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केंद्र ने लोकतांत्रिक तरीके से 'छीन लिया' सहजधारियों का अधिकार

राजीव खन्ना | Updated on: 27 April 2016, 0:22 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने लोकसभा में विधेयक पारित करके सहजधारियों सिखों को एसजीपीसी के चुनाव में वोट देने से वंचित कर दिया.
  • केंद्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी ने नहीं किया विरोध. पंजाब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने की फैसले की निंदा. सहजधारी जाएंगे इसके खिलाफ कोर्ट.

सिख गुरुद्वारा (संशोधन) विधेयक 2016 के लोकसभा में पारित होने के साथ ही शिरोमणी अकाली दल (एसएडी) बीजेपी से अपनी नजदीकियों का लाभ लेकर सहजधारी सिखों को शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) में मतदान देने के अधिकार से वंचित करवा दिया. ये विधेयक राज्यसभा में पिछले महीने पारित हुआ था.

कांग्रेस और सहजधारी सिख पार्टी (एसएसपी) ने इस कदम को राज्य के अल्पसंख्यकों में विभाजन पैदा करने वाला कदम बताया है. एसएसपी इस विधेयक के खिलाफ अदालत जाने की तैयारी में है.

राजनीतिक जानकारों के अनुसार इस फैसले से एसजीपीसी पर अकाली दल का नियंत्रण बढ़ जाएगा. राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

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सहजधारी सिख धर्म की मूल शिक्षाओं में यकीन रखते हैं लेकिन वो आधिकारिक तौर पर अमृत छक कर सिख नहीं बनते. 'आल इंडिया गुरुद्वारा एक्ट 1925' के अनुसार सहजधारियों को एसजीपीसी के चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है.

सहजधारी सिख, सिख धर्म की सभी शिक्षाओं में यकीन रखते हैं लेकिन अमृत नहीं छकते

एसजीपीसी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ में सभी गुरुद्वारों के प्रबंधन का काम करता है. सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्वारे हरमिंदर साहब की देखरेख भी एसजीपीसी ही करता है.

एसजीपीसी के पदाधिकारियों का चुनाव हरमिंदर साहब में एक खुली सभा में होता है, जिसमें सभी सिख भागीदारी करते हैं.

1959 में पंजाब विधानसभा ने सहजधारियों को एसजीपीसी में वोट देने का अधिकार दिया. हरियाणा के अलग राज्य बनने के बाद एसजीपीसी अंतरराज्यीय संस्था हो गयी. यानी इसमें बदलाव के के लिए केंद्र से कानून पारित कराना जरूरी हो गया.

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1990 के दशक में सहजधारियों से एसजीपीसी का मतदान का अधिकार वापस लेने की मांग उठने लगी. ऐसी मांग उठाने वालों का कहना था कि सहजधारी इसका दुरुपयोग कर रहे हैं.

कई प्रस्ताव पारित करने के बाद तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने अकाली दल की मांग मान ली. गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना के जारी करके सहजधारियों को एसजीपीसी में मतदान से वंचित कर दिया.

इस अधिसूचना को सहजधारी सिख फेडरेशन ने अदालत में चुनौती दी. इस अधिसूचना को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 2011 में रद्द कर दिया था. उसके बाद एसजीपीसी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. जहां ये मामला अभी विचाराधीन है.

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इस बीच हर पांच साल पर होने वाले एसजीपीसी के चुनाव पर रोक लग गई है. अदालत ने एक कार्यकारी समिति का गठन करके उसे एसजीपीसी के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी. अदालत के फैसले से सभी पक्ष और सरकार की सहमति थी. फिलहाल एसजीपीसी की कार्यकारी समिति के प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ हैं. इस तरह परोक्ष तौर पर इसपर अकाली दल का नियंत्रण है.

नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आते ही अकाली दल ने उसपर ये कानून बनाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. अकालियों को डर है कि एसजीपीसी पर से उनका नियंत्रण खत्म हो सकता है.

एसएसपी नेता परमजीत सिंह रानू ने कैच न्यूज से कहा, "ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है. सबसे दुखद बात ये है कि सभी सेकुलर पार्टियां देखती रहीं और ये सांप्रदायिक विधेयक पारित हो गया. खासकर राज्य सभा में जहां बीजेपी बहुमत में नहीं है. संसद ने भारत में बढ़ती असहिष्णुता को न्यायोचित ठहरा दिया. इस निंदनीय कानून के बाद सिख समाज में विभाजन बढ़ेगा."

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इस कानून के बाद एक ही परिवार के कुछ लोग एसजीपीसी चुनाव में वोट दे पाएंगे और कुछ लोग नहीं दे पाएंगे.

बीजेपी सरकार ने पहले राज्यसभा में विधेयक पारित कराने का निर्णय किया लिया? इस पर रानू कहते हैं, "सरकार ने माहौल को परखने के लिए पहले राज्यसभा में विधेयक पेश किया. इस मुद्दे पर दोनों मुख्य दलों के बीच छिपी सहमति थी. इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एमएस गिल भी पक्ष हैं. इस विधेयक का पंजाब कांग्रेस के नेताओं ने विरोध किया. कहीं और केे नहीं."

सहजधारी नेताओं का कहना है कि बीजेपी और अकाली सिख समुदाय मे विभाजन कराना चाहते हैं

पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण और प्रतिगामी बताया.

अमरिंदर सिंह ने कहा, "इसका सीधा मतलब है कि सैकड़ों-हजारों सिखों के लिए एसजीपीसी का दरवाजा बंद करना. इससे सिख समाज में विभाजन पैदा होगा."

उन्होंने कहा कि क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के चलते ये विभाजनकारी फैसला लिया गया. उन्होंने कहा, "सिख धर्म की शिक्षाओं में यकीन रखने वाले हर व्यक्ति को एसजीपीसी में वोट देने का अधिकार होना चाहिए. ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का प्रयोग करके समाज के एक तबके के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीना जा रहा है."

आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान ने अकाली दल पर राजनीतिक फायदे के लिए धर्म का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. मान ने लोकसभा में कहा कि "अकाली दल की सीटें कम हो रही हैं इसलिए वो इसका दुरुपयोग कर रहे हैं."

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पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाया है कि वो गैर-सिख ताकतों के एसजीपीसी पर नियंत्रण के सपने को पूरा करना चाहते हैं.

बादल ने इस विधेयक को 'ऐतिहासिक' बताते हुए इसके लिए केंद्र सरकार का आभार जताया. उन्होंने कहा कि अकाली दल चाहता है कि सिख गुरुद्वारों का प्रबंधन उन लोगों के हाथ में हो जो "वैचारिक रूप से शुद्ध" हों ताकि सिख संस्थाएं सिख धर्म की मूल शिक्षाओं के अनुरूप चल सकें.

बादल कहते हैं, " इसके अलावा सिख गुरु, गुरबानी और सिख धर्म की शिक्षाएं किसी भी धर्म या पंथ के लोगों के बीच विभेद नहीं करते. किसी भी गुरुद्वारे में हर धर्म के व्यक्ति को आने का इजाजत है. गुरु ग्रंथ साहब में विभिन्न समुदायों और संप्रदायों के संतों की वाणी को शामिल किया गया था...श्री हरमिंदर साहब का बुनियाद की ईंट एक मुस्लिम साईं मियां मीर ने रखी थी."

First published: 27 April 2016, 0:22 IST
 
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