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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: पर क्या जाति को चुनाव से दूर रखा जा सकता है?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 4 January 2017, 8:08 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

राजनीतिक दलों को चुनाव में धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर वोट मांगने से प्रतिबंधित करने वाले सुप्रीम कोर्ट के 2 जनवरी के फैसले में एक आधारभूत समस्या है. समस्या यह है कि धर्म और जाति हमारे समाज की जीवंत सच्चाई हैं और भारत की राजनीति इनसे स्वतंत्रता के पहले से प्रभावित होती आई है. इसलिए इनको चुनावी राजनीति से दूर रखने के लिए कहना तो आसान है लेकिन इसको अंजाम देना बहुत मुश्किल.

साथ ही यह भी कहना होगा कि जाति और धर्म दोनों का चुनावों से समान संबंध नहीं है. चुनावों में धार्मिक आधार पर लामबंदी जहां विभाजनकारी होती है वहीं जाति के आधार पर लामबंदी इंसाफ के लिए कमजोरों के संघर्ष का जरिया रही है.

धार्मिक स्थितियां

भारत की राजनीति पिछले वर्षों में उस एक मात्र दल हिंदू महासभा को खारिज कर चुकी है जो कि खुले आम हिंदुओं के नाम पर अपनी राजनीति करती थी. लेकिन, भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना जैसे दल खुले तौर पर अपने को हिंदुत्व से जोड़ते हैं, जो कि दरअसल हिंदुवाद के लिए ही उनका अपना एक ब्रांड है. 

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो कांग्रेस को इसी श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता, लेकिन लंबे समय तक कांग्रेस पर हिंदू सवर्ण पुरुषों का ही पूर्ण आधिपत्य रहा है.

वहीं शिरोमणि अकाली दल का तो गठन ही सिख पहचान को लेकर हुआ है और एआईएमआईएम मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लमीन तो पूरी तरह मुस्लिम पहचान से ही जुड़ी हुई है. अब सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद ये दल किस तरह से अपनी चाल-ढाल बदलेंगे यह देखना रोचक होगा.

लेकिन इस फैसले के एक दूसरे पहलू जिस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा वह यह कि इसका दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति पर क्या असर होगा? सवाल यह भी है कि अब उन राजनेताओं और दलों का क्या होगा जो कि निम्न और पिछड़े वर्ग की जातियों को सदियों से चली आ रहीं सामाजिक-आर्थिक असामनताओं की बेड़ियों से मुक्त कराने के नाम पर संघर्ष करने और चुनाव लड़ने का दम भरते हैं. 

बीएसपी, आरपीआई, एसपी, जेडीयू, आरजेडी जैसे दलों के लिए तो यह उनके अस्तित्व के तर्क पर ही सवाल खड़ा करता है, वहीं भाजपा और कांग्रेस में भी बड़ी संख्या में ऐसे राजनेता हैं जो कि निम्न जाति और पिछड़े वर्ग से हैं.

शोषित वर्ग अब कैसे लड़ेगा लड़ाई

मशहूर राजनीतिक विश्लेषक और दलित अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कांचा इलैया ने कैच को बताया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अप्रत्याशित और समस्याजनक लगता है. उन्होंने कहा, धर्म एक व्यक्तिगत फिनॉमिना है जबकि जाति एक सोशल कंस्ट्रक्ट है, जैसे की रेस.

उदाहरण के लिए वह पूछते हैं कि क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि दक्षिण अफ्रीका में वे राजनीतिक दल जो कि अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? इलैया सावधान करते हुए कहते हैं कि ऐसी स्थिति में बड़ी समस्या यह हो जाएगी कि फिर दलित-दमित लोगों के लिए संघर्ष कौन करेगा?

इलैया कहते हैं कि मान लीजिए कोई राजनीतिक दल कल यह कहता है कि वह अस्पृश्यता को मिटाने के लिए संघर्ष करेगा, तो क्या यह फैसला उसको काम करने से रोकेगा? इलैया ने याद दिलाया कि खुद बीआर अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के एक संघ की स्थापना की थी. इलैया तर्क देते हैं कि जाति ऐसी हकीकत है जिसका उन्मूलन संविधान और सुप्रीम कोर्ट भी नहीं कर सके हैं, ऐसे में इस निर्णय को कैसे क्रियान्वित किया जा सकेगा?

संविधान में जाति की मान्यता का सवाल

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विवेक कुमार भी इस फैसले से सहमत नहीं दिखते हैं. इस फैसले की आलोचना करते हुए वे एक बुनियादी सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक श्रेणी है और चुनावों में भी कुछ सीटें इस श्रेणी के लोगों के लिए आरक्षित रखी जाती हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लागू किया जाता है तो इस मुद्दे से कैसे निपटा जाएगा? 

प्रोफेसर कुमार के सवाल से एक बुनियादी प्रश्न उठ खड़ा होता है. क्या इस निर्णय के क्रियान्वयन के लिए एससी के लिए संविधान में दिया गये आरक्षण को हटाया जाएगा?

लेकिन यूजीसी के पूर्व चेयरमैन और "दलित इन इंडिया: सर्च फॉर ए कॉमन डेस्टिनी" पुस्तक के लेखक प्रोफेसर सुखदेव थोराट इस मुद्दे पर एक अलग राय रखते हैं. उनके अनुसार, इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट सिर्फ इतनी-सी बात नेताओं से कह रहा है कि संकीर्ण पहचानों की बात करने के बजाय वे मुद्दों की बात करें.

थोराट ने कहा कि नेता किसी जाति विशेष के लोगों से एकजुट होने और इस आधार पर वोट देने की बात तो करते हैं, पर वे मुद्दों की बात नहीं करते हैं. थोराट ने कहा, इस फैसले के बाद नेता दलित मुद्दों पर बात करने के लिए मजबूर हो जाएंगे.

वहीं इलाहाबाद के जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर बद्री नारायण कहते हैं कि जाति भारत के सामाजिक-आर्थिक तानेबाने का जीवंत हिस्सा रही है और वे ऐसी कोई संभावना नहीं देखते कि यह राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करना बंद कर देगी. उनका यह भी कहना है कि लोकतंत्र ने जाति को बल ही प्रदान किया है, उसे कमजोर नहीं किया.

मालूम हो कि अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय बैंच ने इस मुद्दे पर बहस शुरू की थी कि क्या भारत के चुनाव संबंधी कानूनों के अनुसार धर्म के नाम पर वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जा सकता है? इसके बाद इस मुद्दे को सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ को सौंप दिया गया था.

लेकिन इस निर्णय ने जिस तरह की बहस पैदा की है उससे लगता नहीं कि इस मुद्दे पर अंतिम फैसला आ चुका है. कम से कम इसके क्रियान्वयन यानी कि व्यावहारिक पक्ष को लेकर अभी बहुत कहा-सुना जाना शेष है.

First published: 4 January 2017, 8:08 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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