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स्काॅर्पीन दस्तावेज लीक पर विशेषज्ञों की रायः ज्यादा नुकसान नहीं होगा

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 29 August 2016, 14:10 IST

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने यह नहीं बताया कि स्काॅर्पीन लीक पर रक्षा मंत्रालय का आकलन क्या है लेकिन उनकी नाराजगी साफ देखी जा सकती थी. पनडुब्बी सौदे के 2200 पन्नों के दस्तावेज लीक से देश की सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव का भारतीय नौसेना द्वारा किए गए आकलन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पर्रिकर ने कहा, ‘मुझे बताया गया है कि चिंता की बात यह है कि वाकई क्या वही जानकारी लीक हुई है, जिसके लीक होने का दावा किया जा रहा है.’

इस बीच स्कॉर्पीन सबमरीन्स के डेटा लीक मामले में घिरी फ्रेंच कंपनी डीसीएनएस ने 'द ऑस्ट्रेलियन' अखबार के खिलाफ वहां की सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला किया है. डीसीएनएस ने ऑस्ट्रेलियाई पब्लिशर एसोसिएशन से भी 'द ऑस्ट्रेलियन' अखबार को अन्य गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने से रोकने की मांग की है. कंपनी का तर्क है कि इससे उसके ग्राहक (भारतीय नौसेना) को सीधा नुकसान पहुंचेगा. 'द ऑस्ट्रेलियन' अखबार के पास स्कॉर्पीन पनडुब्बी समेत 22,400 सीक्रेट डॉक्युमेंट्स हैं.

अगर देखा जाय तो पार्रिकर ने फ्रांसीसी निर्माता कम्पनी के खिलाफ जांच के दरवाजे खुले रखे हैं. अगर यह पाया गया कि नौसेना के दुश्मन इस लीक का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं तो फ्रांसीसी कम्पनी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

स्कॉर्पीन पनडुब्बी की टॉप सीक्रेट जानकारी लीक, पर्रिकर ने दिए जांच के आदेश

आम तौर पर जब नई पनडुब्बी पानी में उतरने के लिए तैयार होती है तो विरोधी सबसे महत्वपूर्ण जानकारी जो जानना चाहता है, वह यह कि पानी के अंदर इसकी विशिष्ट स्थिति बताने वाले संकेतक या सोनार सिग्नेचर (पहचान) क्या हैं? इसका इस्तेमाल पनडुब्बी को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है.

वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों का मानना है कि लीक हुए दस्तावेजों में सोनार सिग्नेचर जैसी कोई जानकारी नहीं है. विरोधी नौसेना अक्सर यही मालुम करने पर तुली रहती है.

देश के सुरक्षा विस्तार को अकल्पनीय नुकसान हो सकता है स्कॉर्पीन पनडुब्बी दस्तावेज लीक से

सेवानिवृत्त एयर मार्शल प्रणब के बारबोरा बताते हैं, ‘देखिए लीक हुए दस्तावेजों में से किसी पर भी 'गोपनीय' नहीं लिखा था और इन प्रतिबंधित दस्तावेजों में जो जानकारी होती है, वह कमोबेश इंटरनेट पर उपलब्ध है.'

एक सेवानिवृत्त वाइस एडमिरल ने बताया कि, ‘इन लीक के लिए एक संचालनात्मक सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं. जितनी भी नौसेनाएं बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में सक्रिय हैं, उन्हें इस विचित्र समस्या का हल ढूंढना होगा, जिसे हम नेगेटिव ग्रेडिएंट वाटर कहते हैं. इसका मतलब है कि पनडुब्बी जब पानी में ज्यादा गहराई में नीचे उतरती है तो तापमान में गिरावट आाती है. इस प्रक्रिया में पनडुब्बी के स्क्रू से आने वाली ध्वनि तरंगों की दिशा वास्तविक स्थिति से बदल जाती है और सतह या उपसतह पर पनडुब्बी विरोधी जलवाहक पोत का संकेतक दिग्भ्रमित हो जाता है.’

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नौसेना की बोलचाल की भाषा में स्क्रू का मतलब होता है प्रोपेलर यानी जहाज के आगे लगा पंखा. दुश्मन सेना की पनडुब्बी न केवल प्रोपेलर की आवाज को पकड़ सकती है, बल्कि जहाज के अंदर से आने वाली आवाज और कांच की आवाज भी सुन कर पीछा कर सकती है. अगर नेगेटिव ग्रेडिएंट में ये आवाजें खो जाती हैं तो ‘पनडुब्बी हत्यारों’ के लिए उसे चिन्हित करना और मुश्किल हो जाता है.

First published: 29 August 2016, 14:10 IST
 
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