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चीन-पाकिस्तान के इकोनॉमिक कॉरिडोर पर छाए संकट के बादल

सादिक़ नक़वी | Updated on: 2 October 2016, 7:21 IST
QUICK PILL
  • बार-बार विवादों में फंस रहे चीन-पाकिस्तान के अतिमहत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर अब हैदर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर सवाल किए हैं. 
  • रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कॉरिडोर का 1,674 किमी लंबा पश्चिमी हिस्सा सरकार की प्राथमिकता में नहीं है.

चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर के एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ग्वादर पोर्ट को पाक सीनेट की एक विशेष कमेटी ने विफल (नॉन-स्टार्टर) करार दिया है. इसके बावजूद कि बलोचिस्तान के दक्षिण-पश्चिम स्थित बंदरगाह शहर ग्वादर में सीपीईसी से जुड़े प्रोजेक्ट के उद्घाटन पर पिछले महीने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जोर देते हुए कहा था कि ‘ग्वादर पाकिस्तान है और पाकिस्तान ग्वादर.’ उनका दावा था कि सीपीईसी से ग्वादर की तकदीर बदल जाएगी. ‘कभी यह पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा क्षेत्र हुआ करता था, अब सबसे समृद्ध होने जा रहा है.’

अन्य समस्याओं के साथ ग्वादर में पानी का काफी टोटा है. पाकिस्तान और चीन दोनों ने गहरे समुद्र वाले बंदरगाह से जुड़े प्रोजेक्ट को काफी अहमियत दी है, खासकर भारत और ईरान द्वारा फारस की खाड़ी में चाबहार बंदरगाह को संयुक्त रूप से विकसित करने के फैसले के मद्देनजर यह अहम फैसला है.

सीपीईसी बलोचिस्तान के एक्टिविस्टों के चंगुल में फंस गया, जिन्होंने चीन को 21वीं सदी की ईस्ट इंडिया कंपनी कहा है. हाल ही में लंदन में चीनी दूतावास के बाहर बलोच एक्टिविस्टों ने विरोध करते हुए कहा कि प्रोजेक्ट बलोचियों के संसाधनों को लूटने का षडयंत्र है. बलोचियों को डर है कि सीपीईसी अनुमानत: 3-4 मिलियन मजदूरों को (पंजाबी, पश्तून और चीनी) बलोचिस्तान आकर्षित करेगा, जिसकी वजह से उनके रोजगार को नुकसान पहुंचेगा.

इस कारण चीन के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए पाक सेना की एक विशेष इकाई की तैनाती भी करनी पड़ेगी, जो प्रांत में पाक सेना के मानवाधिकारों के हनन के इतिहास को देखते हुए बलोचियों के लिए काफी चिंताजनक रहेगा. बलोचिस्तान के बाहर कुछ जगहों पर जो धार्मिक समूह सीपीईसी से प्रभावित हुए, मसलन खैबर पख्तूनख्वा प्रांत ने भी इसका विरोध किया है.

भारत ने भी इस कॉरिडोर पर असंतोष प्रकट किया था, और यह महत्वपूर्ण भी है क्योंकि इसका रास्ता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर जाता है, जिसके लिए नई दिल्ली का दावा है कि यह उसका है.

विफल?

सीपीईसी चीन का अपने देश से बाहर सबसे बड़ा निवेश है, 50 बिलियन डॉलर से ज्यादा. सीनेट की कमेटी ने इसके बारे में, खासकर बलोचिस्तान में प्रोजेक्ट्स की योजना और उसे लागू करने को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है. कमेटी की अध्यक्षता कर रहे पाकिस्तान की विपक्ष की पीपुल्स पार्टी के सीनेटर ताज हैदर ने ‘डॉन’ समाचार पत्र को बताया, ‘ग्वादर पोर्ट को पूरा करने का सरकार का दावा महज बहाना है.'

हैैदर कमेटी ने उठाए सवाल

समाचार पत्र की रिपोर्ट थी कि हैदर कमेटी ने सीपीईसी की तीसरी रिपोर्ट में ग्वादार प्रोजेक्ट को ‘विफल’ कहा है, और ‘दावा किया कि कॉरिडोर का 1,674 किमी लंबा पश्चिमी हिस्सा, जिसमें बुरहान हकला, डीएल खान, झोब, क्वेटा, सोहराब, बिसमा, पंजगुर, तुरबत और ग्वादर शामिल है, सरकार की प्राथमिकता में नहीं थे.’

‘डॉन’ के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया कि, ‘जिस पश्चिमी मार्ग पर, संकरी दो लेन वाली सडक और ग्वादार पोर्ट सहित सहमति थी, जहां गहरे समुद्र पर लंगर का निर्माण होना था, वतर्मान में पूर्व-संभावना के लिहाज से विफल है.’ इसमें यह भी आरोप था कि ग्वादार पोर्ट को विकसित करने की जगह सरकार संसाधनों का उपयोग कराची पोर्ट को विकसित करने के लिए कर रही है.

कमेटी की चिंता थी कि ‘चीन और पाकिस्तान की संयुक्त समन्वय समिति के अधिकांश फैसले गोपनीय हैं.’ रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि ‘खबरें हैं कि जेसीसी ने अपने कार्यक्रम से तय पश्चिमी मार्ग को निकाल दिया है. कमेटी के सामने लाए गए जमीनी तथ्यों से आशंकाएं और बढ़ी हैं.’

‘डॉन’ के अनुसार जुलाई में, नेशनल असेंबली को सूचित कर दिया गया था कि ‘बिजली का प्रबंध नहीं होने से ग्वादार प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाएगा.’

पोर्ट बन भी जाए तो बिजली नहीं

पाक सरकार का दावा है कि सीपीईसी के कई प्रोजेक्ट्स के कारण ‘बिजली की कटौती’ का मुद्दा हल हो जाएगा. पर सीनेट कमेटी को जानकारी मिली है कि पावर प्रोजेक्ट्स की ट्रांसमिशन लाइनें सिंध, बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अभी डालनी बाकी हैं. इसका मतलब है कि ये प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे हो भी जाते हैं, तो भी मुख्य ग्रिड को बिजली सप्लाई नहीं कर सकेंगे.

सीपीईसी को रोकने वाली अन्य समस्याओं में सिंध और खैबर पख्तूनख्वा में क्रमश: पोर्ट कासिम और सुक्की केनारी प्रोजेक्ट्स के लिए भूमि अधिग्रहण की समस्या भी है.

First published: 2 October 2016, 7:21 IST
 
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