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असम में हुईं 3 साल में 400 हत्याएं, हत्यारा कौन?

अमरज्योति बोरा | Updated on: 1 December 2015, 22:50 IST
QUICK PILL
  • 1998 से 2000 के बीच गुप्त तरीके से राज्य सरकार ने लोगों की हत्याएं करवाईं. उस वक्त राज्य में असम गण परिषद की सरकार थी. सरकार ने उल्फा के सदस्यों के परिवार वालों और उनसे सहानुभूति रखने वालों की हत्या कराई.
  • 2001 में राज्य के चुनाव से पहले कांग्रेस ने इस मुद्दे को उछाला और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने का भरोसा दिया. न्याय तो दूर, कांग्रेस की सरकार अभी तक सैकिया आयोग की सिफारिशों को लागू तक करने में विफल रही है.

असम के कुख्यात गुप्त हत्याकांड में जिंदा बचे एकमात्र सदस्य अनंत कालिटा राज्य सरकार के काम-काज से बेहद हताश हैं. 45 साल के कालिटा को लगता है कि राज्य सरकार वादे के मुताबिक हिंसा में मारे गए परिवारों के लोगों को न्याय दिलाने में विफल रही है. उन्हें लगने लगा है कि यह एक तरह से चुनावी वादा बन कर रह गया है जिसे हर सरकार चुनाव के बाद पहले दोहराती है और बाद में भूल जाती है.

कालिटा उस हत्याकांड में बचे एकमात्र इंसान है जिसमें 400 से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई थी. कई लोगों का आरोप है कि 1998 से 2000 के बीच गुप्त तरीके से राज्य सरकार ने लोगों की हत्याएं करवाईं. उस वक्त राज्य में असम गण परिषद की सरकार थी और सरकार ने उल्फा के सदस्यों के परिवार वालों और उनसे सहानुभूति रखने वालों की हत्या कराई. 2001 में राज्य के चुनाव से पहले कांग्रेस ने इस मुद्दे को उछाला और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने का भरोसा दिया. 

मशहूर पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता अजित कुमार भुयन बताते हैं, "कांग्रेस इस हत्याकांड के पीड़ितों को न्याय दिलाने के वादे के साथ 2001 में सरकार में आई. इसके बाद 2006 और 2011 में भी कांग्रेस ने इस मसले को भुनाया."

असम के मुख्यमंत्री तरुण गगोई ने कहा था कि हत्याकांड के पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरियों में 2 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा

हालांकि वह पीड़ितों को न्याय दिलाने में विफल रही. 7 नवंबर 1998 में अपने पति दिगंता दास को खो देने वाली आरती दास बताती हैं, "हर चुनाव के पहले हमें यह सुनने को मिलता है कि हमें न्याय मिलेगा लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ. हमारी उम्मीद जवाब दे रही है." कांग्रेस ने पीड़ित परिवार के लोगों को सरकारी नौकरी का वादा किया था. 

15 मार्च 2010 को बजट भाषण में असम के मुख्यमंत्री तरुण गगोई ने कहा था कि हत्याकांड के पीड़ित परिवारों के लिए सरकारी नौकरियों में 2 फीसदी का कोटा रखा जाएगा. गगोई के पास उस वक्त वित्त मंत्रालय भी प्रभार था. कालिटा ने कहा, "यह घोषणा 2011 के विधानसभा चुनाव से पहले की गई. मेरे अलावा कई लोगों ने राज्य सरकार से नौकरी के लिए संपर्क किया लेकिन हमें सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला." वहीं कांग्रेस अपने बचाव में कहती है कि वह अपने वादे को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन इसमें समय लगेगा. असम प्रदेश कांग्रेस समिति के प्रवक्ता मेंहदी आलम बोरा कहती हैं, "कांग्रेस सरकार पीड़ित परिवार के लोगों को मुआवजा और न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है."

राज्य समर्थित आतंकवाद

16 सितंबर 1999 की रात कालिटा को एक समूह ने घर से बाहर खींच लिया. दो दिनों बाद उन्हें बिलकुल करीब से गोली मारकर पहाड़ी से धक्का दे दिया गया. हालांकि वह आश्चर्यजनक रूप से बच गए और किसी तरह गुआहाटी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल पहुंचने में सफल रहे. मेडिकल और बैलिस्टिक रिपोर्ट के मुताबिक गोली उनकी खोपड़ी को पार करते हुए बाएं आंख से बाहर निकल गई थी. उनके नर्वस सिस्टम को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ. गोली कुछ मिलीमीटर भी इधर उधर होती तो उनकी जान ले सकती थी. 

कालिटा बताते हैं कि वह किसी भी तरह से उल्फा से जुड़े हुए नहीं थे लेकिन उन्होंने असम गण परिषद की सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर आवाज जरूर उठाई थी. उन्होंने कहा, "बेशक मुझे चोट खानी पड़ी लेकिन मुझे खुशी है कि इससे राज्य में चल रहा सब कुछ सामने आ गया."

1998 से 2000 के बीच हुई हत्याएं नृशंसता के नंगे प्रदर्शन से कम नहीं थी.

उनके काम करने का तरीका कुछ इस तरह थाः कुछ लोग किसी व्यक्ति के घर जाते थे और उसे किसी उल्फा सदस्य को आत्मसमर्पण के लिए समझाने के लिए कहते थे. अगर वो परिवार इससे मना करता या ऐसा करने में विफल हो जाता तो बाद में एक दूसरा समूह वहां जाता था. और फिर इसके बाद जो होता था वह आपके रोंगटे खड़े कर देगा.

कहा जाता है कि असम में प्रफुल्ल महंता सरकार के इशारे पर लोगों की हत्याएं कराई गईं.

भुयन बताते हैं, "वे इसके बाद रात को हथियारबंद दस्ता भेजते थे जिनके चेहरे पर नकाब होता था. वह दरवाजा खटखटाते और लोगों को जगाकर उन्हें घर से बाहर खींच लेते. वह या तो लोगों को वहीं मार देते या फिर उन्हें अपने साथ ले जाते और बाद में उनक हत्या कर दी जाती. उसके बाद उनकी बॉडी को कहीं फेंक दिया जाता."

ऐसा कहा जाता है कि प्रफुल्ल महंता की सरकार के इशारे पर लोगों की हत्याएं कराई गईं. कांग्रेस की तरफ न्याय का भरोसा इन परिवारों के लिए उम्मीद की तरह सामने आया. अब इन लोगों की उम्मीद दम तोड़ने लगी है. नीलिमा बर्मन की त्रासदी को ही ले लीजिए जिनके बेटे की हत्या कर दी गई थी.

नीलिमा बताती हैं, "17 मार्च 2000 को सुबह सवा सात बजे खगेन की हत्या कर दी गई. हथियारबंद लोगों के एक दस्ते ने उसे घर से बाहर निकाला और गोली मारकर उसकी हत्या कर दी. इसके बाद उन्होंने उसकी बॉडी को एक बड़े झोले में डाला और वहां से चले गए."

बर्मन कहती हैं कि वह उन लोगों को सजा मिलते देखना चाहती हैं जिन्होंने इस हत्याकांड को अंजाम दिया. 

जांच रिपोर्ट

जस्टिस खगेंद्र नाथ सैकिया आयोग ने इस हत्याकांड के लिए मुख्यमंत्र प्रफुल्ल महंता और पुलिस के बड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया. कांग्रेस सरकार ने अगस्त 2005 में इस आयोग का गठन किया था. आयोग ने चार खंडों में अपनी रिपोर्ट सौंपी और इसे 15 नवंबर 2007 को सदन के पटल पर रखा गया. 

सैकिया रिपोर्ट के अनुसार, "इस बात के पर्याप्त सबूत है कि तत्कालीन गृह मंत्री ने गैर कानूनी हत्याकांड को अंजाम दिया."

आयोग ने पाया कि हत्याकांड में प्रशासन के अलावा आत्मसमर्पण करने वाले आतंकी और सेना के लोग भी शामिल थे. रिपोर्ट बताती है कि हत्याकांड के मामलों की सही ढंग से जांच भी नहीं की गई. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, "किसी भी मामले में कोई आरोपपत्र नहीं दायर किया गया. हत्यारों ने जिन गाड़ियों का इस्तेमाल किया उनमें रजिस्ट्रेशन नंबर तक नहीं था. जिन इलाकों में हत्याकांड को अंजाम दिया गया वहां पुलिस की पेट्र्रोलिंग थी लेकिन हत्याकांड के पहले और बाद में ही पुलिस वाले मौजूद रहते थे. उस वक्त पुलिस मौजूद नहीं होती थी जब हत्याकांड को अंजाम दिया जाता था."

सैकिया आयोग हत्याओं के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहरा चुका है

पीड़ितों के परिवार वाले और मानवाधिकार कार्यकर्ता यह सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर इस हत्याकांड के लिए अभी तक किसी को भी जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया गया. आरती दास पूछती हैं, "आयोग पहले ही इस घटना के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहरा चुका है तो फिर अभी तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?"

चौतरफा सवालों का सामना कर रहे गगोई ने कहा कि सबूतों के अभाव की वजह से किसी को दोषी साबित करने में परेशानी हो रही है. उन्होंने कहा, "यह सब कुछ तब हो रहा है जब सैकिया आयोग हत्याकांड के लिए असम गण परिषद की सरकार को जिम्मेदार ठहरा चुका है क्योंकि जो हुआ वह सरकार के बिना समर्थन के नहीं हो सकता था."

तीन चुनावों में कांग्रेस ने पीड़ितों को न्याय दिलाने का वादा किया, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका है. असम कांग्रेस गगोई का बचाव करते हुए कहती है कि असम गण परिषद की सरकार ने इस मामले की जांच की दिशा में भी कोई कदम नहीं उठाया. 

कांग्रेस के प्रवक्ता बोरा बताते हैं, "तब की सरकार ने शफीकुल हक आयोग का गठन किया था लेकिन उसका गठन केवल अनंत कालिटा की हत्या की कोशिश की जांच के लिए किया गया था. आयोग ने दूसरे मामले की जांच की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया. उसके बाद हमने केएन सैकिया आयोग का गठन किया."

गगोई के बयान का बचाव करते हुए बोरा ने कहा कि किसी को दोषी ठहराना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि पूरी सरकार इस हत्याकांड में शामिल थी और सब कुछ पहले से निर्धारित योजना के तहत हुआ. 

सैकिया आयोग ने कई सिफारिशें की जिसे अभी तक नहीं लागू किया जा सका है. मसलन आयोग ने सेना, पुलिस और केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के एकीकृत कमान को भंग करने की सिफारिश की. आयोग ने पीड़ित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिए जाने की सिफारिश भी की. लेकिन सरकार ने किसी भी सिफारिश को लागू नहीं किया. हालांकि सरकार ने आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया. 

First published: 1 December 2015, 22:50 IST
 
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