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धारा 377 मामला: SC में मुकुल रोहतगी ने कहा- अप्राकृतिक नहीं है समलैंगिकता

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 July 2018, 13:41 IST

सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 की सुनवाई जारी है. इस बीच इस मामले में अलग अलग लोगों की तरफ से बयान आने शुरू हो गए हैं. एक ओर सुभ्रमण्यम स्वामी ने समलैंगिगता को हिंदुत्व के खिलाफ बताया है. वहीं LGBT समुदाय के अधिकारों की पैरवी कर रहे रोहतगी का कहना है कि ये कहीं से भी अप्राकृतिक नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिगता को अपराध में लाने वाली धारा 377 पर सुनवाई चल रही है. केंद्र सरकार ने अपील की थी इस मामले की सुनवाई कम से कम 4 हफ़्तों बाद की जाये. सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी के लिए इंकार कर दिया था.

मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ है. पांच जजों की इस पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा चार और जज हैं, जिनमें आरएफ नरीमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा शामिल हैं.

इस केस में सरकार का पक्ष तुषार मेहता रख रहे हैं, वहीं LGBT अधिकारों की पैरवी रोहतगी कर रहे हैं. रोहतगी के समलैंगिगता को अप्राकृतिक मैंने से इंकार करने पर जस्टिस नरीमन ने उनसे पूछा की क्या ये उनका तर्क है? इस सवाल पर रोहतगी ने महाभारत के शिखंडी और अर्धनारीश्वर का भी उदाहरण दिया कि कैसे धारा 377 यौन नैतिकता की गलत तरह से व्याख्या करती है. वहीं तुषार मेहता का कहना है कि केस धारा 377 तक सीमित रहना चाहिए. इसका उत्तराधिकार, शादी और संभोग के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए.

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अप्राकृतिक यौन संबंधों की व्याख्या पर रोहतगी ने कहा- हां. ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के 1860 के नैतिक मूल्यों से प्राकृतिक सेक्स को परिभाषित नहीं किया जा सकता है. प्राचीन भारत की नैतिकता विक्टोरियन नैतिकता से अलग थी.

रोहतगी बोले, ''धारा 377 मानवाधिकारों का हनन करती है. समाज के बदलने के साथ ही नैतिकताएं बदल जाती हैं. हम कह सकते हैं कि 160 साल पुराने नैतिक मूल्य आज के नैतिक मूल्य नहीं होंगे.''धारा 377 'प्राकृतिक' यौन संबंध के बारे में बात करती है. समलैंगिकता भी प्राकृतिक है, यह अप्राकृतिक नहीं है.

इस मामले के पहले कोर्ट ने धारा 377 को बरकरार रखने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का फैसला लिया था. ये फैसला चीफ जस्‍टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने किया था. जस्‍टि‍स मिश्रा ने कहा था, 'हमारे पहले के आदेश पर पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है.'

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अदालत ने यह आदेश आईआईटी के करीब 20 पूर्व और मौजूदा छात्रों, एनजीओ नाज फाउंडेशन और एलजीबीटी राइट एक्टिविस्टों की याचिकाओं पर दिया था. इन याचिकाओं में कहा गया है कि आईपीसी की धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.

गौरतलब है कि इस समय धारा 377 के मुताबिक किसी पुरुष, महिला या जानवर के साथ 'अप्राकृतिक' सेक्स करने पर आजीवन कारावस, 10 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है.

First published: 10 July 2018, 13:30 IST
 
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