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यशवंत सिन्हा: मीडिया के एक ख़ास धड़े ने कश्मीर मसले को बहुत नुकसान पहुंचाया है

सादिक़ नक़वी | Updated on: 28 December 2016, 8:01 IST
(फ़ाइल फोटो )

कश्मीर घाटी में इस साल पिछले कुछ सालों के मुकाबले ज्यादा अशांति रही. खासकर जुलाई में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद से. पाकिस्तान के सहयोग से सीमा पार से हो रही लगातार आतंकी गतिविधियों ने यहां के हालात और विकट बनाए. लंबे समय तक कर्फ्यू रहने के बाद, साल के अंत में अब जाकर हालात कुछ सामान्य बने हैं.

पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपने स्वतंत्र शिष्टमंडल के साथ घाटी का दो बार दौरा किया. शिष्टमंडल में शिक्षा, मीडिया, पत्रकारिता और नौकरशाही से जुड़े लोग थे. सिन्हा का कहना है कि वहां के हालात नाजुक हैं. शांति स्थाई नहीं रह सकेगी. वे यह भी कहते हैं कि कश्मीर का सबसे ज्यादा नुकसान मीडिया के एक खास वर्ग ने किया है.

सवाल-जवाब

घाटी में दोनों दौरों के दौरान आप किनसे मिले?

पहली दफा हम श्रीनगर के लोगों से मिले. जो दरवाजे सरकार द्वारा भेजे गए सर्वदलीय संसदीय शिष्टमंडल के लिए भी नहीं खुले थे, उन्होंने हमारे लिए खोले. हम श्रीनगर में तीन दिन से ज्यादा रहे और कई संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों से मिले. पर घाटी में और कहीं नहीं जा सके थे.

दूसरी दफा, हम शोपियां, बारामुला और अनंतनाग गए. बाकी समय हम श्रीनगर के संगठनों से मिले, जिनसे पिछली बार नहीं मिल पाए थे.

जब हम पहली दफा गए, कश्मीरी पंडितों के शिष्टमंडल से मिले, जो अब भी घाटी में रहते हैं. दूसरी दफा, हम शिया नेताओं और उनके धार्मिक मुखिया आगा साहब से मिले. हम गुरुद्वारा भी गए और पूरी घाटी के सिख समुदाय से मिले. दोनों दौरों के लिए समान एजेंडा था, पर दोनों बार हमने अल-अलग लोगों से बात की.

इन दौरों से आपको क्या हासिल हुआ? 

कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ है कि हम इच्छा-अनिच्छा, जाने-अनजाने घाटी में लोगों से बात करने में सफल रहे. पिछले काफी समय से घाटी में अशांति रही है. 2008 और 2010 में भी रही थी पर इस बार की अशांति अलग थी. ज्यादा लंबे समय चली. 6 महीने हो रहे हैं. सुरक्षा बलों के साए में हर रोज जीना तकलीफदेह एहसास है. 

दूसरी बात यह है कि यहां के हालात पर ज्यादातर युवाओं का नियंत्रण रहा. बहुत कम उम्र के युवाओं का. उन्होंने अपने ऊपर इसकी जिम्मेदारी ली, शर्तें निर्धारित कीं, और किसी की भी बात सुनने से इनकार कर दिया. वहां का स्थापित नेतृत्व अप्रासंगिक हो चुका है. उन्हें केवल युवाओं की बात सुननी है, उन पर नियंत्रण नहीं कर सकते. हम जिनसे भी मिले, सभी ने एक ही बात दोहराई.  

आखिर क्या कहानी है?

सीधी सी बात है. वे कहते हैं, हमारे साथ विश्वासघात हुआ है, हमने उनके साथ भेदभाव किया है. कहानी 1947 से शुरू होती है. वे महसूस करते हैं कि विलय सशर्त था. कई मामलों में, पदग्रहण में महाराजा ने भारत को तीन क्षेत्रों में अधिकार दिए-विदेश नीति, रक्षा और संचार-और इसका काफी हिस्सा धारा 370 में शामिल किया गया था. 

फिर भी पिछले कुछ वर्षों में धारा 370 को काफी कमजोर किया गया है और बार-बार किया गया है. हमने ही किया है. इस तरह जो स्वायत्तता उन्हें मिली हुई थी, छीन ली गई. संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक जनमत-संग्रह होना चाहिए था. वे यह नहीं कहते कि जनमत-संग्रह क्यों नहीं हुआ. जनमत-संग्रह की यह मांग अब ‘आजादी’ की पुकार बन गई है. और युवा इस मामले में कट्टर हैं कि आजादी से कम कुछ नहीं होना चाहिए. 

दूसरा, वे भेदभाव के बर्ताव से त्रस्त हैं. वे इसके कई उदाहरण देते हैं. कहते हैं, ‘हमारे साथ बाकियों के मुकाबले ज्यादा कठोरता से पेश आते हैं. हिंसा का जवाब हिंसा से दिया गया. कश्मीर में पैलेट बंदूकें इस्तेमाल की गईं. यह बहुत बड़ा भावोत्तेजक मुद्दा बन गया है क्योंकि हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक या कहीं और इस तरह के मामलों में कश्मीर की तरह पैलेट बंदूकों का इस्तेमाल नहीं किया. 

उनसे अब सहन नहीं होता. वे तुरंत नतीजे चाहते हैं. व्यक्तिगत उदाहरणों का सामान्यीकरण कर रहे हैं मानो पूरे कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों.

इसका कोई उदाहरण?

पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को पहचान पत्र देना हाल ही का मसला है. एक कानून है, जिसके मुताबिक बाहर का कोई भी व्यक्ति राज्य का नागरिक नहीं बन सकता. और सरकार कह रही है कि वह उन्हें पहचान पत्र इसलिए दे रही है ताकि वे जम्मू कश्मीर में नहीं, बल्कि अर्धसैनिक बल सहित और कहीं काम की तलाश कर सकते हैं.

पर इसे इतना गलत समझा गया कि इंजीनियर रशीद ने इस ठंड में पूरी रात मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठने का फैसला किया. क्या हुआ, इसकी जानकारी नहीं दी जाती है. सच हार जाता है और झूठ अक्सर जीत जाता है. यह बहुत ही गंभीर और मुश्किल स्थिति है. 

हालात अब सामान्य हो गए लगते हैं...

अभी सतही तौर पर शांति है. वैसे हालात काफी सामान्य हो गए हैं, दुकानें खुल गई हैं, परीक्षाएं हुई थीं, स्कूल फिर से खुल गए, यातायात शुरू हो गया है, यहां तक कि कुछ पर्यटक श्रीनगर पहुंच गए हैं. पर यह बहुत ही अस्थाई शांति है. कोई नहीं जानता कि यह शांति कब तक टिकेगी. 

लोगों से मिलते समय हमने एक बात महसूस की कि हालांकि यह बहुत ही मुश्किल घड़ी है, जिसका हल असंभव लगता है, फिर भी उम्मीद है. अगर हम स्टेकहोल्डर्स से बात करें. भाजपा-पीडीपी के गठबंधन के एजेंडे के मद्देनजर बातचीत की शुरुआत क्यों नहीं करते? जम्मू-कश्मीर में सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करने का यह सबसे सही समय है. 

सभी स्टेकहोल्डर्स मतलब अलगाववादी भी?

हां, गठबंधन के एजेंडे में अलगाववादी भी शामिल हैं.

सरकार उनसे बात क्यों नहीं करना चाहती?

मैं नहीं बता सकता. शायद इसलिए क्योंकि पाकिस्तान की मदद से सीमा पार आतंक की घटनाओं से हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए थे. पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के खराब माहौल से फायदा उठाना चाहता है, और इन विभिन्न घटनाओं के लिए जिम्मेदार है.

उनकी रक्षा के लिए हमने सुरक्षा बल लगभग सभी जगह तैनात किए हैं. रोजाना सुरक्षा बलों के साए में जीना बड़ा तकलीफदेह अहसास है. यह अच्छी फीलिंग नहीं है.

खबर है कि कई स्थानीय युवाओं ने हाथों में हथियार ले लिए हैं और राज्य-विरोधी हिंसक संगठनों से जुड़ गए हैं...

सरकारी स्रोतों के अनुसार कुछ ऐसे संगठन हैं. हमें भी बताया गया कि दो तरह के आतंकी हैं. एक विदेशी, जिन्हें पाकिस्तान का साथ है और दूसरे स्थानीय. स्थानीय आतंकी पूरे प्रशिक्षित नहीं हैं. वे ज्यादा लड़ नहीं पाते हैं और मारे जाते हैं. घाटी के असंतोषजनक माहौल से पाकिस्तान फायदा उठा रहा है. युवा बहुत जल्दी भटक जाते हैं. पाकिस्तान के समर्थन से कश्मीर में हो रही आतंकी गतिविधियों को अलग नजरिए से देखने की आवश्यकता है.

मैंने कई संगठनों से कहा कि अगर उन्हें हमसे कोई परेशानी है, तो द्विपक्षीय विचार करना चाहिए. तो मैं जब बातचीत की बात कह रहा हूं, तो मैं जम्मू-कश्मीर के स्टेकहोल्डर्स और भारत सरकार के बीच संवाद की बात कर रहा हूं. 

मैं अब भी इस बात पर कायम हूं कि जब तक पाकिस्तान अपने वादे पर टिका रहता है और अपने देश से भारत के विरुद्ध आतंकियों को नहीं भेजता है, हमें पाकिस्तान से बात नहीं करनी चाहिए. मैं उनसे सहमत नहीं हूं कि बात त्रिपक्षीय या त्रिकोणीय करनी चाहिए. अगर हमारे कश्मीरी मित्र पाकिस्तान के साथ बात करना चाहते हैं, तो वे खुल कर सामने आएं और पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध खड़े किए गए आतंकियों का विरोध करें. 

कश्मीर की कवरेज को लेकर मीडिया के बारे में क्या कहेंगे?

कश्मीर में भारतीय मीडिया को बेहद नफरत से देखा जाता है. कश्मीरी मानते हैं कि भारतीय मीडिया, खासकर कुछ चैनल हर कश्मीरी को पाकिस्तानी एजेंट और आतंकी बता रहे हैं, और कश्मीर में जो हो रहा है, उसकी बिलकुल गलत जानकारी दे रहे हैं.

उनकी मीडिया से शिकायत अधिकारियों से भी ज्यादा तीखी है. मीडिया की इस तरह की बयानबाजी से शांति की उम्मीदों को काफी नुकसान हुआ है.

क्या श्रीनगर और अन्य जिलों के मोहभंग के स्तर में अंतर था?

अन्य जिलों में लोग और भी रूखे थे. मसलन युवाओं ने हमें कहा कि एक बड़ा योगदान जो भारत ने किया है, वह यह कि उन्होंने हमारे मनों से डर निकाल दिया. कश्मीरी युवा अब मौत की परवाह नहीं करते.

यह तो बहुत ही भयानक स्थिति है...

हां है.

तब क्या किया जाए?

संवाद. केवल यही रास्ता है.

क्या सरकार बात करेगी?

नहीं मालूम. हमें केशिश करते रहना होगा. यह बड़ी त्रासदीपूर्ण स्थिति है. जो बहस 1960 में चल रही थी, वही बहस आज भी चल रही है. आप 1960 के जय प्रकाश नारायण का लेखन और भाषण पढ़ें, खासकर 1965 के युद्ध के बाद का, आप पाएंगे कि उन्होंने वही मुद्दे उठाए थे, जो आज हम उठा रहे हैं. 

यह सबसे गंभीर शिकायत है: हमने जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक समस्या और मुद्दों को 70 साल से क्यों लटका रखा है? इसलिए सभी लोग समस्या को सुलझाने की मांग कर रहे हैं.

क्या भाजपा के गठबंधन में होने से स्थानीय लोग चौकन्ने हैं...इसलिए कि पार्टी का एक वर्ग धारा 370 को हटाने की मांग कर रहा है.

लोगों को गठबंधन के एजेंडे में यकीन करना होगा. और सरकार को भी आश्वस्त करना होगा कि गठबंधन का एजेंडा लागू है. मैंने पहले भी गठबंधन के एजेंडे के बारे में बात की है: संवाद. इसलिए उसे ही आगे बढ़ाना चाहिए. गठबंधन का एजेंडा भी यही कहता है कि धारा 370 में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. यह राजनीतिक दस्तावेज है.

भाजपा ने खुद ने धारा 370 में हस्तक्षेप नहीं करने का वचन दिया था. इसलिए कोई कुछ भी कहे, यहां लिखित दस्तावेज है, जो इसका आश्वासन देता है. मुझे विश्वास है, भाजपा के नेतृत्व ने सभी बातों पर विचार किया होगा. और हालात की समग्रता के मद्देनजर, गठबंधन में खासतौर से ये दो आश्वासन दिए जाएं-संवाद और धारा 370. 

क्या कश्मीर के हालात को सही ढंग से नहीं संभाला गया? इससे अलगाववादी ज्यादा प्रासंगिक बन गए है?

मेरे खयाल से अलगाववादी हमेशा से यहीं थे. हम उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते. कर सकते तो वे अब तक अप्रासंगिक हो जाते. उनकी अपनी कहानी है; उस कहानी से कोई सहमत हो या नहीं. पर इसी वजह से हमें उन्हें संवाद में शामिल करना है.

सभी संगठनों के साथ बातचीत में मैंने कहा था कि तथ्यों को लेकर भिन्नता नहीं हो सकती. संवाद की शुरुआत दस्तावेजों से पुष्ट तथ्यों या पुन:स्थापित तथ्यों से होनी चाहिए, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सके. यही सबसे महत्वपूर्ण है. बेशक उनमें विभिन्न तथ्यों को लेकर काफी भ्रांतिया हैं. इसलिए उनका स्पष्टीकरण जरूरी है. यह आपसी संवाद से ही संभव है.

क्या यूपीए-2 की संभाषी रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं करना गलती थी? 

बड़ी गलती थी. आप पहल करते हैं, उम्मीदें जगाते हैं, और फिर उसे लागू नहीं करते हैं, तो उम्मीदें टूटती हैं और कुंठाएं जन्म लेती हैं.

इसीलिए हम, बतौर जिम्मेदार नागरिक, सभी को बेबाकी से कह रहे थे कि हमें किसी ने प्रायोजित नहीं किया है, सरकार की ओर से नहीं भेजे गए हैं. फिर भी कुछ उम्मीदें जगी हैं और मैं आशा करता हूं कि वे फिर से नाउम्मीद नहीं होंगे.

First published: 28 December 2016, 8:01 IST
 
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