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बस्तर: आदिवासियों के घरों से सुरक्षा बलों को दूर रखने की सिफारिश

राजकुमार सोनी | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
QUICK PILL
  • माओवाद प्रभावित बस्तर के बीजापुर और सुकमा जिले में 40 आदिवासी महिलाओं के साथ कथित दुष्कर्म और लूटपाट के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने गंभीर टिप्पणी करने के साथ सरकार को सुरक्षा दस्तों को आदिवासियों के घरों से दूर रखने की बात कही है.
  • आयोग ने सुरक्षाबलों को आदिवासी संस्कृति एवं परंपरा को समझने की नसीहत भी दी है. सुरक्षाबलों द्वारा मुर्गियां, बकरियां, चावल, गहने और पैसे लूटने की शिकायतों पर आयोग ने कहा है कि तलाशी अभियान के दौरान जवानों को पर्याप्त मात्रा में रसद प्रदान किया जाना चाहिए. 

बीजापुर और सुकमा जिले में 40 महिलाओं से दुष्कर्म के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने गंभीर टिप्पणी की है.

माओवाद प्रभावित बस्तर के बीजापुर और सुकमा जिले में 40 आदिवासी महिलाओं के साथ कथित दुष्कर्म और लूटपाट के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने गंभीर टिप्पणी करने के साथ सरकार को सुरक्षा दस्तों को आदिवासियों के घरों से दूर रखने की बात कही है. आयोग ने कहा है कि तलाशी अभियान के दौरान सुरक्षा बलों के दस्ते गांवों में ठहरते हैं.

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उनके आने की खबर पाते ही पुरुष मारपीट के डर से गांव से भाग जाते हैं तब घर में महिलाएं और बच्चे ही रह जाते हैं. सुरक्षा बलों के लोग उनके घरों पर रहते हैं तो मारपीट, छेड़छाड़ और दुष्कर्म के आरोप लगते हैं इसलिए सरकार की तरफ से किसी भी सूरत में सुरक्षा दस्तों को आदिवासियों के घरों से दूर रहने के निर्देश जारी किए जायं.

आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव, सहायक निदेशक आरके दुबे, अनुसंधान अधिकारी दीपिका खन्ना ने बीते तीन और चार अप्रैल को बीजापुर और सुकमा जिले का दौरा कर बस्तर के मामलों की स्वतंत्र शोधकर्ता बेला भाटिया, अधिवक्ता शालिनी गेरा, सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी और पीडि़त महिलाओं से बातचीत की थी.

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आयोग के सदस्य महिलाओं के साथ मारपीट और दुष्कर्म की घटनाओं में पुलिस की जांच को नाकाफी मानते हुए सीआईडी जांच की मांग पहले ही कर चुके हैं. अभी हाल के दिनों में 15 पेज एक रिपोर्ट जारी कर आयोग ने गंभीर टिप्पणियों के साथ कई अनुशंसाएं भी की है.

महिला पुलिस रहेगी साथ तो रुकेगा यौन उत्पीडन

आयोग ने माना है कि माओवादियों की तलाशी के दौरान राज्य एवं सुरक्षाबलों के बीच यदि महिला पुलिसकर्मियों को साथ रखा जाएगा तो यौन अपराधों की संभावना कम रहेगी. आयोग ने तथ्यों के आधार पर यह भी माना है कि वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों पर ठीक-ठाक नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं इस वजह से विचलित कर देने वाली घटनाएं हो रही है.

आयोग ने सुरक्षाबलों को आदिवासी संस्कृति एवं परंपरा को समझने की नसीहत भी दी है. सुरक्षाबलों द्वारा मुर्गियां, बकरियां, चावल, गहने और पैसे लूटने की शिकायतों पर आयोग ने कहा है कि तलाशी अभियान के दौरान जवानों को पर्याप्त मात्रा में रसद प्रदान किया जाना चाहिए. 

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केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों को खुराक भत्ते के नाम पर 2400 रुपए और राज्य पुलिस के जवानों को 600 रुपए मासिक दिया जाता है. इसे एक समान करने की जरूरत है.

इसके अलावा आयोग ने यह माना है कि पुलिस ने महिलाओं के साथ उत्पीड़न के मामले में सुरक्षाबल के सदस्यों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने में देरी की और उन पर अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धाराओं को लगाने में कोताही बरती है.

क्या है आदिवासी महिलाओं के यौन शोषण का मामला

माओवाद उन्मूलन के अभियान में लगे सुरक्षा बलों ने बीजापुर जिले के पेग्डापल्ली, चिन्नागेलूर, पेगेलूर, गुंडेम और बुर्गीचेरु गांव में एक नाबालिग बालिका और मट्टेपाडा की एक गर्भवती आदिवासी महिला को पानी में डुबाकर दुष्कर्म किया था.

19 अक्टूबर 2015 से 24 अक्टूबर 2015 के बीच सुरक्षाबलों ने कुछ गांव की महिलाओं को माओवादी बताते हुए उनके साथ अमानवीय तरीके से यौन शोषण किया था. आदिवासी महिलाओं के सथ हुई इस यौन हिंसा के दौरान सुरक्षाबलों का यह तर्क था कि जो महिला माओवादी बनती है वह शादी-ब्याह नहीं करती और उनके स्तनों से दूध नहीं आता.

सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया और कुछ अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दबाव के बाद पुलिस ने आदिवासी महिलाओं के साथ यौन हिंसा की शिकायत दर्ज तो कर ली थी लेकिन इस मामले में अब तक राज्य और केंद्रीय सुरक्षाबल के किसी भी सदस्य की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है.

इसी मामले की जांच के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की टीम ने संबंधित गांवों का दौरा किया और पीड़ित महिलाओं से बातचीत की.

First published: 19 May 2016, 9:45 IST
 
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