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Section 377: अदालतों में चल रहे 4,690 मामले एक झटके में ऐसे ख़त्म हो गए

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 September 2018, 15:41 IST
(PTI )

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 2014 और 2016 के बीच धारा 377 के तहत 4,690 मामले दर्ज किए गए थे. 1861 में लागू यह कानून जो प्रकृति के विपरीत यौन गतिविधियों को अपराध मानता था. यह वयस्कों के बीच समलैंगिक यौन संबंधों के लिए भी लागू होता था. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को धारा 377 के तहत निजी तौर पर वयस्कों के बीच यौन संबंधों को गैर आपराधिक करार दिया.

जिसके बाद इस धारा के तहत चल रहे 4,690 मामले अस्वीकार हो जायेंगे. एनसीआरबी 2014 से इस खंड के तहत बुक किए गए मामलों की रिपोर्ट कर रहा है. 2014 और 2015 के बीच, धारा 377 के तहत पंजीकृत मामलों की संख्या 17% से बढ़कर 1,347 हो गई. 2016 में यह 62% से 2,195 तक पहुंच गया, जिसमें से इन सभी मामलों में से 178 नाबालिगों के खिलाफ पंजीकृत थे.

 

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश 2016 में पंजीकृत 999 मामलों के साथ सूची में सबसे ऊपर है. इसके बाद केरल में (207 मामले), दिल्ली (183 मामले) महाराष्ट्र (170 मामले) शहरों में दिल्ली में सबसे ज्यादा मामले (168) थे. इसके बाद लखनऊ (77 मामले) और मुंबई (51 मामले) थे.

समलैंगिक यौन संबंध को कम करना एक समान बराबर समाज बनाने की दिशा में पहला कदम है. भारतीय समलैंगिक और लेस्बियन सशक्तिकरण मिशन (एमआईएनईएलई) द्वारा 2016 के एक सर्वेक्षण में पता चला कि पांच एलजीबीटी कर्मचारियों में से एक कार्यस्थल पर भेदभाव किया गया था. 2014 की विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि समुदाय के कलंक और बहिष्कार के कारण भारत 31 अरब डॉलर खो देता है.

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First published: 7 September 2018, 15:36 IST
 
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