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Section 377: इस वकील ने समलैंगिकों के अधिकार के लिए 20 साल तक लगाए कोर्ट के चक्कर

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 September 2018, 14:56 IST

धारा 377 को खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के ऐतेहासिक फैसले से LGBT समुदाय में ख़ुशी की लहर है. देश भर में LGBT समुदाय ने इस फैसले के बाद जश्न मनाया. अब उन्हें कोई भी अपराधी नहीं कहेगा. लेकिन इस बड़ी जीत के पीछे उस व्यक्ति का सबसे ज्यादा योगदान है जिसने अपने जीवन के 20 साल इस इंसाफ की लड़ाई के लिए कुर्बान कर दिए.

धारा 377 को लेकर एक NGO यानी गैर सरकारी संगठन नाज़ फाउंडेशन ने समलैंगिकों के अधिकारों के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी. और नाज़ फाउंडेशन का केस लड़ने वाले वकील का नाम आनंद ग्रोवर है. नाज़ फाउंडेशन ही वो संगठन है जिसने 2013 में समलैंगिकता को अपराध घोषित करने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी.

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न्यूज़ 18 से बात करते हुए आनंद ग्रोवर ने कहा कि वो समलैंगिकों के अधिकारों के लिए पिछले 20 साल से लड़ाई लड़ रहे हैं. मेरे मन में कभी भी कोई संदेह नहीं था कि ये लड़ाई हम नहीं जीत पाएंगे."

ग्रोवर का मानना है कि वास्तव में ये लड़ाई केवल एचआईवी पॉजिटिव लोगों से भेदभाव को लेकर थी. इस मामले में उन्होंने कहा, '' एचआईवी पॉजिटिव लोगों से भेदभाव को रोकने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में मैंने एक याचिका दायर की थी.''

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ग्रोवर ने बताया कि इस लड़ाई की शुरुआत 1998 में हुई. उन दिनों के अपने अनुभवों को साझा करते हुए ग्रोवर ने कहा, ''उन दिनों हम लोग एचआईवी पर बहुत सारा काम कर रहे थे. हम इस बात के लिए लड़ रहे थे कि किसी भी एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति से नौकरी के दौरान कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. एचआईवी 'समलैंगिक यौन संबंध' से जुड़ा हुआ था ऐसे में हमारे पास 'गे सेक्स' के कई लोगों ने संपर्क करना शुरू कर दिया.''

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पुलिस भी करती थी ब्लैकमेल

इस लड़ाई में आने वाली परेशानियों को साझा करते हुए ग्रोवर ने कहा, '' कई तरह के मामले सामने आए. पुलिस इस तरह के लोगों से ब्लैकमेल करती थी. समलैंगिक पुरुषों को ठीक करने के लिए इलेक्ट्रिक थेरेपी का सहारा लिया जाता था. हम ये जानना चाहते थे कि ये सब क्यों हो रहा था और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि धारा 377 ही इसकी जड़ है. हमें पता चला कि दिल्ली में नाज़ फाउंडेशन भी इस पर काम कर रहा था. इसलिए हमने 2001 में नाज़ फाउंडेशन की तरफ से याचिका दायर की."

 

मीडिया की वजह से हुआ फायदा

ग्रोवर कहते हैं की अदालतों में पहले किसी मामले की सुनवाई के लिए काफी इन्तजार करना पड़ता था. पहले मामले की लिस्टिंग की जाती थी उसके बाद ही कही सुनवाई का प्रोसेस शुरू होता था. लेकिन बाद में मीडिया ने इस मुद्दों को उठाना शुरू कर दिया. जिसके बाद उन्हें काफी फायदा मिला.

First published: 6 September 2018, 14:56 IST
 
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