Home » इंडिया » See the other face of Jawahar Bagh tragedy by the victims
 

जवाहरबाग को सिर्फ पुलिस नहीं एक बार बंधकों (पीड़ितों) की नज़र से भी देखें...

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

ये कहानी उसी ब्रजभूमि की है जहां प्रचलित कथा के अनुसार कंस ने कभी देवकी और वासुदेव को कैद कर के उनके बच्‍चों को मारने की साजि़श रची थी. उस कहानी में सुख इतना भर था कि देवकी व वासुदेव जेल में साथ बंद थे और कृष्‍ण व बलराम को यशोदा का आंगन मिल गया था. 

कहानी का आधुनिक संस्‍करण कुछ यूं है: मां एटा में है, पिता आगरे में, बच्‍चे फिरोज़ाबाद में और बच्‍चों की बूढ़ी दादी वृंदावन में. क्‍या 13 साल और क्‍या 70 साल की उम्र, सभी जेल में कैद हैं. जो जेल में नहीं हैं, उन्‍हें अस्‍पताल के बिस्‍तरों से ही हथकड़ियां लगा दी गई हैं.

मथुरा के जवाहरबाग में दो जून, 2016 की शाम हुई गोलियों की बारिश ने सैकड़ों परिवारों को तोड़ दिया है. शहर के लोग उस दिन की घटना का प्रसारण अखबार और टीवी में देखकर अब तक यही कह रहे हैं कि सरकारी ज़मीन पर दो साल से 'कब्‍ज़ा' जमाए लोग उपद्रवी थे, आततायी थे, नक्‍सली थे, आतंकी थे, जो खुद को ''सत्‍याग्रही'' कहते थे.

मथुरा कांड: जवाहर बाग से रॉकेट लॉन्चर बरामद

हकीकत यह है कि इनमें अधिकतर बेहद सामान्‍य, ग्रामीण और मासूम लोग थे जो छोटी-छोटी मन्‍नतों को मानकर और भावनाओं में बहकर यहां चले आए थे. उनकी दिमागी ट्रेनिंग तो यही थी कि यह सरकार अपनी नहीं है, लेकिन दिल से उन्‍होंने ऐसा तब माना जब उनकी देह को सरकार की गोली भेद गई.

औलाद की आस में गंवाया पति

संतानहीन विमला (38) और उसके पति जयप्रकाश (42) को आज से दस साल पहले किसी ने सलाह दी थी कि बच्‍चे के लिए मन्‍नत मांगने वे जय गुरुदेव के यहां जाएं. वे 2006 से मथुरा आते रहे थे. संतान प्राप्ति के लिए विमला का इलाज भी यहीं से शुरू हुआ. मथुरा के निकट पलवल से उसकी दवा नियमित चल रही थी.

मथुरा कांड के बाद बीजेपी और बसपा ने जमीन कब्जे को बनाया चुनावी मुद्दा

जब 2012 में जय गुरुदेव का देहांत हुआ, तो यह दंपत्ति हमेशा के लिए गांव लौट गया. दो साल बाद 2014 में जय गुरुदेव के बौद्धिक शिष्‍य और अनुयायियों के शब्‍द में कहें तो ''प्रणेता महोदय'' रामवृक्ष यादव ने जब यह उद्घाटन किया कि गुरु को उन्‍हीं के मथुरा वाले आश्रम में बंधक बनाकर रखा गया है और वे मरे नहीं हैं, तो पुराने अनुयायियों की भावनाएं दोबारा जाग गईं.

विमला अपने पति के संग जत्‍थे में निकल पड़ी और सब के साथ 2014 में मथुरा के जवाहरबाग पहुंची. वहां से अपने घर बक्‍सर इनका आना-जाना लगा रहा. दवा भी चलती रही. बीती 25 अप्रैल को जयप्रकाश की मां का जब निधन हुआ, तो ये दोनों घर चले गए. वहां क्रियाकर्म आदि करने के बाद वे 9 मई को मथुरा वापस आए थे. इसके बाद की कहानी इतिहास बन चुकी है.

वृंदावन के 100 शैया वाले राजकीय अस्‍पताल की इमरजेंसी में चार अन्‍य घायलों के साथ भर्ती विमला अपने पति की याद में रह-रह कर चिहुंक उठती है. उसका एक पैर टूटा हुआ है. उसे न तो अपने प्रणेता महोदय की, न ही अपने पति की कोई ख़बर है, लेकिन उसका बताया एक तथ्‍य मीडिया में इस बहुप्रचारित रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाता है कि 19 शवों के पोस्‍ट-मॉर्टम में किसी के भीतर से कोई गोली बरामद नहीं हुई.

कहां गई रमाशंकर की लाश?

विमला को पहले आगरा के मेडिकल कॉलेज ले जाया गया था. उसके बाद वहां से रेफर किए जाने पर वृंदावन लाया गया है. पुलिस की गोलियों से हुई मौत पर वह केवल एक व्‍यक्ति के बारे में बताती है जो उसका परिचित था और साथ में भर्ती था. 

उसके मुताबिक रमाशंकर को पुलिस की गोली लगी थी और आगरे के अस्‍पताल में ही उसने दम तोड़ दिया (देखें वीडियो). वह और कोई मामला गोली से मौत का नहीं जानती, लेकिन यह इकलौता मामला ही पुलिस की मृतक सूची व उनकी पोस्‍टमॉर्टम की रपोर्टों को संदेह के घेरे में ला देता है.

मथुरा के एसएसपी और डीएम ने सात जून को एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में बताया था कि मारे गए 19 लोगों की पोस्‍ट-मॉर्टम रिपोर्ट में सामने आया है कि 12 की मौत जलने से हुई जबकि 7 की मौत लाठी और पत्‍थर की चोट से हुई. उनका दावा था कि इनमें से किसी के शरीर से गोली बरामद नहीं हुई. 

मथुराकांड: सियासत और प्रशासन के गंदे गठजोड़ में गई पुलिस अधिकारियों की जान?

यदि वास्‍तव में ऐसा है, तो सवाल उठता है कि क्‍या विमला के बयान में आया रमाशंकर मृतकों की सरकारी सूची में शामिल नहीं है? क्‍या रमाशंकर का पोस्‍ट-मॉर्टम नहीं हुआ? क्‍या पोस्‍ट-मॉर्टम में गोली शरीर से गायब हो गई? या फिर उसकी लाश को कहीं ठिकाने लगा दिया गया? विमला का यह बयान मथुरा के प्रशासन के दावे पर एक गंभीर सवाल है.

कुछ और सवाल

आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज की खण्‍डहर होती घड़ी वाली भुतहा इमारत की दूसरी मंजि़ल पर तीन पोस्‍ट-ऑपरेटिव वॉर्ड में जवाहरबाग कांड के तीन घायल भर्ती हैं. इनमें एक रामपुर निवासी विजयपाल सिंह के पैर में गोली लगी है. दूसरे बुजुर्ग कन्‍नौज के कंचन सिंह हैं जिनका पैर लाठी की मार से टूटा है. तीसरे व्‍यक्ति का भी पैर टूटा हुआ है.

तीनों के दूसरे साबुत पांव को बिस्‍तर के साथ हथकड़ी से बांधा गया है. हथकड़ी के बारे में पूछे जाने पर वहां ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी महेश चंद्र कहते हैं कि मथुरा पुलिस इन्‍हें ऐसे ही लेकर यहां आई थी, वे तो बस ड्यूटी बजा रहे हैं. 

तीनों की तस्‍वीर के लिए पुलिसवाले पहले तो मना करते हैं, फिर जिच करने पर अधिकारी सिपाही को आदेश देता है, ''थोड़ी देर के लिए हथकड़ी खोल दो.'' वे हथकड़ी लगी हुई तस्‍वीर नहीं खींचने देते.

बातचीत में विजयपाल बताते हैं कि दो जून की घटना में पुलिस एक तरफ़ से आग लगाते हुए आगे बढ़ रही थी और जो भी गोली या लाठी की मार से गिर रहा था, उसे आग में डालती जा रही थी. 

बिलकुल यही बात वृंदावन में भर्ती हजारीलाल गुप्‍ता (कनपटी में लगी गोली से घायल) और कौशल किशोर भी कहते हैं. इन सभी मरीज़ों को न तो पुलिसवालों के मारे जाने की ख़बर है, न ही घटना के दूसरे पहलुओं की.

गुरु कहते थे कि झंडा आगे कर दो, कोई तुम्‍हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. ''हमने झंडा दिखाया, तो गोली लग गई.

इन घायलों को निकालने के बाद सीधे हथकड़ी लगाकर अस्‍पताल लाया गया है. अब भी रामवृक्ष यादव और आज़ाद हिंद सेना की तमाम सिखायी हुई बातों में विजयपाल को यकीन है. यह स्थिति अपेक्षाकृत अधेड़ घायलों में ज्‍यादा है, लेकिन कुशीनगर के बुजुर्ग दयाशंकर इनमें अपवाद हैं.

यूपी पुलिस: मथुरा कांड का मुख्य आरोपी रामवृक्ष यादव मारा गया

वृंदावन की इमरजेंसी में भर्ती दयाशंकर 87 साल के हैं. गांव में इनके पास तीन एकड़ जमीन है. भरा-पूरा परिवार है, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस यानी इनके मुताबिक जय गुरुदेव में गहरी आस्‍था के कारण वे उनसे बरसों से जुड़े हुए हैं. आज उनकी आस्‍था डगमगा चुकी है. 

वे कहते हैं कि गुरु ने ''हमें धोखा दिया''. कैसा धोखा? गुरु कहते थे कि झंडा आगे कर दो, कोई तुम्‍हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. वे बोले, ''हमने झंडा दिखाया, तो गोली लग गई.'' लगभग साठ के पार के तमाम बुजुर्ग इस मोहभंग और सदमे की स्थिति से गुज़र रहे हैं, लेकिन दयाशंकर जैसा साहस और साफ़गोई हर जगह नहीं है.

मेरे बेटा-बहू को मिला दो

इन सबके बीच सबसे विचित्र स्थिति 70 वर्षीय रामसिंगारी देवी की है, जिनको कोई खास गंभीर चोट नहीं आई है लेकिन लाठी की मार से हाथ फट गया है. वे भी वृंदावन में भर्ती हैं. पहले इन्‍हें भी आगरा ले जाया गया था. 

वे देखते ही अचानक उठ कर हाथ जोड़ने लगती हैं और उनकी आंखों से आंसू निकल आते हैं. वे बार-बार पूछती हैं कि ''हमारे लड़के का नाम नोट किया कि नहीं.'' उनका बेटा राजू साह (50) और बहू कृष्‍णा घटना के बाद से ही लापता हैं.

रामसिंगारी बिहार के जिला मुजफ्फरपुर स्थित हथौड़ीघर की रहने वाली हैं. वे रोते हुए कहती हैं, ''हमरा सब कुछ हथौडि़ए में है. मुजफ्फरपुर में. हमरे बेटा-पतोह नहीं आएंगे तो हमें यहां से घर कौन ले जाएगा.'' 

पास में खड़े होमगार्ड सुरेंद्र शर्मा उन्‍हें समझाते हुए कहते हैं कि यहां से इन सब को घर नहीं, जेल ले जाया जाएगा. यह सुनते ही वे छाती पर हाथ धरकर फिर लेट जाती हैं.

मथुरा कांड की सीबीआई जांच की मांग खारिज

अधिकतर घायलों को नहीं पता है कि अस्‍पताल से उन्‍हें जेल ले जाया जाएगा क्‍योंकि वे पहले से ही हिरासत में हैं. सबसे दर्दनाक बात यह है कि हर दूसरे घायल का एक से ज्‍यादा परिजन लापता है और सारी सूचनाओं से इन्‍हें काटकर रखा गया है.

अस्‍पतालों में निगरानी के लिए दिन-रात तैनात निचले दरजे के पुलिसवाले घायलों को दिल से निर्दोष मानते हैं. होमगार्ड शर्मा हिदायत देते हुए सबसे कहते हैं, ''बाहर खतरा है. लोग देखेंगे, उन्‍हें पता चलेगा तुम लोगों के बारे में तो छोड़ेंगे नहीं. इससे बढि़या है कि जेल में कुछ दिन रहो. सुरक्षित रहोगे.''

जवाहरबाग कॉलोनी में रहने वाले मथुरा सब-रजिस्‍ट्रार ऑफिस के एक कर्मचारी रमेश चौधरी इस बारे में एक सटीक बात कहते हैं, ''वैसे तो जनता पुलिस का आतंक सबसे बड़ा मानती है, लेकिन आतंकी नंबर एक के चक्‍कर में वह आतंकी नंबर दो से जा मिली है. उस पर से एसपी और दरोगा की जो मौत हुई है, उसने पुलिस के पक्ष में माहौल बना दिया है. यहां ज्‍यादा खतरा पुलिस से नहीं, भीड़ से है.''

कंस के राज में जेल कैदगाह हुआ करती थी. आज उत्‍तर प्रदेश की जेल भीड़ से मासूम लोगों को महफ़ूज़ रखने की जगह बन चुकी है जबकि अस्‍पताल अस्‍थायी जेलों में तब्‍दील हो चुके हैं. ऐसे में सैकड़ों बिछड़े हुए निर्दोष परिवारों को आपस में कौन मिलाएगा, यह सवाल पूछना फिलहाल बेमानी जान पड़ता है.

First published: 11 June 2016, 11:29 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी