र पर गंभीर संकट था तब कुछ पत्रकारों ने अपना सर्वोच्च बलिदान किया था.

रवीश कुमार जैसे कुछ पत्रकार बहुत उड़ रहे हैं? लगता है उन्हें आईबी का खौफ ही नहीं रहा.

इनकी अंटी टाइट करने का प्रबंध भी हमने कर दिया है. जल्द ही आपको जमीन पर व्यापक बदलाव दिखने लगेगा. मीडिया में जो इक्का-दुक्का बेसुरे सुनाई दे रहे हैं उन सबको लाकर हम सम पर थिर कर देंगे. मैं देशवासियों को भरोसा देना चाहता हूं जल्द ही पूरे देश में लोगों को सिर्फ मोदीजी की बांसुरी की धुन सुनाई देगी.

सुर और बांसुरी से याद आया. आप नृत्य के बड़े मुरीद है. रुपए हवा में नचाकर लुटाने की आपकी अदा पर इनदिनों सोशल मीडिया फिदा है.

ज़र्रानवाजी है लोगों की. हम तो बस फन के अदने से मुरीद हैं. नृत्य और न्यौछावर दरअसल हमारी खास पहचान है. पारंपरिक रूप से हमारे यहां रुपया हवा में नचाकर नर्तकियों पर लुटाने को शुभ माना जाता है. आप देख लीजिए हमारी तमाम फोटो. यह दरअसल एक कला है, आर्ट है. इसकी तालीम हमें बचपन से दी जाती है.

आज जेएनयू जैसे कुछ संगठन उन कलाओं को मदिरोन्मुखी और निरोधोन्मुखी बनाने पर आमादा हैं. हम यह कत्तई बर्दाश्त नहीं करेंगे. चाहे इसके लिए हमारे शीश कट जाय.

आप से बातचीत कर बहुत अच्छा लगा. एक आखिरी सवाल जाते-जाते. क्या आपके पास नीति आयोग से जारी कुछ और इक्सक्लूजिव आंकड़े हैं?

हां है ना... पर यह मैं ऑफ द रिकॉर्ड बता रहा हूं, क्योंकि ये आंकड़े अभी सदन के पटल पर नहीं रखे गए हैं. आप मेरा नाम मत छापिएगा.

जी बिल्कुल... निश्चिंत रहे यह पूरी बातचीत ऑफ द रिकॉर्ड है...

तो सुनिए, देश में इस समय 1,40,000,000 गैरधर्म के देशद्रेही हैं. दिल्ली शहर में इस समय 200 स्वधर्मी पत्रकार देशद्रोही हैं. 50 मीडिया संस्थान एनजीओ से पैसे लेकर मोदीजी के खिलाफ साजिश में लिप्त हैं.

दुनिया में आधी सदी पहले कुल 201 हिंदुराष्ट्र थे. हमारे सभी आंकड़ों में सिर्फ यही एक विषम संख्या है क्योंकि यह शुभ होती है. असली नंबर 200 था शुभ करने के लिए हमने इसे 201 कर दिया है. केरल में सिर्फ 10 प्रतिशत हिंदू शेष रह गए हैं. सिर्फ 20 साल पहले बाली द्वीप में 100 प्रतिशत हिंदू रहते थे.

बस करें सर ये आंकड़े ज्यादा हो जाएंगे, अभी सदन के पटल पर आए भी नहीं हैं. संसद की अवमानना हो जाएगी. धन्यवाद.

इस तरह ये बातचीत परंपरागत साक्षात्कारों की तरह उत्तर पर न खत्म होकर पत्रकार के सवाल पर समाप्त हुई.

First published: 28 February 2016, 9:32 IST
 
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