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क्यों सुप्रीम कोर्ट को एक लोकतांत्रिक सरकार के अधिकारों में दखल देना पड़ा?

गोविंद पंत राजू | Updated on: 18 December 2015, 12:58 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देश दिए जाने को बावजूद अपनी पसंद के व्यक्ति को लोकायुक्त नियुक्त करने पर अड़ी थी.
  • सरकार की जिद इतनी बड़ी थी कि उसने लोकायुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलते हुए उसमें हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को ही खत्म करने की कोशिश की.
  • हालांकि इस मामले में अब एक नया मोड़ आ गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़ ने राज्यपाल को पत्र लिखकर नए लोकायुक्त वीरेंद्र सिंह के नाम पर आपत्ति जतायी है.

आखिरकार पूरे तीन साल नौ महीने बाद उत्तर प्रदेश को जस्टिस वीरेन्द्र सिंह के रूप में अपना नया लोकायुक्त मिल ही गया. इस फैसले के आने तक राज्य सरकार की जो किरकिरी हुई उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र के नाम पर चुनी जाने वाली हमारी सरकारें अपने मूल चरित्र में कितनी अलोकतांत्रिक हैं.

हालांकि इस मामले में अब एक नया मोड़ आ गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़ ने राज्यपाल को पत्र लिखकर नए लोकायुक्त वीरेंद्र सिंह के नाम पर आपत्ति जतायी है. जस्टिस चंद्रचूड़ के मुताबिक उन्होंने सूची में वीरेंद्र सिंह का नाम शामिल करने पर गहरी आपत्ति जतायी थी इसके बाद भी उन्हें शामिल करके सुप्रीम कोर्ट के पास सूची भेजी गई.

राज्यपाल राम नाइक ने यह पत्र मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य को भेज दिया है.

पूर्व लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल 16 मार्च 2012 में ही पूरा हो गया था. 15 मार्च को ही उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी. इस सरकार ने अपने गठन के बाद पहली कैबीनेट बैठक में पहला फैसला लोकायुक्त मेहरोत्रा के कार्यकाल को दो वर्ष के लिए बढ़ाने का किया.

तब अखिलेश ने अपने फैसले को मायावती सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने कड़े रुख के रूप में प्रचारित किया. यह कहा गया कि चूंकि लोकायुक्त के रूप में एनके मेहरोत्रा ने मायावती सरकार के कई मंत्रियों को बेनकाब किया था और उनको बर्खास्त तक होना पड़ा था, इसलिए उनके द्वारा आगे भी कड़ी कार्रवाई होती रहे, इसी कारण से उनका कार्यकाल बढ़ाया जा रहा है.

शायद इससे बसपा और मायावती के खेमे में घबराहट भी बढ़ी होगी क्योंकि इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की गई वो बसपा खेमे के लोगों की ओर से ही थी.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने नियुक्ति में कोई रुचि नहीं दिखाई

हालांकि प्रारम्भ में यह मामला लोकायुक्त मेहरोत्रा पर तरह-तरह के आरोप से शुरू हुआ था. बसपा उन्हें हटाने की मांग भी की थी. लेकिन बाद में दो अन्य याचिकाएं भी इसके साथ जुड़ गईं और यह पूरा मामला लोकायुक्त की नियुक्ति का हो गया.

इस बीच 15 मार्च 2014 को मेहरोत्रा का बढ़ा हुआ कार्यकाल भी पूरा हो गया था, इसलिए उत्तर प्रदेश में नए लोकायुक्त की नियुक्ति की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी. इसको लेकर एक नई याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में दायर हो गई. इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल 2014 को राज्य सरकार को छह माह में नए लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की. सुप्रीम कोर्ट ने एक नया निर्देश जारी किया.

इस बार दिसम्बर 2014 में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रक्रिया शुरू करने का दिखावा तो किया लेकिन वास्तव में किसी की नियुक्ति फिर भी नहीं की.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना पर राज्यपाल ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की याद दिलाई तो आनन-फानन में पांच फरवरी, 2015 को राज्य सरकार ने एकतरफा ढंग से इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रवीन्द्र सिंह यादव का नाम तय करके हाईकोर्ट के मुख्य जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ के पास सहमति के लिए भेज दिया. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस नाम पर सहमति नहीं दी.

दिसम्बर 2014 में सरकार ने प्रक्रिया शुरू करने का दिखावा तो किया लेकिन वास्तव में नियुक्ति फिर भी नहीं की

इसकी वजह यह थी कि राज्य में लोकायुक्त चयन के लिए मुख्यमंत्री के साथ नेता प्रतिपक्ष और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सहमति भी जरूरी होती है. और बाकी दोनों ने रवीन्द्र सिंह के नाम पर सहमति नहीं दी. लेकिन राज्य सरकार ने मानो पहले से ही यह तय कर रखा था कि वह अपनी मर्जी का ही लोकायुक्त लाएगी.

सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए लोकायुक्त अधिनियम में ही बदलाव कर दिया. अखिलेश सरकार ने लोकायुक्त के चयन में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को खत्म करने के लिए कैबीनेट से बाई सरकुलेशन प्रस्ताव परित करवा लिया.

हालांकि राज्यपाल राम नाइक ने इसे स्वीकार नहीं किया. इस बीच 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए चार सप्ताह में नए लोकायुक्त की नियुक्ति करने का निर्देश दिया. राज्य सरकार ने अगस्त में जस्टिस रवीन्द्र सिंह के नाम का प्रस्ताव कैबिनेट में पारित करवा कर राज्यपाल के पास भेज दिया.

छह अगस्त को एक बार फिर से राज्यपाल ने इसे अस्वीकार कर दिया. 19 अगस्त को राज्य सरकार ने एक बार फिर वही प्रक्रिया अपनायी. रवीन्द्र सिंह का लोकायुक्त के लिए राजभवन भेजा गया और राज्यपाल ने उनके नाम पर आपत्ति जाहिर करते हुए फाइल सरकार को वापस कर दिया.

राज्यपाल का निर्देश था कि सरकार रवीन्द्र सिंह के अलावा कोई अन्य नाम प्रस्तावित करे. राज्यपाल की आपत्ति यह भी थी कि राज्य सरकार ने कैबिनेट बैठक के जरिए उप्र लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त संशोधन विधेयक पास कर दिया था. इसके जरिए चयन प्रक्रिया और कार्यकाल आदि में बड़े बदलाव कर दिए गए थे. इस विधेयक को अभी राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिल पाई है.

रवीन्द्र सिंह के नाम पर राज्यपाल ने आपत्ति जाहिर करते हुए फाइल सरकार को वापस कर दिया

इस बीच 14 दिसम्बर को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकारते हुए दो दिन में नया लोकायुक्त नियुक्त करने का आदेश दिया तो सरकार के हाथपांव फूल गए. आनन फानन में पुरानी प्रक्रिया के मुताबिक 15 दिसम्बर की शाम कैबिनेट की बैठक बुलाई गई और मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और मुख्य न्यायाधीश ने शाम पांच बजे से रात ग्यारह बजे तक बैठ कर पांच नामों पर चर्चा की.

हालांकि इसमें से किसी भी नाम पर सहमति नहीं बन सकी. 16 दिसम्बर की सुबह भी डेढ़ घंटे की बैठक में कोई फैसला नहीं हो सका. शाम को एक बार फिर से बैठक प्रस्तावित थी लेकिन उसके पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना कर पूरे प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के कई पहलू हैं. सबसे पहला तो यह कि पहली बार एक संवैधानिक नियुक्ति में राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने में असफल रही है. उसे लोकायुक्त नियुक्ति प्रकरण में अपनी असफलता और मनमानी के लिए सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार भी सुननी पड़ी है.

राज्य सरकार ने इस पूरे प्रकरण में रवीद्र सिंह के नाम को लेकर जिस तरह का अड़ियल रुख अपनाया वह शर्मनाक था. उनके नाम को अन्य पक्षों की असहमति के बावजूद तीन-तीन बार राज्यपाल के पास भेजा और राज्यपाल को कहना पड़ा कि रवीन्द्र सिंह के अलावा कोई अन्य नाम भेजा जाए. अखिरकार 18 सितम्बर को खुद रवीन्द्र सिंह ने बयान दिया कि अब उनके नाम पर विचार न किया जाए.

लोकायुक्त नियुक्ति प्रकरण में असफलता और मनमानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई

लेकिन राज्य सरकार ने अपनी जिद पूरी करने के लिए पूरी चयन प्रक्रिया और नियमवाली को ही बदलने का प्रयास किया. राज्यपाल की सक्रियता के कारण उसका यह प्रयास भी बेकार हो गया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राज्य को नया लोकायुक्त तो मिल गया.

लेकिन सर्वाेच्च अदालत की कड़ी फटाकर के बावजूद राज्य सरकार इस बात से खुश हो सकती है कि आखिरकार उसे अपनी पसंद का ही लोकायुक्त मिला है. रवीन्द्र सिंह के बाद राज्य सरकार की पसंद की सूची में दूसरे स्थान पर वीरेन्द्र सिंह ही थे और एक बार चयन समिति में इस बात पर चर्चा हुई थी कि उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह सत्ताधारी दल के एक वरिष्ठ सदस्य के रिश्तेदार भी हैं.

उनका पुत्र सहारनपुर में समाजवादी पार्टी का उपाध्यक्ष है इसलिए उनके नाम पर विचार नहीं होना चहिए. लेकिन अन्ततः सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं के नाम पर अपनी मुहर लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने चयन प्रक्रिया तो पूरी कर दी लेकिन जो नाम चुना गया वह चयन समिति द्वारा पहले अस्वीकार हो चुका था.

सरकार ने लोकायुक्त के चयन में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को खत्म करने के लिए कैबिनेट से प्रस्ताव परित करवा लिया


इस तरह चयन उसी का हुआ जिसे राज्य सरकार चाहती थी. कोर्ट के इस फैसले के बाद एक सवाल यह भी उठता है कि कहीं सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त के चयन में दखलंदाजी करके लोकतांत्रिक स्वरूप की अनदेखी तो नहीं कर दी है. इस फैसले को अन्य राज्यों के लोकायुक्त चयन विवाद से भी जोड़ कर देखा जा रहा है. मसलन गुजरात में तो एक दशक तक लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया उलझी रही थी. महाराष्ट्र में मुख्य न्यायाधीश की असहमति के बावजूद लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी गई थी.

गोवा और दिल्ली में भी क्रमश: बाम्बे होईकोर्ट की पणजी खण्डपीठ और दिल्ली हाईकोर्ट की फटकार के बाद लोकायुक्त नियुक्तियां हुई हैं. चूंकि हर राज्य में लोकायुक्त चयन की प्रक्रिया और नियमावाली अलग अलग हैं.

इसलिए इसे अन्य राज्यों के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश में यह मामला राज्य सरकार की जिद, अपने करीबी लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने का उतावलपन, नियमों व प्रक्रियाओं की अवमानना का मामला है.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर गौर करना चहिए कि "आदेशों के बावजूद राज्य के संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने अपनी जिम्मेदारी को पूरा नहीं किया. संवैधानिक पद पर बैठे लोगों का यह कृत्य बेहद दुखद ओर चौंकाने वाला है.”

First published: 18 December 2015, 12:58 IST
 
गोविंद पंत राजू @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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