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बोतलबंद पानी: बूंद-बूंद से सिंधु नहीं, अब बूंद-बूंद से पैसा

अभिषेक पराशर | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • साल 1990 के बाद से भारत के शहरी इलाकों में पीने के पानी के मामले में पाइपलाइन के पानी पर लोगों की निर्भरता में कमी आई, शहरों में पीने के लिए ट्रीटेड पानी पर लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है
  • वहीं ग्रामीण इलाकों में अभी भी एक बड़ी आबादी को विकल्पहीनता की स्थिति में गंदा पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है

साफ पानी की किल्लत पूरे देश में महामारी की तरह फैल रही है. महाराष्ट्र, बुंदेलखंड, तेलंगाना से आ रही खबरें चिंताजनक हैं. पानी को लेकर दंगे जैसी स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन को लातूर में धारा 144 लगानी पड़ी ताकि भीड़ को पानी के टैंकरों, कुंओं और तलाब के पास इकट्ठा होने से रोका जा सके.

लातूर शहर में सरकार जहां अभी भी हफ्ते में एक दिन पानी की आपूर्ति कर रही हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में महीने में एक दिन पानी की आपूर्ति की जा रही है.

नागरिकों को साफ पानी मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन संवैधानिक गारंटी के बावजूद सरकार इस दिशा में बुरी तरफ विफल रही है.

यूनाइटेड नेशंस की कमेटी ऑन इकनॉमिक, सोशल एंड कल्चरल राइट्स ने अपनी 29वीं बैठक में पानी को जीने के अधिकार के तहत बुनियादी अधिकार घोषित करते हुए सदस्य देशों की जिम्मेदारी तय करने का फैसला किया.

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संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के बाद सिविल सोसाएटी की तरफ से बनाए गए दबाव और न्यायिक हस्तक्षेप की वजह से भारत में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों की पानी तक पहुंच को बुनियादी अधिकार के तौर पर सुनिश्चित करने की मुहिम की शुरुआत हुई.

आजादी के बाद से भारत में नागरिकों की खराब सेहत की सबसे बड़ी वजह साफ पानी की अनुपलब्धता है. सरकार ने इसे सर्वाधिक गंभीर चुनौती मानते हुए पहले पंचवर्षीय योजना में नागरिकों को साफ पानी मुहैया कराए जाने को अपनी प्रााथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा था.

भारत समेत दुनिया की बड़ी आबादी को साफ पानी मयस्सर नहीं होने की वैश्विक चिंताओं के बीच 1977 में यूनाइटेड नेशस वाटर कॉन्फ्रेंस की बैठक में 1981-90 को इंटरनेशनल ड्रिकिंग वाटर सप्लाई एंड सैनिटेशन दशक के तौर पर मनाने का फैसला किया गया. भारत ने इस कार्यक्रम को पूरा सहयोग देने का वादा किया लेकिन अभी तक इस दिशा में किया गया काम बेहद निराशाजनक है.

1990 के बाद से शहरी इलाकों में पीने के पानी के मामले में पाइपलाइन के पानी पर लोगों की निर्भरता में कमी आई है. अब लोग पाइपलाइन के पानी का इस्तेमाल सिर्फ नहाने, धोने, बर्तन मांजने के लिए करते हैं. पीने के लिए ट्रीटेड पानी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है.

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इसके कारण ग्रामीण और शहरी इलाकों में पीने के पानी के लिए भूजल पर लोगों की निर्भरता में इजाफा हुआ है. ग्रामीण इलाकों में अभी भी एक बड़ी आबादी को विकल्पहीनता की स्थिति में गंदा पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है.

इसका एक और दुष्प्रभाव यह हुआ कि शहरी इलाकों में लोगों की निर्भरता बोतलबंद पानी पर बढ़ी है. इस स्थिति ने पानी के कारोबार और उसके निजीकरण का रास्ता खोल दिया है.

पानी पर बढ़ता कॉरपोरेट नियंत्रण

भारत में पानी का कारोबार तेजी से पांव फैला रहा है यानी पानी का कारपोरेटीकरण तेजी से बढ़ती जा रही है. पिछले दो दशकों से बोतलबंद पानी की खपत में तेजी से वृद्धि हुई है.

भारत में पानी का कारोबार तेजी से पांव फैला रहा है

2013 में भारत में बोतलबंद पानी का बाजार 60 अरब रुपए का रहा. एक अनुमान के मुताबिक साल 2018 तक यह कारोबार 160 अरब रुपए का हो सकता है. डिब्बाबंद पानी के कारोबार की मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस कारोबार की वृद्धि दर लगातार 22 फीसदी के आस-पास बनी हुई है.

90 से शुरू हुआ निजीकरण

भारत में बोतलबंद पानी के कारोबार की शुरुआत 1990 के आखिर में होती है. तब बिसलेरी ने देश में पहली बार बोतलबंद पानी को बाजार में उतारा था. इसके साथ ही अंधाधुंध विज्ञापन चलाकर यह साबित करने की कोशिश की गई कि बोतलबंद पानी पूरी तरह से सुरक्षित है.
 
भारत में बोतलबंद पानी के कारोबार की कहानी सिर्फ भारत से जुड़ा मामला नहीं है. यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलावों से जुड़ा मामला भी है.

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1992 में डबलिन कॉन्फ्रेंस ऑन वाटर एंड एनवायरमेंट में विकासशील देशों में पानी के निजीकरण की बुनियाद रखी गई. इसमें साफ किया गया कि पानी की अपनी कीमत है और इसका इस्तेमाल एक कमोडिटी के तौर पर ही किया जाना चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र की घोषणा को ध्यान में रखते हुए यह जरूर कहा गया कि साफ पानी बुनियादी मानवाधिकार है लेकिन इसे किफायती कीमत पर लोगों को मुहैया कराया जाए. इस घोषणा ने तीसरी दुनिया में पानी के निजीकरण का रास्ता खोल दिया.

तीसरी दुनिया के देशों पर पानी के निजीकरण का दबाव बनाने के लिए आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इस शर्त के साथ कर्ज देना शुरू किया कि उन्हें संसाधनों पर सरकारी नियंत्रण को कम करना होगा और इसमें बतौर संसाधन पानी भी शामिल था.

भारत में 2002 में बनी नेशनल वाटर पॉलिसी में सरकार ने पानी की आपूर्ति को लेकर अपने रुख में बड़ा बदलाव करते हुए जल संसाधन से जुड़ी परियोजनाओं को बनाने, उसके विकास और प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी का रास्ता खोल  दिया.

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सरकार ने पानी जैसी बुनियादी सेवा के निजीकरण का फैसला वैसे समय में लिया जब भारत में प्रति व्यक्ति आय बेहद कम थी.

ऐसे में पानी जैसी बुनियादी जरूरत का निजीकरण करके सरकार ने एक तरह से डबलिन घोषणा को अपनी मंजूरी दे दी जिसमें साफ कहा गया था कि पानी नागरिकों का मौलिक अधिकार तो है लेकिन उसके इस्तेमाल के लिए उन्हें एक न्यूनतम कीमत भी चुकानी होगी.

बोतलबंद पानी: मिथक और हकीकत

पानी की आपूर्ति की मौलिक जिम्मेदारी से सरकार ने पल्ला झाड़ लिया और इसका नियंत्रण निजी क्षेत्र को दे दिया. पानी के वितरण पर बढ़ता नियंत्रण इसी का नतीजा है जिसकी परिणति बोतलबंद कारोबार है. विज्ञापनों की मदद से लोगों के जेहन में यह धारणा बिठाने की कोशिश की गई कि बोतलबंद पानी न केवल साफ है बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित भी.

सच्चाई यह है कि बोतलबंद पानी के सुरक्षित होने का दावा संदिग्ध है

सच्चाई यह है कि बोतलबंद पानी के सुरक्षित होने का दावा ही संदिग्ध है. सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के एक शोध के मुताबिक भारत में मौजूद अधिकांश ब्रांड के बोतलबंद पानी में कीटनाशकों की मिलावट है. ऐसे कीटनाशक जिन्हें सरकार प्रतिबंधित कर चुकी है और कई मामलों में इनकी मात्रा बेहद खतरनाक स्तर पर पाई गई है.

बोतलबंद पानी में मैलेथियॉन, ऑर्गेनोक्लोरींस, ऑर्गेनोफॉस्फोरस और डीडीटी जैसे कीटनाशकों की मौजूदगी पाई गई जिनके सेवन से पैरालिसिस और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है.

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डिब्बाबंद बोतलों का सबसे अधिक चलन शहरी इलाकों में है. भूजल के गिरते स्तर और प्रदूषण की वजह से शहरी इलाकों में डिब्बाबंद बोतलों के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. शहरी क्षेत्रों में पर्याप्त जागरूकता के बावजूद शहरवासिसयों को सबसे अधिक प्रदूषित पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

डिब्बाबंद बोतल के सुरक्षित होने के दावे की सच्चाई का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है दिल्ली में डिब्बाबंद बोतलों में कीटनाशकों की मात्रा तय मात्रा के मुकाबले 36.4 फीसदी जबकि मुंबई के ब्रांड्स में कीटनाशकों की मात्रा 7.2 फीसदी अधिक पाई गई.

केवल फ्रांस से मंगाई जाने वाली एवियन ब्रांड की बोतल में कोई कीटनाशक नहीं पाया गया. यूरोपीयन इकनॉमिक कमीशन के मानक के मुताबिक पीने वाले पानी में कुल कीटनाशक की मात्रा प्रति लीटर 0.0005  मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए.

निजीकरण से हो रहा नुकसान

पानी का कारोबार लागत और मुनाफे के लिहाज से बेहद आकर्षक है. लागत मामूली होने की वजह से कंपनियों को जबरदस्त मुनाफा होता है लेकिन उसका खामियाजा आम लोगों को उठाना पड़ता है.

मसलन कंपनियां अंधाधुंध तरीके से पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखते हुए जमीन से पानी निकालती हैं. इससे न केवल भूजल का स्तर तेजी से गिरता है बल्कि उसकी गुणवत्ता में भी गिरावट आती है.

बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियों में बिसलेरी, पेप्सिको, कोकाकोला, धारीवाल और पारले जैसी कंपनियां शामिल हैं. पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करने के सबसे अधिक मामले इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी कोका-कोला के खिलाफ है.

निजीकरण और पानी की बोतलबंदी से हो रहा मोटा मुनाफा भारत की बड़ी आबादी को साफ पीने के पानी के बुनियादी अधिकारों से महरुम कर रहा है.

राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीतियों के अभाव में बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन को बेतहाशा निचोड़ रही हैं जिसकी मात्रा सीमित है और जिस पर पहला हक देश के नागरिकों का है.

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First published: 3 April 2016, 11:06 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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