Home » इंडिया » Scorpene deal leak can harm India's naval capabilities
 

देश के सुरक्षा विस्तार को अकल्पनीय नुकसान हो सकता है स्कॉर्पीन पनडुब्बी दस्तावेज लीक से

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 August 2016, 8:01 IST

देश के सुरक्षा विस्तार की महत्वाकांक्षी योजना को एक और झटका लगा है. स्कॉर्पीन पनडुब्बी संबंधी दस्तावेजों में लीक का मामला सामने आया है. इन दस्तावेजों में विशिष्ट जानकारियां समाहित थी. भारत ने 2005 में फ्रांस की डीसीएनएस के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किया था, जिसके तहत देश के लिए छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना था. इसकी पहली खेप मझगांव डॉक्स शिप बिल्डर्स लिमिटेड द्वारा बनाई जा रही है.

इन पनडुब्बियों को इस वर्ष रक्षा बेड़े में सम्मिलित कर लिया जाएगा. कुछ रिपोर्टों के अनुसार निर्धारित समय के हिसाब से यह पनडुब्बियां चार साल पहले ही देश में आ जानी चाहिए थी. फ्रांसीसी सरकार की जहाज निर्माता कम्पनी डीसीएनएस की इसमें दो तिहाई हिस्सेदारी है.

ऑस्ट्रेलियाई अखबार ने सबसे पहले इस लीक का खुलासा किया था. इसके अनुसार, माना जा रहा है कि 22,400 पेज वाले इस दस्तावेज में इन पनडब्बियों की लड़ाकू क्षमता, टॉरपीडो प्रणाली, पेरिस्कोप तंत्र आदि सभी से संबंधित विशिष्ट जानकारियां समाहित हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक दस्तावेजों में छह नई भारतीय स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की सैन्य क्षमताओं की विस्तृत जानकारी मौजूद थी. किस आवृत्ति पर इन पनडुब्बियों में गोपनीय सूचनाएं एकत्र करने की क्षमता होती है, कितनी गति पर पनडुब्बी कितना शोर मचाती हैं, कितने गहरे पानी में गोता लगा सकती हैं, मारक क्षमता और शक्ति, चुम्बकीय, विद्युत चुम्बकीय और इन्फ्रा रेड डेटा, पनडुब्बी के टॉरपीडो लॉन्च प्रणाली और लड़ने की क्षमता, गति, पेरिस्कोप के इस्तेमाल के लिए आवश्यक गति और अन्य परिस्थितियों के बारे में विशिष्ट जानकारी इन दस्तावेजों के जरिए लीक हो गई है. साथ ही जब पनडुब्बी सतह पर आती है, उस समय डॉप्लर ध्वनि के विशेष फीचर और विकिरण शोर संबंधी आंकड़े भी लीक हो गए हैं.

22,400 पेज वाले इस दस्तावेज में इन पनडब्बियों की गोपनीय जानकारियां समाहित हैं

इससे समुद्र मेें भारत की नौ सैनिक क्षमता बढ़ जाती. चीन से उसे गंभीर खतरे की आशंका है, विशेषकर, हिन्द महासागर में. भारतीय नौसेना के अधिकारियों के मुताबिक वे इस लीक मामले की जांच कर रहे है, कि कहीं इससे पनडुब्बी की संचालन क्षमताओं पर तो असर नहीं पड़ेगा.

रक्षा मंत्री ने भी आशंका जताई कि लीक हैकिंग के जरिये हुई है. उन्होंने कहा, ‘मैंने नौसेना प्रमुख से कहा है कि वे इस पूरे मामले का अध्ययन करें, क्या लीक हुआ है?, इससे भारत पर क्या असर पड़ेगा और किस हद तक पड़ेगा?’

उन्होंने मीडिया से कहा मुझे इस बारे में आधी रात को पता चला. मुझे लगता है इस लीक के पीछे हैकिंग है. हम सब बातों का पता लगा लेंगे. आने वाले दिनों में तस्वीर साफ हो जाएगी. भारतीय नौसेना का आकलन है कि शायद इस लीक से नुकसान नहीं हुआ है. भारत सरकार ने डीसीएनएस से भी इस लीक की विस्तृत जानकारी मांगी है.

भारतीय अधिकारियों को संदेह है कि यह लीक भारत में नहीं हुई, जबकि डीसीएनएस का कहना है कि यह विशेष जानकारी उनके देश से ही लीक हुई है. ऑस्ट्रेलियाई अखबार की रिपोर्टों में भी यही कहा गया है कि इस लीक का केंद्र फ्रांस ही है.

एक पूर्व नौसेना अधिकारी जो कि इस फ्रांसीसी अनुबंध के लिए 2011 तक एक कॉन्ट्रैक्टर के रूप में जुड़ा हुआ था, उसके ऊपर शक की सुई जा रही है. आशंका जताई जा रही है कि शायद उसने ये दस्तावेज चुरा कर दक्षिण-पूर्व एशिया की किसी फर्म को दे दिए और वहां से ये दस्तावेज इसी क्षेत्र की किसी और कम्पनी के हाथ लग गए. फिर इसी तरह ऑस्ट्रेलियाई कम्पनी तक पहुंच गए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि इन दस्तावेजों तक विदेशी कम्पनियों की पहुंच थी या नहीं.

भारतीय अधिकारियों को संदेह है कि यह लीक भारत में नहीं हुई, जबकि डीसीएनएस का कहना है कि यहीं से लीक हुई है

गौरतलब है कि भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान को भी ऑस्ट्रेलियाई प्रेस की कुछ रिपोर्टों के जरिये इस लीक का पता चला न कि डीसीएनएस से, जबकि अगर ऐसी कोई बात होती है तो इसकी जानकारी डीसीएनएस से मिलनी चाहिए थी.

डीसीएनएस भारतीय पनडुब्बी परियोजना संबंधी इस लीक पर चुप्पी साधे हुए है. इसका फोकस ऑस्ट्रेलियाई सरकार के साथ 12 गोपनीय पनडुब्बियां बनाने की 50 खरब डॉलर की भावी परियोजना पर है. रिपोर्ट में कम्पनी के हवाले से कहा गया है कि ऑस्ट्रेलियाई व्यवस्था में अनियंत्रित टेक्नीकल डाटा होना संभव नहीं है.

ऑस्ट्रेलियाई अखबार में डीसीएनएस के हवाले से कहा गया है कि उसकी कम्पनी में बहुत से स्वतंत्र नियंत्रण हैं, जो आंकड़ों तक अनाधिकृत पहुंच नहीं होने देते और डेटा संबंधी सभी गतिविधियां एक कूट भाषा में दर्ज होती हैं. जहां तक भारत का सवाल है, डीसीएनएस द्वारा दी गई डिजाइन पर स्थानीय कम्पनी से निर्माण करवाया जा रहा है. इसलिए डीसीएनएस केवल दाता है, उसका तकनीकी आंकड़ों पर कोई नियंत्रण नहीं है.

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, डीसीएनएस ने यह भी कहा है कि लीक का कारण उद्योगों की आपसी दुश्मनी भी हो सकती है. अगर यह बात सही है कि ये दस्तावेज ऑस्ट्रेलिया पहुंचाए गए तो यह बहुत बड़ी गड़बडी का संकेत है. रॉयटर ने डीसीएनएसकी प्रवक्ता के हवाले से कहा, ‘इस पर भारत, ऑस्ट्रेलिया व अन्य संबंधित देश डीसीएनएस पर सवाल उठा सकते हैं.’

भारत के अलावा चिली, ब्राजील और मलेशिया में भी इसी तरह की स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के एक रूप का इस्तेमाल किया जाता है. उक्त 6 पनडुब्बियों के अलावा भारत सरकार ने फ्रांसीसी सरकार के साथ एक और सौदा किया है. इसके तहत दासौत एविएशन, फ्रांस भारत के लिए 36 राफेल विमान बनाएगा. ऐसी रिपोर्ट भी है कि यह डील अपने अंतिम चरणों में है. भारत इन विमानों की कीमत कुछ कम कराने पर अड़ा है.

फ्रांसीसी फर्म द्वारा बनाई जा रही स्कॉर्पीन पनडुब्बियों पर विवाद का यह पहला मामला नहीं है. 2005 में जब इस समझाौते पर हस्ताक्षर किए गए थे तब भी इस पर तत्कालीन विपक्षी दल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने अंगुली उठाई थी. दलाली का आरोप लगाते हुए विपक्ष ने कहा था कि थेल्स और रक्षा डीलर अभिषेक वर्मा सहित मध्यस्थों के बीच 1100 करोड़ रूपए का लेन-देन हुआ था ताकि सौदा हो जाए. मामले की जांच सीबीआई कर रही है.

गौरतलब है कि 2015 में केंद्र ने दिल्ली उच्च न्यायालय को कहा था कि 2005 के इस सौदे में कोई दलाली नही ली गई.

इस बीच, इस साल फरवरी में फ्रांसीसी अधिकारियों ने औपचारिक तौर पर 2002 के एक सौदे पर जांच बिठाई, कि दो पनडुब्बियों के इस 1.2 अरब डॉलर के सौदे में मलेशियाई प्रधानमंत्री नजीब रजाक को दलाली दी गई थी या नहीं.

थेल्स इंटरनेशनल इंडिया के एक पूर्व अध्यक्ष पर कथित रूप से आरोप लगाया गया है कि उन्होंने यह सौदा हासिल करने के लिए रजाक के एक सहयोगी को रिश्वत दी थी.

First published: 26 August 2016, 8:01 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी