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बीफ रखने और खाने को वैध बनाने के हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

अश्विन अघोर | Updated on: 20 August 2016, 7:49 IST

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में बीफ के उपयोग और रखने को वैध करार देने के बाॅम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार कर ली है.

अखिल भारतीय कृषि गौ सेवा संघ ने यह याचिका हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की है. इस साल मई में हाई कोर्ट ने एक आदेश जारी कर कहा था कि लोगों को अपना खान-पान चुनने का अधिकार होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने एक नोटिस जारी कर महाराष्ट्र सरकार से इस याचिका पर एक सप्ताह में जवाब मांगा है, जिसके बाद इस मामले की सुनवाई होगी.

हाई कोर्ट का आदेश

बाॅम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए बहुत सी याचिकाओं पर सुनवाई की और महाराष्ट्र में पालतू जानवरों को मारने पर प्रतिबंध कायम रखा.

हालांकि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि महाराष्ट्र के लोग बीफ खाना चाहें तो खा सकते हैं लेकिन तभी जब इसके लिए पशुवध दूसरे राज्यों में किया गया हो और महाराष्ट्र में मांस का आयात किया गया हो.

हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 1995 के उस प्रावधान में संशोधन किया है, जिसमें बीफ रखने और महाराष्ट्र के बाहर से खरीदने पर प्रतिबंध है. अधिनियम की धारा 5 डी के तहत बीफ- गाय का मांस, बैल का मांस रखने की मनाही है, भले ही पशुवध महाराष्ट्र में हो या किसी और राज्य में.

कोर्ट ने इस प्रावधान को संविधान विरूद्ध माना और जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया. साथ ही कहा कि कानून किसी व्यक्ति को बीफ रखने से रोक नहीं सकता और न ही महाराष्ट्र के बाहर उन जगहों से खरीदने पर जहां यह वैध है.

राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम को फरवरी 2015 में मंजूरी दे दी थी. मूल अधिनियम 1976 में पारित किया गया था, जिसके अनुसार गोकशी पर पाबंदी थी जबकि नए अधिनियम के तहत गौवंश के वध पर प्रतिबंध है और महाराष्ट्र में बीफ रखने और खाने पर गौ वंश की हत्या पर पांच साल की जेल और 10,000 रुपये का जुर्माना है तो बीफ रखने पर एक साल की जेल और 2000 रुपये का जुर्माना.

प्रतिबंध से हुआ नुकसान

बाॅम्बे सबअर्बन बीफ मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष मुहम्मद अली कुरैशी के अनुसार, 'बीफ पर प्रतिबंध से व्यापारियों को सालाना 15 अरब रुपये का नुकसान हुआ है. इसमें बीफ के व्यंजन, चमड़े के व्यापारी और कुरैशी समुदाय के लाखों लोग शामिल हैं, जिनकी रोजी-रोटी ही इन पशुओं के वध पर आधारित है.'

कुरैशी ने बताया मुंबई के देवनार बूचड़खाने से कोलकाता और चेन्नई में चमड़ा-जूता उद्योग को जानवरों की चमड़ी की सप्लाई की जाती थी. प्रतिदिन 450 चमड़ियां यहां से भेजी जाती थी. हर एक की कीमत 1500 रुपये थी.

कुरैशी ने बताया प्रतिबंध के कारण देवनार बूचड़खाने में वार्षिक व्यापार में 24 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. इसके अलावा रोजाना का 30 लाख रुपये का बीफ व्यापार प्रभावित हुआ है. एक ओर देवनार में 450 जानवरों को आधिकारिक तौर पर मारा जाता था तो दूसरी ओर राज्य भर में अवैध रूप से इतने ही पशुओं का वध किया जाता था और प्रतिदिन मुंबई लाया जाता था. कुल मिलाकर 15 अरब रुपये के सालाना व्यापार को नुकसान हुआ है.

First published: 20 August 2016, 7:49 IST
 
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