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गुजरात के हाशिये पर मौजूद समुदायों में तीसरे विकल्प के लिए बेचैनी

राजीव खन्ना | Updated on: 9 May 2017, 10:17 IST

6 मई को पूरे गुजरात से मुस्लिम, दलित, पाटीदार और आदिवासी समुदाय के 40 हज़ार लोग गुजरात की राजनीति का केंद्र कहे जाने वाले अहमदाबाद के रिवरफ्रंट पर एकजुट हुए. इन सभी को 'कौमी एकता सम्मेलन' के लिए एक साथ लाने का प्रयास अनेक सामाजिक संगठनों की तरफ से किया गया था. इसका उद्देश्य यह था कि हाशिये पर मौजूद समुदायों को यह समझाया जा सके कि एक-दूसरे के साथ खड़े होना कितना जरूरी है.

पर एक दुविधा अब भी बिल्कुल स्पष्ट रूप से उन्हें घूर रही है. गुजरात की राजनीति में किसी तीसरे विकल्प का चला आ रहा अभाव, विशेषकर राज्य में आने वाले चुनावों को देखते हुए. आयोजनकर्ताओं के अनुसार इस आयोजन का उद्देश्य 2017 के विधानसभा चुनाव से निरपेक्ष राज्य में वैकल्पिक राजनीति के लिए मैदान तैयार करना है. इस आयोजन के दौरान आरएसएस-भाजपा द्वारा हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहे जाने वाले गुजरात में प्रचारित किए गए अनेकों आख्यानों की हकीकत को जनता के सामने उधेड़ने का व्यापक प्रयास किया गया.

एक महत्वपूर्ण संदेश

इस आयोजन को धार्मिक नेताओं जैसे अरशद मदनी और आचार्य प्रमोद कृष्णन और अन्य प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया. इसके मुख्य आयोजकों में एक थी जमीयत-ए-उलमा-ए-हिंद. आयोजकों में से एक वकार काजी के अनुसार हम इस आयोजन के माध्यम से कई महत्वपूर्ण संदेश देना चाहते थे विशेषकर उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद जिस तरह का राजनीतिक माहौल देश में बना हुआ है उसके परिप्रेक्ष्य में. भाजपा ने जीत के बाद कई दावे किए हैं. हमारा पहला संदेश यह था कि भारत का विशिष्ट बहुलतावादी विचार अब भी पूरी तरह से अक्षुण्ण है. इसका क्षय नहीं हुआ है जैसा कि भाजपा और दूसरे संगठन प्रोजेक्ट कर रहे हैं.

पाटीदार नेता केडी शेलाडिया ने कैच से कहा कि वर्तमान राजनीतिक वातावरण में यह जरूरी है कि इस तरह के अधिक से अधिक आयोजन किए जाएं, जिसमें यह रेखांकित किया जाए कि किस प्रकार सरकार अपने कर्तव्य के निर्वहन के बजाय हाशिये पर मौजूद उन समुदायों के दमन का काम कर रही है जो कि अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं. इसलिए सरकार की ज्यादतियों के शिकार हाशिये के समुदायों को एक साथ आना चाहिए.

सरकार की असफलता

गुजरात दलित संगठन की जयंती मकाडिया का कहना है कि जमीनी स्तर पर इस मुद्दे पर मंथन चल रहा है कि राज्य में भाजपा के लगभग दो दशक से अधिक के शासन के दौरान हाशिये पर मौजूद समुदायों ने क्या खोया और क्या पाया है. मकाडिया ने आगे कहा कि दलित, आदिवासियों और पाटीदारों ने कांग्रेस को इसलिए सत्ता से बाहर किया था क्योंकि वह अपनी कमियां स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी. उन्होंने भाजपा को मौका दिया पर भाजपा ने उनकी चिंताओं को संबोधित नहीं किया. इस तरह यह क्या खोया और क्या पाया की कहानी बनती है.

पिछले कुछ वर्षों में इन समुदायों के लोग और अधिक जागरूक हुए हैं और सोशल मीडिया ने उनको एक-दूसरे से जुड़ने में मदद की है. यही वजह है कि समरसता जैसे सरकार के कार्यक्रम गांवों में फेल हो रहे हैं, क्योंकि लोग नहीं चाहते कि लोकतांत्रिक संस्थाएं खत्म हो जाएं और उनके ऊपर चीजें थोपी जाएं.

उन्होंने कहा कि भाजपा समरसता के कार्यक्रम पर जोर देने के तमाम प्रयास करती रही है, जिसमें ग्राम पंचायत और दूसरी संस्थाओं को आर्थिक और दूसरे लाभ दिए जाते हैं. अगर वे अपने प्रतिनिधियों को एकमत से चुनती हैं. आलोचक इस योजना का अलोकतांत्रिक कहते हुए विरोध करते रहे हैं क्योंकि इससे असहमति या भिन्न मत के लिए कोई जगह ही नहीं रह जाती है. पर इस सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है. इस तरह के प्रोग्राम का लक्ष्य क्या है? राज्य की वोट राजनीति पर इनका कोई असर नहीं हुआ है.

जबकि कांग्रेस अपने को प्राय: भाजपा और आरएसएस ब्रांड की राजनीति का विकल्प प्रस्तुत करती रही है, बड़ी संख्या में हाशिये पर मौजूद लोग अब भी कांग्रेस से निराश दिखते हैं और इसे भाजपा की बी टीम की तरह ही देखते हैं. इस समूची स्थिति का सबसे खराब पक्ष यह है कि राज्य में कोई तीसरा मजबूत विकल्प ही मौजूद नहीं है.

First published: 9 May 2017, 10:17 IST
 
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