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सुप्रीम कोर्ट: मुस्लिम से सिख बने प्रत्‍याशी का सुरक्षित सीट पर चयन जायज़

राजीव खन्ना | Updated on: 2 May 2016, 20:20 IST

नाम में क्‍या रखा है? भारत के संदर्भ में इसका जवाब होगा कुछ नहीं, क्‍योंकि यहां कोई चीज़ अगर मायने रखती है तो वह है जाति और वंचित जातियों की आस्‍था चाहे जो हो, हमेशा उन्‍हें ही दबकर रहना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट ने यही दलील देते हुए पंजाब की आरक्षित सीट भदौर से कांग्रेसी विधायक मोहम्‍मद सादिक की जनवरी 2012 के विधानसभा चुनाव में हुई जीत को जायज़ ठहराया है.

न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई और प्रफुल्‍ल सी पंत ने सात अप्रैल, 2015 का पंजाब और हरियाणा उच्‍च न्‍यायालय का वह फैसला कथित तौर पर दरकिनार कर दिया जिसमें कहा गया था कि मुसलमान होने के नाते सादिक को अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था. चुनाव में उनके खिलाफ हार के बाद शिरोमणि अकाली दल के प्रतिद्वंद्वी प्रत्‍याशी दरबारा सिंह गुरु इस मामले को लेकर अदालत में गए थे.

सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कथित तौर पर पाया कि सादिक ने 2006 में सिख धर्म अपना लिया था और इस संबंध में अधिसूचना को बाकायदा स्‍थानीय अखबारों में भी छपवा दिया था. उन्‍होंने डोम समुदाय का सदस्‍य होने संबंधी एक प्रमाण पत्र भी प्राप्‍त कर लिया था. यह समुदाय अनुसूचित जाति में आता है.

कानून में स्‍थापित है कि एक व्‍यक्ति अपना धर्म और आस्‍था तो बदल सकता है लेकिन जाति नहीं बदल सकता

अदालत ने कथित तौर पर कहा है कि सादिक का जन्‍म भले ही इस्‍लाम मानने वाले माता-पिता के यहां हुआ है लेकिन उनका समुदाय डोम ही था. यह कानून में स्‍थापित है कि एक व्‍यक्ति अपना धर्म और आस्‍था तो बदल सकता है लेकिन जाति नहीं बदल सकता क्‍योंकि जाति का संबंध उसके जन्‍म से होता है.

सादिक ने कोर्ट को कथित रूप से यह बताया था कि चूंकि वह एक लोकप्रिय लोकगायक है और उसका नाम ही उसकी पेशेवर पहचान है, लिहाजा उसने अपना नाम नहीं बदला है. अदालत ने यह भी कहा है कि किसी दूसरे धर्म को अपनाने के लिए अपना नाम बदलने की अनिवार्यता नहीं है, हालांकि नाम बदलना धर्म परिवर्तन की तथ्‍यात्‍मक पुष्टि बेशक करता है. इसके अलावा कानूनन यह भी ज़रूरी नहीं है कि एक व्‍यक्ति के धर्म बदलने पर उसका समूचा परिवार भी उक्‍त धर्म को अपना ले.

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पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने सादिक की विधायकी को अमान्‍य करार देने वाले वाले उच्‍च न्‍यायालय के फैसले पर रोक लगा दी थी. बंदिश के बावजूद उन्‍हें विधानसभा की कार्यवाही में शामिल होने की छूट दी गई थी, हालांकि उन्‍हें वोट नहीं देने दिया गया था.

उच्‍च न्‍यायालय ने सादिक को गुरु की इस याचिका पर अमान्‍य करार दिया था कि मुसलमान होने के नाते सादिक आरक्षित सीट से लड़ने के योग्‍य नहीं थे. उच्‍च न्‍यायालय ने सादिक के चुनाव को अमान्‍य करार देते हुए कहा था कि चुनाव के वक्‍त वे मुसलमान थे और आरक्षित सीट से खड़े होने के योग्‍य नहीं थे.

लोग धर्म परिवर्तन समानता के लिए करते हैं लेकिन अब तक उन्‍हें समानता हासिल नहीं हुई है: सुरजीत सिंह

अपनी अदालती जीत के बाद सादिक ने भदौर सीट से ही गुरु के खिलाफ दोबारा चुनाव लड़ने की अपनी इच्‍छा ज़ाहिर की है.

समाजशास्‍त्री डॉ. मनजीत सिंह इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अदालत ने साफ कर दिया है कि आप अपना धर्म बदल सकते हैं, लेकिन जाति नहीं. वे कहते हैं, ''यह इशारा इस बात की ओर है कि हमारे समाज में जाति अपेक्षाकृत ज्‍यादा स्थिर ताकत के रूप में अब तक बनी हुई है. यहां तक कि धर्म भी जाति की दीवार में सेंध नहीं लगा सकी हैं.''

सादिक के मामले पर टिप्‍पणी करते हुए उन्‍होंने कहा कि पंजाब के समाज में यह दुधारी प्रवृत्ति के तौर पर सामने आता है. वे कहते हैं, ''सिख धर्म के तत्‍वों के मुताबिक इसमें जाति की कोई जगह नहीं है, लेकिन साथ ही सिखों पर हिंदू आचार संहिता भी लागू होती है.'' उन्‍होंने कहा कि धर्म परिवर्तन अपने आप में एक कानूनी चीज़ है. हो सकता है कि पंजाब के राजनीतिक परिदृश्‍य में सादिक को मुसलमान होने के बतौर अपने लिए कोई गुंजाइश न दिख रही हो.''

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उन्‍होंने इस बात को रेखांकित किया कि भारत में अर्थशास्‍त्र पर समाजशास्‍त्रीय परिघटनाओं का प्रभुत्‍व रहता है, जैसा कि पश्चिम में कतई नहीं है. यहां चीज़ें व्‍यक्ति की जाति, जातीयता और धर्म से तय होती हैं.

पटियाला के एक राजनीतिक पर्यवेक्षक डॉ. सुरजीत सिंह का कहना है, ''लोग धर्म परिवर्तन समानता के लिए करते हैं लेकिन अब तक उन्‍हें समानता हासिल नहीं हुई है. धर्म चाहे जो हो, गरीबों का हाल एक सा रहता है. भारतीय संविधान के कई ऐसे पहलू हैं जिनकी दोबारा पड़ताल की जानी चाहिए.''

यह समझी जाने वाली बात है कि व्‍यक्ति चाहे जो भी धर्म अपना ले, दलितों की जीवनशैली में कोई सुधार नहीं होता:बीएसपी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कानूनी पहलुओं पर टिप्‍पणी करने से बचते हुए पंजाब बीएसपी के अध्‍यक्ष अवतार सिंह करीमपुरी ने कहा, ''यह समझी जाने वाली बात है कि व्‍यक्ति चाहे जो भी धर्म अपना ले, दलितों की जीवनशैली में कोई सुधार नहीं होता. वह समान बनी हुई है. इस फैसले को इसी आलोक में देखा जाना चाहिए. इस बात से कोई इनकार नहीं है कि अनुसूचित जातियों का उत्‍पीड़न हिंदू धर्म में निहित है और इसी वजह से लोग अलग-अलग आस्‍थाओं को अपनाते रहे हैं.''

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पंजाब में दलित विषयों के जानकार और प्रख्‍यात अकादमिक रोनकी राम इस फैसले को विशुद्ध राजनीतिक व कानूनी मसला मानते हैं. वे कहते हैं, ''वे मिरासी मुसलमानों की विशिष्‍ट बिरादरी से आते हैं. चाहे वे प्रख्‍यात गायक कुलदीप मानक हों, गुरदास मान, हंसराज हंस या सादिक, इन लोगों को अपने क्षेत्र में अपनी कला और उपलब्धि के लिए जाना जाता है न कि अपने धर्म या पंथ के लिए.''

उनका कहना था कि पंजाब में चाहे वे हिंदू हों, मुसलमान या सिख, सबके सामाजिक-धार्मिक आचार-व्‍यवहार एक-दूसरे को परस्‍पर स्‍पर्श करते हैं इसलिए कोई भी पंथ विशेष कर्मकांडों के मामले में शुद्ध नहीं है. वे कहते हैं, ''चुनाव लड़ने के लिए वह सिख बने या मुसलमान, किसी को इससे बमुश्किल ही कोई फर्क पड़ता है.''

First published: 2 May 2016, 20:20 IST
 
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